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‘दलित’ के बजाय ‘अनुसूचित जाति’ का इस्तेमाल: ऐसे बेहिस तर्कों का हासिल क्या है?

आज की तारीख़ में ज़्यादातर दलितों को ख़ुद को ‘दलित’ कहलाने में किसी भी तरह के अपमान का बोध नहीं होता. इसके उलट यह शब्द उनकी एकता का प्रेरक बन गया है, लेकिन सरकार को वह उनके प्रति बेहद अपमानजनक लग रहा है.

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(प्रतीकात्मक तस्वीर: पीटीआई)

सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी के विरुद्ध संघर्षरत प्रायः सारे राजनीतिक प्रवाहों के जातिगत पहचानों की राजनीति के समक्ष आत्मसमर्पण कर देने का नतीजा और कुछ हो ही नहीं सकता था. आजादी के इकहत्तर साल बाद भी हम दूषित चेतनाओं के कारण दलितों व सवर्णों के बीच की खाइयां निरंतर और चौड़ी होती देख रहे हैं, तो इसके पीछे वह आत्मसमर्पण ही है.

यह भी दूषित चेतनाओं का ही खिलाया गुल है कि सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश से ‘कमजोर’ हो गए अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण कानून को, जो 1989 में इन जातियों को समुचित सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया था, संसद की मार्फत मूल रूप में बहाल या ‘मजबूत’ करने के बाद केंद्र सरकार उम्मीद करने लगी है कि इससे ‘कृतज्ञ’ दलित 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने वोटों से उसकी झोली भरने में कुछ भी उठा नहीं रखेंगे.

दूसरी ओर उसके कुछ विरोधी इस ताक में हैं कि देखें, इस दलित पक्षधरता से अपने परंपरागत सवर्ण आधार को नाराज कर बैठी वह उसे कैसे खुश करती है? वे ऐसे कयासों में भी मुब्तिला हैं कि अंततः इस आधार को खुश नहीं कर पायी तो उसका हाल कितना बुरा होगा?

इस बीच सवर्णों के कई संगठनों ने गत वृहस्पतिवार को कई भाजपा शासित राज्यों में ‘भारत बंद’ के नाम पर पुलिस से झड़पों, पथरावों और रेलगाड़ियां रोकने पर उतर कर जता दिया है कि अब ‘अपने राज’ में वे दलित सशक्तीकरण के प्रतीकात्मक उपायों को भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे.

इस बीच ‘उनकी’ सरकार है कि दलितों के समाजी हालात या जीवन स्थितियां बदलने की तो किंचित भी चिंता करती नजर नहीं आ रही, उलटे उनकी दलित संज्ञा ही छीन लेने पर आमादा है. ताकि न रहे बांस और न बजे बांसुरी.

उसके सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के एक निर्देश के बहाने मीडिया के नाम फरमान जारी कर दिया है कि वह अनुसूचित जातियों व जनजातियों से जुड़े लोगों का जिक्र करते वक्त दलित शब्द के उपयोग से परहेज बरते, क्योंकि संविधान में इस शब्द का उल्लेख ही नहीं है.

इससे पहले सरकार ने 15 मार्च को केंद्र व राज्यों के सभी विभागों से आधिकारिक संचार में ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल से बचने और उसकी जगह अनुसूचित जाति लिखने को कहा था.

विडम्बना देखिए आज की तारीख में ज्यादातर दलितों को खुद को दलित कहलाने में किसी भी तरह के अपमान का बोध नहीं होता. इसके उलट यह शब्द उनकी एकता का प्रेरक बन गया है, लेकिन सरकार को वह उनके प्रति बेहद अपमानजनक लग रहा है.

सो भी कोई पहली बार नहीं. तिस पर सत्ताधीशों की गैरजिम्मेदार और सतही टिप्पणियां इस दलित-सवर्ण विमर्श को मनचाही दिशा प्रदान करने के लिए उसे चाकलेटीकरण की हद तक ले जा रहे हैं.

सत्तारूढ़ भाजपा के दलित और सवर्ण सांसदों में मतभेदों की खबरों के बीच लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन तक अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण कानून को इन जातियों को दी गई चाॅकलेट के तौर पर देख रही हैं.

