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भारत में क़ानूनी मदद पर प्रति व्यक्ति मात्र 0.75 रुपये ख़र्च होते हैं: रिपोर्ट

राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार, सिक्किम और उत्तराखंड जैसे राज्यों में विधिक सेवा प्राधिकारों को आवंटित धनराशि में से 50 फीसद  से भी कम ख़र्च किया गया.

(बाएं से) राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल (सीआरआरआई) अंतरराष्ट्रीय निदेशक संजय हजारिका, एनएएलएसए के निदेशक एसएस राठी, न्यायमूर्ति ए पी शाह, न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और रिपोर्ट लेखक राज बागगा रविवार को रिपोर्ट के लॉन्च के दौरान (फोटो: सीआरआरआई फेसबुक)

राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल के अंतरराष्ट्रीय निदेशक संजय हजारिका, निदेशक एसएस राठी, जस्टिस एपी शाह, जस्टिस एस. मुरलीधर और रिपोर्ट के लेखक राज बाग्गा रविवार को रिपोर्ट की लॉन्चिंग के दौरान (बाएं से दाएं). (फोटो: फेसबुक/सीआरआरआई)

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने रविवार को कहा कि कानूनी मदद मुहैया कराने वाले वकील मानवाधिकार के रक्षक हैं और जरूरत है कि उन्हें भी लोक अभियोजकों के स्तर का भुगतान किया जाए.

राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल (कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव- सीएचआरआई) की रिपोर्ट ‘सलाखों के पीछे उम्मीद?’ (होप बिहाइंड बार्स) से पता चला है कि भारत में कानूनी मदद पर प्रति व्यक्ति खर्च महज 0.75 रुपये है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकारों को आवंटित धनराशि में 14 फीसदी राशि खर्च ही नहीं की जाती.

बिहार, सिक्किम और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने आवंटित धनराशि में 50 फीसदी में से भी कम खर्च किया जबकि 520 जिला विधिक सेवा प्राधिकारों (डीएलएसए) में से महज 339 में पूर्णकालिक सचिव हैं ताकि कानूनी मदद सेवाओं की आपूर्ति का प्रबंधन किया जा सके.

एक बयान में मुरलीधर के हवाले से कहा गया, ‘दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने आज कानूनी मदद मुहैया कराने वाले वकीलों को मानवाधिकार के रक्षक के तौर पर परिभाषित किया और ऐसे वकीलों को लोक अभियोजकों के स्तर का भुगतान किए जाने की जरूरत पर जोर दिया.’

‘कानूनी प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता सुधारने’ पर आयोजित एक परिचर्चा में न्यायमूर्ति मुरलीधर ने आपराधिक कानून एवं प्रक्रियाओं पर आधारित रुख की बजाय कानूनी मदद को लेकर मानवाधिकार आधारित रुख की जरूरत बताई.

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने यह रिपोर्ट जारी की.

बयान में पूर्व मुख्य न्यायाधीश शाह के हवाले से कहा कि कई कैदियों को अपने मुकदमों की मौजूदा स्थिति और अपने बुनियादी मानवाधिकारों के बारे में पता नहीं होता है. उन्होंने कहा, ‘न्याय तक पहुंच सबसे बुनियादी मानवाधिकार है.’

एनएलयू ओडिशा के कुलपति डॉ. श्रीकृष्ण देव राव ने कानूनी व्यवस्था में पैरा-लीगल कार्यकर्ता को समुदाय और अदालतों के बीच एक पुल के रूप में व्यापक उपयोग के लिए आग्रह किया. इसके अलावा उन्होंने आग्रह किया कि स्कूल और कॉलेजों में पुलिस और कानूनी प्रक्रिया को समझाने का जागरूकता अभियान चलना चाहिए.

उन्होंने गिरफ्तारी के तुरंत बाद कानूनी प्रतिनिधित्व के महत्व पर भी प्रकाश डाला और गिरफ्तारी के बाद विभिन्न चरणों में कानूनी सहायता की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला.

रिपोर्ट के लेखक राजा बग्गा ने मुख्य निष्कर्षों को साझा करते हुए कहा कि वर्तमान में कोई राष्ट्रीय योजना नहीं है जो पुलिस स्टेशन में कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए एक तंत्र स्थापित करे.

राजा ने कहा कि आरटीआई को जवाब देने वाले 60 प्रतिशत जिलों ने एक निगरानी समिति गठित की गई है. वकीलों द्वारा प्रदान की गई कानूनी सहायता की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक मामले की समीक्षा करने के लिए निगरानी समितियां हैं. उन्होंने कहा, ‘समितियों में से केवल 16 प्रतिशत के पास कर्मचारी थे और 23 प्रतिशत ने रजिस्टर मेनटेन किया था.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का प्रति व्यक्ति वकील अनुपात दुनिया के अधिकांश देशों की तुलना में बेहतर है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में लगभग 18 लाख वकील हैं जिसका मतलब है कि प्रत्येक 736 व्यक्तियों के लिए एक वकील है, लेकिन फिर भी, कई लोग लंबे समय तक अप्रतिबंधित रहते हैं.

देश में 61,593 पैनल वकील और 9,56,323 रिमांड वकील हैं और इसलिए 18 लाख वकीलों में से 3.95 प्रतिशत वकील कानूनी सहायता के लिए हैं.

रिपोर्ट के अनुसार प्रति 18,609 लोगों पर एक कानूनी सहायता के लिए वकील है. पैरा-लीगल कार्यकर्ता एक और उपाय है. नलसा ने पिछले साल 67844 पैरा-लीगल कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण किया है.

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