प्रासंगिक

अगर आचार्य रामदास की मुहिम चलती रहती तो हिंदी में विज्ञान लेखन की इतनी दुर्गति न होती

पुण्यतिथि विशेष: 12 सितंबर, 1937 को अंतिम सांस लेने वाले आचार्य रामदास गौड़ द्वारा पैदा की गई वैज्ञानिक चेतना का ही परिणाम था कि उन दिनों विज्ञान लेखकों की गणना भी साहित्यकारों में की जाती थी.

आचार्य रामचंद्र गौड़

आचार्य रामचंद्र गौड़

हिंदी में विज्ञान लेखन का वर्तमान खस्ताहाल किसी से छिपा नहीं है. भले ही वह भारतेंदु हरिश्चंद्र के काल में ही शुरू हुआ हो (जैसा कि भोपाल में हुए दसवें हिंदी साहित्य सम्मेलन में एक अनुमान के हवाले से दावा किया गया था) और अपने सवा सौ साल पूरे कर चुका हो या कि हिंदी में 250 लेखिकाओं समेत 3000 से अधिक विज्ञान लेखक हुए हों और उनमें 160 से अधिक 1965 से लगातार विज्ञान लेखन में संलग्न हों.

वस्तुस्थिति अभी भी कुल मिलाकर यही है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी इस भाषा के लिए विज्ञान की उच्चस्तरीय पढ़ाई में जगह बनाना संभव नहीं हो पाया है. मोटे तौर पर इसके बड़े कारणों में वैज्ञानिक विषयों की अच्छी पुस्तकों और सर्वस्वीकार्य पारिभाषिक शब्दावली का सुलभ न होना तो है ही, हिंदी भाषी क्षेत्र में वैज्ञानिक चेतना व मिजाज और साथ ही अपनी भाषा को लेकर स्वाभिमान का सर्वथा अभाव भी है.

इन हालात में मौलिक विज्ञान लेखन की तो बात भी क्या की जाए, विज्ञान की दूसरी भाषाओं में लिखी गई पुस्तकों के हिंदी में जो अनुवाद उपलब्ध हैं, उनमें भी ज्यादातर मशीनी हैं या फिर इतने कठिन कि पढ़ने वाला उनसे पनाह मांगने और कहने लगे कि उसे उनके मुकाबले अंग्रेजी ही आसान लगाती है.

क्या आश्चर्य कि इस सबके चलते अब कई ‘स्वनामधन्य’ हिंदी को केवल विज्ञापन, बाजार और मनोरंजन वगैरह की भाषा मानते हैं, वैज्ञानिक विमर्शों के अनुपयुक्त बताते और उनकी भाषा मानते ही नहीं.

ऐसे में आपके लिए यह जानना बेहद दिलचस्प या कि सुखद आश्चर्य जैसा हो सकता है कि पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े भारत में 1913 से 1937 के बीच आचार्य रामदास गौड़ ने विज्ञान के शुष्कतम विषयों को भी प्रीतिकर हिंदी में लिखने व पाठकों तक पहुंचाने की जो मुहिम चलायी थी, वह उनके संसार को अलविदा कहते ही ठप न पड़ जाती, तो आज यह हिंदी में विज्ञान लेखन की हालत इतनी खस्ता न होती.

प्रसंगवश, रामदास गौड़ का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में 21 नवम्बर, 1881 को हुआ, जहां उनके पिता ललिता प्रसाद पहले तो चर्च मिशन हाईस्कूल में अध्यापक थे, लेकिन बाद में नौकरी छोड़कर वकालत करने लगे थे.

उनका पैतृकगांव उमरी भवानीपुर तत्कालीन फैजाबाद (अब आंबेडकरनगर) जिले के ऐतिहासिक किसान विद्रोह के लिए मशहूर परगना बिड़हर में था. उनके प्रपितामह भवानीबख्श लंबे समय से गांव के जमीनदार थे, लेकिन 1810 में उनको अचानक ऐसा वैराग्य उत्पन्न हुआ कि सारी जमीनदारी भगवान भरोसे छोड़कर काशीवास करने चले गये.

इससे पैदा हुई समस्याओं के चलते उनके परिवार को भयानक दुर्दिन भी झेलने पड़े. फिर भी पिता ललिता प्रसाद ने घर पर फारसी, गणित व अंग्रेजी की अनौपचारिक शिक्षा के बाद रामदास को विभिन्न कॉलेजों से विज्ञान की उच्च शिक्षा दिलाई.

साथ ही गंभीर अध्ययन-मनन, लगन, परिश्रम और सदाचार वगैरह में निष्ठा के आदर्श व संस्कार दिए. इनकी बिना पर इलाहाबाद की ऐतिहासिक कायस्थ पाठशाला और म्योर सेंट्रल कॉलेज में अध्यापन के बाद 1918 में रामदास काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या विभाग में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर नियुक्त हुए और उन्हें फैकल्टीज आॅफ आर्ट्स, साइंस ओरियन्टल लर्निंग व सीनेट की सदस्यता प्राप्त हुई.

लेकिन इससे पांच साल पहले ही उन्होंने इलाहाबाद में वर्नाक्यूलर साइंटिफिक लिटरेरी सोसाइटी के रूप में ‘विज्ञान परिषद’ की स्थापना कर दी थी. इस काम में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तीन विभूतियां-डॉ. गंगानाथ झा (संस्कृत), प्रो. हमीदुद्दीन (अरबी) और सालिगराम भार्गव (भौतिक शास्त्र) उनके साथ थीं.