राजनीतिक पार्टियों को इस मुद्दे पर राजनीति न करने और साथ बैठकर बात करने की नसीहत देते हुए वे कह रही हैं कि यह चॉकलेट तुरंत वापस नहीं ली जा सकती, क्योंकि ऐसा करने पर ‘बच्चा’ (पढ़िये: ये जातियां) गुस्सा करेगा और रोयेगा. उनकी मानें तो इसके बजाय ‘दो-तीन समझदार लोग बच्चे को समझा-बुझाकर उससे यह चॉकलेट ले सकते हैं.’

और ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि ‘दलितों के साथ पहले अन्याय हुआ है तो इसका मतलब यह नहीं कि हिसाब बराबर करने के लिए दूसरे वर्गों के साथ भी अन्याय होना चाहिए.’

वे जिस निश्चयात्मक ढंग से कहती हैं कि ‘हमें अन्याय के मामले में तो बराबरी नहीं ही करनी है’, लेकिन दलितों को हासिल सामाजिक सुरक्षा की कानूनी चाकलेट भी उन्हें समझा-बुझाकर छीन लेने की वकालत करती हैं, उससे छिपा नहीं रहता कि वे वास्तव में किसका पक्ष ले रही हैं. कौन समझाये उन्हें कि जब तक वे लोकसभाध्यक्ष हैं, इस तरह का पक्षपातपूर्ण रवैया उन्हें शोभा नहीं देता.

बहरहाल, दलितों को दलित न कहना चाहने वालों को कुछ और नहीं तो 1929 में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की रची वह कविता तो याद करनी चाहिए जिसमें उन्होंने ईश्वर से दलितजनों पर करुणा करने की प्रार्थना की थी-दलित जन पर करो करुणा/दीनता पर उतर आये प्रभु/तुम्हारी शक्ति वरुणा.

प्रसंगवश, 1943 में उनके ‘अणिमा’ नाम के काव्यसंग्रह में भी उनकी यह कविता छपी थी और 1930 में पूना से ‘दलित-बंधु’ नाम का समाचारपत्र प्रकाशित हुआ करता था, जिसके नाम में ही ‘दलित’ शब्द था.

निराला ने उक्त प्रार्थना की तो न आज के जैसा दलित विमर्श हुआ करता था, न ही दलित साहित्य. समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता पर आधारित वह भारतीय संविधान भी नहीं ही था, जिसमें दलितों के लिए ‘अनुसूचित जाति व जनजाति’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है.

यों, जानकारों के मुताबिक ‘दलित’ शब्द ने सबसे पहले 1831 की मोल्सवर्थ डिक्शनरी में ‘डिप्रेस्ड’ के तौर पर अपनी जगह बनायी थी. बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ज्यादातर इसके अंग्रेजी पर्याय ‘डिप्रेस्ड’ का ही इस्तेमाल करते थे. अंग्रेज तो खैर करते ही करते थे. स्वामी श्रद्धानंद ने भी 1921 से 1926 के बीच अपने भाषणों में बारम्बार यह शब्द बोला है. दिल्ली में तो उन्होंने बाकायदा दलितोद्धार सभा भी बनायी थी.

अब मोदी सरकार कहती है कि दलितों के लिए ‘दलित’ शब्द अपमानजनक है तो उसे यह भी बताना ही चाहिए कि क्या ये सब के सब दलितोद्धारक वास्तव में उनका अपमान करने पर उतारू थे? क्या ‘अपमान’ की इसी श्रृंखला को 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स नाम के सामाजिक-राजनीतिक संगठन ने भी आगे बढ़ाया, जिसने बाद में आंदोलन का रूप ले लिया?

शुरू में नामदेव ढसाल, राजा ढाले और अरुण कांबले इसके प्रमुख नेताओं में थे और इसका गठन अफ्रीकी-अमेरिकी ‘ब्लैक पैंथर’ आंदोलन से प्रभावित होकर किया गया था.

आखिर क्यों दलित स्वाभिमान के पैरोकार कांशीराम तक ने इस शब्द से परहेज नहीं किया और उत्तर भारत में भी उसे प्रचलितकर महाराष्ट्र जैसी ही मान्यता दिला दी? उन्होंने तो डीएस-4 यानी दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन भी किया.

