राजनीति

क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व का फॉर्मूला आज़माने जा रही है?

मध्य प्रदेश में सरकार बनने पर कांग्रेस ने 23 हज़ार पंचायतों में गोशाला निर्माण की घोषणा की है. साथ ही नर्मदा परिक्रमा पथ निर्माण, राम गमन पथ निर्माण करने जैसी घोषणाएं इशारा करती हैं कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में भी गुजरात चुनाव की तरह सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर है.

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(फोटो साभार: कमलनाथ/फेसबुक)

बीते वर्ष गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एक नए रूप में नजर आई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ में धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाली कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हिंदुत्व की पिच पर ही खेलना शुरू कर दिया था जिसे जानकारों ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की संज्ञा दी थी.

पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष और तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव प्रचार के दौरान प्रदेश भर के मंदिरों में माथा टेकते देखे जा रहे थे, अपना जनेऊ दिखा रहे थे. वहीं, कांग्रेस की तरफ से की जा रही घोषणाओं में भी कहीं न कहीं हिंदू मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का एक प्रयास दिखता था.

अक्सर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप झेलने वाली कांग्रेस भाजपा की तरह ही बहुसंख्यकों की राजनीति में उतर आई थी.

अब लगभग साल भर बाद चार राज्यों में फिर विधानसभा चुनाव हैं. जिनमें उत्तर-पूर्वी भारत के मिजोरम के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राजनीतिक महत्व के वे तीन राज्य भी शामिल हैं जहां भाजपा की सरकारें हैं.

इनमें मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ ऐसे राज्य हैं जिनमें कांग्रेस पिछले तीन विधानसभा चुनाव हारकर 15 सालों से वनवास भोग रही है.

90 विधानसभा सीटों वाले छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस भाजपा को कुछ हद तक मुकाबला देने में सफल रही है जिसकी पुष्टि दोनों दलों को प्राप्त मतों के प्रतिशत के अंतर से हो जाती है. लेकिन, 230 विधानसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह के नेतृत्व में भाजपा के सामने कांग्रेस पंगु ही साबित होती रही है.

2003 में जहां उसे केवल 38 सीटें मिलीं तो 2008 में उसका प्रदर्शन सुधरा भी तो भी केवल एक तिहाई यानी कि 71 सीटों से संतोष करना पड़ा. 2013 में फिर से कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी.

एंटी इनकंबेंसी के चलते नुकसान भाजपा को होना चाहिए था लेकिन नुकसान में कांग्रेस रही. उसकी सीटें घटकर 58 रह गईं जबकि भाजपा को पिछले चुनावों की अपेक्षा 22 सीटों का फायदा हुआ था.

देखा जाए तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति इस दौरान कुछ-कुछ गुजरात जैसी ही रही, जहां 2017 के विधानसभा चुनावों के पहले तक नरेंद्र मोदी के कद और भाजपा के आगे वह और उसकी हर नीति बौनी ही नजर आती रही थी.

इसलिए कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व की हालिया घोषणाओं को देखते से लगता है कि अब मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस गुजरात के सॉफ्ट हिंदुत्व के फॉर्मुले को आजमाने जा रही है.

बीते दिनों मध्य प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष कमलनाथ ने घोषणा की कि अगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो लगभग 23,000 ग्राम पंचायतों में गोशालाओं का निर्माण कराया जाएगा. हर ग्राम पंचायत में एक गोशाला बनेगी.

जो विज्ञापन कमलनाथ की ओर से जारी किया गया उसमें लिखा था, ‘प्रदेश की हर पंचायत में गोशाला बनाएंगे, ये घोषणा नहीं, वचन है.’

2 सितंबर को विदिशा जिले के गंजबासौदा में कमलनाथ ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने पर किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा. प्रदेश की हर पंचायत में गोशाला का निर्माण होगा. इसके लिए अतिरिक्त राशि की व्यवस्था की जाएगी ताकि गोशाला संचालित की जा सकें.’

यह सिर्फ इकलौती घोषणा नहीं है जो इशारा करती है कि प्रदेश में कांग्रेस ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का गुजराती फॉर्मूला अपनाने की राह पर है. ऐसी ही एक घोषणा कांग्रेस द्वारा ‘राम वन गमन पथ यात्रा’ के संबंध में भी की गई है.

21 सितंबर को चित्रकूट से शुरू होने वाली कांग्रेस की यह यात्रा उन रास्तों से होकर निकलेगी, जहां से अपने वनवास के दौरान भगवान राम गुजरे थे. यात्रा 9 अक्टूबर को समाप्त होगी और 35 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरेगी.

इस तरह कांग्रेस की योजना एक तीर से दो निशाने लगाने की है. पहला तो वह इस यात्रा के माध्यम से अपनी हिंदुत्व की छवि का निर्माण कर पाएगी और दूसरा कि विधानसभा की 35 सीटों पर जनसंपर्क भी हो जाएगा.

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(फोटो साभार: फेसबुक/ज्योतिरादित्य सिंधिया)

इस लिहाज से यह यात्रा बीते वर्ष दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा यात्रा के ही समान है जिसे दिग्विजय अंत समय तक धार्मिक यात्रा बताते हुए कहते नजर आए थे कि इसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है. लेकिन वास्तव में इस यात्रा के माध्यम से उन्होंने एक तरफ अपनी हिंदू नेता की छवि पेश की तो दूसरी तरफ नर्मदा किनारे की विधानसभा सीटों पर जनसंपर्क भी कर लिया था.