इस परिषद ने जहां हिंदी में विज्ञान लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा, हिंदी के माध्यम से विज्ञान संबंधी विषयों का प्रचार प्रसार भी किया.

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए परिषद ने दो वर्ष पश्चात् अप्रैल 1915 में ‘विज्ञान’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया, जिसके संपादक पं. श्रीधर पाठक तथा लाला सीताराम दोनों ही साहित्यिक अभिरुचि वाले व्यक्ति थे.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक ‘विज्ञान’ हिंदी की विज्ञान विषयों की एकमात्र पत्रिका बनी रही और उसके चलते इलाहाबाद हिंदी में वैज्ञानिक साहित्य सृजन का अद्वितीय केंद्र बना रहा.

रामदास इस मासिक पत्रिका में तो नियमित रूप से लिखा ही करते थे, उनकी पहल पर विज्ञान परिषद ने हिंदी भाषियों को दियासलाई व फासफोरस का रिश्ता समझाने और भुनगों के बारे में जानकारियां उपलब्ध कराने के लिए सरल पुस्तकों का प्रणयन भी कराया.

इसी बीच देश की स्वतंत्रता के लिए असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो रामदास ने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी और एक राष्ट्रीय विद्यालय में काम करने लगे. 1921 में गोरी सरकार द्वारा प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के 55 सदस्यों के साथ उनको गिरफ्तार कर लिया गया.

फिर तो उन पर एक सौ रुपयों का जुर्माना लगाया गया और उन्हें डेढ़ वर्ष तक आगरा व लखनऊ की जेलों में कठिन कारावास की सजा काटनी पड़ी. लेकिन जेल की यातनाएं उनका मनोबल नहीं तोड़ सकीं. जेल से छूटने के बाद वे स्थायी रूप से बनारस में ही रहने लगे और म्युनिसिपल बोर्ड के सदस्य व पब्लिक वर्क्स कमेटी के सभापति बने. उन्होंने कुछ समय तक गुरुकुल में अध्यापन भी किया.

अपनी सृजनयात्रा को तो उन्होंने किसी भी मोड़ पर थमने नहीं दिया. 12 सितंबर, 1937 को अंतिम सांस लेने से पहले वे दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके थे, जिनमें से ‘विज्ञान हस्तामलक’ को अपने समय का प्रतिष्ठित मंगला प्रसाद पुरस्कार प्राप्त हुआ.

कहा जाता है कि उनके द्वारा पैदा की गई वैज्ञानिक चेतना का ही परिणाम था कि उन दिनों विज्ञान लेखकों की गणना भी साहित्यकारों में की जाती थी. उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशनों में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था. इस चेतना के ही कारण रामदास के अलावा भी हिंदी के कई विज्ञान लेखकों की रचनाओं पर मंगला प्रसाद पुरस्कार प्रदान किया गया था, जो उन दिनों हिंदी साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार माना जाता था.

उदाहरण के लिए त्रिलोकीनाथ वर्मा को उनकी पुस्तक ‘हमारे शरीर की रचना’ पर संवत 1983 में, डॉ. गोरख प्रसाद को उनकी पुस्तक ‘फोटोग्राफी की शिक्षा’ पर संवत 1988 में, मुकुंद स्वरूप को उनकी पुस्तक ‘स्वास्थ्य विज्ञान’ पर संवत 1889 में तथा महावीर श्रीवास्तव को उनकी कृति ‘सूर्य सिद्धान्तः विज्ञान भाष्य’ पर सं. 1999 में यह पुरस्कार मिला था.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि रामदास गौड़ ने सिर्फ वैज्ञानिक विषयों पर ही लिखा हो. अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने ‘गौड़ हितकारी’ नाम की उर्दू मासिक पत्रिका निकाली थी और बाद में हिंदी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित ‘हिंदी भाषा सार’ के पहले भाग का संपादन किया तो राष्ट्रीय विद्यालयों के लिए हिंदी की सात पाठ्यपुस्तकें भी तैयार करायी थीं.

इन पाठ्य पुस्तकों में अंग्रेजों की दृष्टि से इतनी ‘आपत्तिजनक’ सामग्री थी कि 1924 में इन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया और पंडित गोविन्द वल्लभ पंत को इसके विरुद्ध आवाज उठानी पड़ी.

हिंदी साहित्य सम्मेलन की परीक्षाओं की शुरुआत का श्रेय भी आचार्य रामदास गौड़ को ही जाता है. इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘हिन्दुत्व’ जैसा ग्रंथ दिया जो वाराणसी के ‘ज्ञानमंडल’ से प्रकाशित हुआ और अपने विषय के वस्तुनिष्ठ व विशद विवेचन में सानी नहीं रखता.

गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को आधार बनाकर उन्होंने कोई आधा दर्जन पुस्तकें रचीं तो आम लोगों को नए उद्योग-धंधों की जानकारी देने के लिए एक ग्रंथावली भी प्रकाशित करायी, जिसमें 143 नए उद्योग-धंधों का वर्णन है.

ज्योतिष, वैद्यक, होम्योपैथी, पिशाच विद्या, स्त्रीशिक्षा और इतिहास जैसे विषयों पर भी उन्होंने प्रभूत मात्रा में अतुलित गुणवत्ता वाला सृजन किया. अपनी अध्ययनशीलता को तुष्ट करने के लिए उन्होंने बंगला, मराठी, गुजराती, संस्कृत और जर्मन भाषाएं भी सीखी थीं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

Comments