यों, तकनीकी तौर पर यह बात सही है कि संविधान में दलितों के लिए दलित नहीं अनुसूचित जाति-जनजाति शब्दों का ही उपयोग किया गया है. लेकिन इस आधार पर इस शब्द से परहेज बरतना हो तो नरेंद्र मोदी सरकार को भाजपा सरकार कहने से भी परहेज करना पड़ेगा, क्योंकि सरकारों के गठन के प्रसंग में संविधान में कहीं भी यह नहीं लिखा कि कोई राजनीतिक दल सरकार बनायेगा. फिर ऐसे बेहिस तर्कों का हासिल क्या है?

फैजाबाद में जन्मना दलित लेकिन खुद को वामपंथी कहने वाले लेखक कवि आरडी आनंद साफ कहते हैं कि सरकार की चिंता दरअसल यह नहीं कि ‘दलित’ शब्द पीड़ित, शोषित, दबा हुआ, खिन्न, उदास, टुकडा, खंडित, तोडना, कुचलना, दला हुआ, पीसा हुआ, मसला हुआ, रौंदा हुआ और विनष्ट आदि के खराब अर्थों में प्रयुक्त होने के कारण दलितों के लिए अपमानजनक है. वह इसलिए पसीना-पसीना हो रही है कि अब यह हजारों वर्षों तक अस्पृश्य समझी जाने वाली तमाम शोषित जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्त होने लगा और उनकी सामुदायिक पहचान बन गया है.

शूद्र, अंत्यज, अवर्ण, अछूत और महात्मा गांधी के दिये ‘हरिजन’ जैसे संबोधनों के विकासक्रम में यह समुदाय आज अपने लिए ‘दलित’ शब्द को प्रायः सारे बोधों व मनोवैज्ञानिक दशाओं में अपना चुका है तो सरकार उसके इस अपनापे से डरने लगी है.

वे कहते हैं कि हमारे सत्तातंत्र को समझना चाहिए कि किसी समुदाय का स्वयं को दबा या कुचला हुआ मान लेना कोई साधारण बात नहीं है. उसका यह मान लेना पहले तमाम कुंठाएं उत्पन्न करता है, फिर ये कुंठाएं ऐसे रोष को जन्म देती हैं जो व्यक्तिगत से बढ़ते हुए सामुहिक सामुदायिक आक्रोश में बदल जाता है.

जो भी हो, कोई भी यह नहीं कह सकता कि संविधान के कल्याणकारी प्रावधानों से दलितों की दशाओं में कतई कोई सुधार हुआ ही नहीं है. उनके बीच छोटा-सा ही सही एक ऐसा तबका भी उभरा ही है, जिसकी प्रगति से ईर्ष्या की जा सकती हो. लेकिन संवैधानिक लोकतंत्र के पिछले 68 सालों में राष्ट्र के तौर पर हमारी सबसे बड़ी विफलता यह है कि हमारे समाज का श्रेष्ठताग्रंथि से पीड़ित एक तबका आज भी सामाजिक बराबरी की अवधारणा में विश्वास करने को तैयार नहीं है.

सारे सामाजिक व राजनीतिक सुधारों को विफल कर डालने की अपनी दुर्निवार अभिलाषा से पीड़ित यह तबका चाहता है कि दलित और पिछड़े सामाजिक स्तर पर अब भी दबे-कुचले या कि उसके पांवों के नीचे ही बने रहें. इसके लिए वह बार-बार रंग और केंचुलें भी बदलता रहता है.

वह ऐसा न करता तो अब तक दलितों की दयनीय और उत्पीड़ित की पहचान पूरी तरह बदल चुकी होती और हम संविधान की इस भावना को साकार होती देख रहे होते कि भारतीय समाज में पूरी तरह बराबरी आए. पहचान की राजनीति भी तक इतने गुल नहीं ही खिला पाती.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि संविधान का हवाला देकर खुद को दलितों का हिमायती सिद्ध करने में उनकी दलित संज्ञा छीनने को आतुर लोग कभी दूषित सामाजिक व जातीय चेतनाओं के दोहन के लोभ से परहेज बरतकर संविधान के ऐसे सदाशयतापूर्ण पालन की भी सोचेंगे ताकि आगे चलकर दलित, अनुसूचित जाति जनजाति या सवर्ण जैसे किसी वर्गीकरण की गुंजाइश या जरूरत ही न रह जाये? इस सवाल की अनसुनी हमें ऐसे आगे और विषफलों के हवाले कर सकती है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

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