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बाबरी विध्वंस: सुनवाई कर रहे जज का प्रमोशन रोकने पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की सुनवाई कर रहे जज से यह जवाब भी मांगा है कि वह बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की सुनवाई अप्रैल 2019 तक कैसे पूरी करेंगे. मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित 12 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप तय किए गए हैं.

New Delhi: A view of the Supreme Court, in New Delhi, on Thursday. (PTI Photo / Vijay Verma)(PTI5_17_2018_000040B)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लखनऊ की एक अदालत के न्यायाधीश से जवाब मांगा है कि वह बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की सुनवाई अप्रैल 2019 तक कैसे पूरी करेंगे.

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आरएफ नरिमन और न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की पीठ ने निचली अदालत के जज एसके यादव की याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार से सीलबंद लिफाफे में जवाब मांगा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यादव की पदोन्नति पर इस आधार पर रोक लगा दी थी कि शीर्ष अदालत ने उन्हें मुकदमे की सुनवाई पूरा करने का निर्देश दिया है.

पिछले साल 30 मई को विशेष सीबीआई भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित 12 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप तय किए थे. आरोपमुक्त किए जाने की उनकी याचिका को ख़ारिज कर दिया गया था और 50-50 हज़ार के निजी मुचलके पर उन्हें ज़मानत दी गई थी. कोर्ट ने ज़मानत याचिका पर पर सीबीआई के विरोध को भी ख़ारिज कर दिया था.

सीबीआई अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि अभियुक्त आडवाणी, जोशी, कटियार, डालमिया, उमा भारती, ऋतंभरा के विरुद्ध भारतीय दंड विधान की धारा 120बी (आपराधिक साजिश रचने) तथा पूर्व सांसद रामविलास वेदांती, बैकुंठलाल शर्मा उर्फ प्रेम, चम्पत राय, नृत्य गोपालदास, धर्मदास तथा सतीश प्रधान के खिलाफ 120बी, 153 ए और बी, 295, 295ए, 505, 147 तथा 149 का आरोप तय किए जाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं.

उसी साल 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती पर राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक साजिश के गंभीर आरोप में मुकदमा चलेगा और रोजाना सुनवाई करके इसकी कार्यवाही 19 अप्रैल, 2019 तक पूरी की जाएगी. इसके अलावा मामले कोर्ट ने रायबरेली से लखनऊ शिफ्ट कर दिया था.

ये मामला विशेष सीबीआई जज एसके यादव की अदालत में चल रहा है. इसी का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यादव की पदोन्नति पर रोक लगा दी थी.

शीर्ष अदालत ने मध्यकालीन स्मारक को विध्वंस करने की कार्रवाई को ‘अपराध’ बताते हुए कहा था कि इस घटना ने संविधान के ‘धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने’ को हिला कर रख दिया. इसके साथ ही न्यायालय ने भाजपा के इन वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोप बहाल करने का जांच ब्यूरो का अनुरोध स्वीकार कर लिया था.

न्यायालय ने कहा था, ‘इस मामले में कोई नये सिरे से सुनवाई नहीं होगी और न ही मुक़दमे की सुनवाई पूरी होने तक संबंधित न्यायाधीश का तबादला ही होगा. मुक़दमे की सुनवाई किसी तारीख़ विशेष पर करना संभव नहीं होने के बारे में न्यायाधीश के निष्कर्ष के अलावा किसी भी अन्य आधार पर स्थगित नहीं की जाएगी.’

अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचे के विध्वंस की घटना से संबंधित दो मुकदमे हैं. पहले मुक़दमे में अज्ञात ‘कारसेवकों’ के नाम हैं जबकि दूसरे मुक़दमे में भाजपा नेताओं पर रायबरेली की अदालत में मुकदमा चल रहा था.

शीर्ष अदालत ने रायबरेली और लखनऊ की अदालत में लंबित इन दोनों मुक़दमों को मिलाने और लखनऊ में ही इस पर सुनवाई का आदेश दिया था.

आडवाणी, जोशी और उमा भारती सहित 12 आरोपियों के खिलाफ इस मामले में आपराधिक साज़िश के आरोप हटा दिए गए थे. लेकिन हाज़ी महबूब अहमद और केंद्रीय जांच ब्यूरो ने भाजपा नेताओं सहित 21 आरोपियों के ख़िलाफ़ साज़िश के आरोप हटाने के आदेश को चुनौती दी थी. इन 21 आरोपियों में से आठ की मृत्यु हो चुकी है.

इस मामले में आठ व्यक्तियों के ख़िलाफ़ पूरक आरोपपत्र दाख़िल किया गया था, परंतु विध्वंस की योजना बनाने के आरोप से मुक्त किए गए 12 व्यक्तियों के ख़िलाफ़ ऐसा नहीं किया गया था.

आडवाणी, जोशी और भारती के साथ ही कल्याण सिंह (अब राजस्थान के राज्यपाल), शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे और विहिप नेता आचार्य गिरिराज किशोर (दोनों दिवंगत) के ख़िलाफ़ साजिश के आरोप हटाए गए थे.

अन्य नेताओं में विनय कटियार, विष्णु हरि डालमिया, सतीश प्रधान, सीआर बंसल, अशोक सिंघल (अब दिवंगत), साध्वी ऋतंभरा, महंत अवैद्यनाथ (अब दिवंगत), आरवी वेदांती, परमहंस रामचंद्र दास (अब दिवंगत), जगदीश मुनि महाराज, बैकुंठ लाल शर्मा ‘प्रेम’, नृत्य गोपाल दास (अब दिवंगत), धरम दास, सतीश नागर और मोरेश्वर सावे (अब दिवंगत) शामिल थे जिनके ख़िलाफ़ साज़िश के आरोप ख़त्म कर दिए गए थे.

इन अपीलों में भाजपा और दूसरे नेताओं के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी हटाने संबंधी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 20 मई, 2010 का आदेश निरस्त करने का अनुरोध किया गया था.

उच्च न्यायालय ने विशेष अदालत का आदेश बरक़रार रखते हुए कहा था कि जांच ब्यूरो ने रायबरेली में सुनवाई के दौरान अथवा पुनरीक्षण याचिका के समय कभी भी यह नहीं कहा था कि इन नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश का आरोप था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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