द वायर से साक्षात्कार में उन्होंने खुद अपनी नर्मदा यात्रा को चुनावी सक्रियता से जोड़ा था. हालांकि, राम गमन पथ यात्रा के संबंध में कांग्रेस का तर्क है कि 2007 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राम वन गमन पथ निर्माण की घोषणा की थी जो कि अब तक पूरी नहीं हो सकी है. इसलिए कांग्रेस अब इसे मुद्दा बना रही है.

प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता रवि सक्सेना कहते हैं, ‘यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चुनावी घोषणा थी कि जिन मार्गों से वनवास के दौरान राम गुजरे वहां हम पथ बनाएंगे और पथ गमन स्थल को पर्यटन स्थल बनाकर पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करेंगे. श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए निर्माण कार्य होंगे. लेकिन, अपनी आदतानुसार शिवराज अपनी यह घोषणा भूल गए. पिछले दो-तीन सालों से उन्होंने इस संबंध में एक शब्द नहीं बोला है, न ही घोषणा के संबंध में कोई पहल की है.’

रवि के मुताबिक, शिवराज सिंह ने सबसे पहले इस संबंध में घोषणा 2007 में की थी. 2012 और 2016 में उन्होंने फिर अपनी बात दोहराई. वे कहते हैं कि शिवराज विधानसभा में भी ऐसा कह चुके हैं.

रवि आगे कहते हैं, ‘इसलिए कांग्रेस ने तय किया है कि साधु-संतों को साथ लेकर राम पथ गमन मार्ग पर जाएंगे, तीर्थ यात्रा निकालेंगे और उस यात्रा के जरिये लोगों से कहेंगे कि जो वादा शिवराज ने पूरा नहीं किया, वह कांग्रेस पूरा करेगी. मार्ग के पर्यटन केंद्रों पर सुविधाएं विकसित करेंगे, श्रद्धालुओं के रहने के लिए धर्मशालाएं बनाएंगे और जो भी संभव होगा वो हम करेंगे. ये हमारा उद्देश्य है.’

प्रदेश में चुनावी तैयारियों को लेकर कांग्रेस का अभियान केवल यात्राओं तक ही सीमित नहीं है. इस संबंध में गोशाला निर्माण जैसी ही कुछ अन्य चुनावी घोषणाएं भी की जा रही हैं, जैसे कि दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस के सत्ता में आने पर ‘राम गमन पथ’ के साथ-साथ ‘नर्मदा परिक्रमा पथ’ बनाने की बात की है. वहीं, नर्मदा संरक्षण के मुद्दे को भी कांग्रेस लगातार हवा दे रही है.

नर्मदा के मुद्दे पर रवि कहते हैं, ‘नर्मदा संरक्षण और परिक्रमा पथ के बारे में कही गई अपनी हर बात कांग्रेस पूरा करेगी. हमने बार-बार कहा है कि नर्मदा मां के उद्गम अमरकंटक से लेकर 3,367 किमी में जहां-जहां वे जाती है, हम उनके संरक्षण का काम करेंगे. शिवराज सिंह और उनके भाई भतीजों ने, भाजपा के नेता, मंत्रियों और विधायकों ने जिस तरह दोनों हाथों से नर्मदा मां को रेत खनन करके लूटा है, उसकी जांच भी बैठाएंगे.’

इसी कड़ी में गुजरात की तरह ही कांग्रेस ने राहुल गांधी को भी प्रदेश के मंदिर-मंदिर घुमाने की योजना बनाई है. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, प्रदेश में उनके चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत भोपाल के दशहरा भेल मैदान से 17 सितंबर को करेंगे.

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह शिवराज सिंह चौहान की उस धार्मिक राजनीतिक यात्राओं का तोड़ खोजने की एक कोशिश की जा रही है जहां वे अपनी अधिकांश यात्राएं उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से शुरू करते हैं.

बता दें कि जन आशीर्वाद यात्रा की शुरुआत भी शिवराज ने महाकाल के आशीर्वाद के बाद ही शुरू की थी. ऐसा नहीं है कि ये माहौल हाल ही में बना हो. पिछले सालभर से प्रदेश को कांग्रेस और भाजपा ने चुनाव नजदीक आते देखकर हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना रखा है.

सबसे पहले शिवराज सिंह चौहान ‘नर्मदा यात्रा’ पर निकले, जहां महीनों तक उन्होंने खूब ताम-झाम के साथ नर्मदा आरतियां कीं. उसके जवाब में कुछ समय बाद ही दिग्विजय सिंह ने भी ‘नर्मदा परिक्रमा यात्रा’ पर जाने की घोषणा कर दी. लगभग छह महीने दिग्विजय सिंह यात्रा पर रहे. इस दौरान उनकी यात्रा में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का खूब जमावड़ा देखा गया. वे धर्मगुरुओं से आशीर्वाद लेते देखे गए, उनसे जनसंपर्क करते देखे गए.

फिर शिवराज आदि शंकराचार्य की मूर्ति स्थापना के लिए प्रदेश भर से मिट्टी इकट्ठा करने के लिए ‘एकात्म यात्रा’ पर निकल गए.

वहीं, प्रदेश कांग्रेस के नेता भी मंदिरों के माध्यम से अपनी हिंदू छवि के निर्माण में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. जब कमलनाथ की प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर नियुक्ति हुई तो सबसे पहले वे दतिया के पीतांबरा पीठ मंदिर दर्शन को पहुंचे.

इसी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत महाकालेश्वर मंदिर पर पूजा अर्चना और अभिषेक करने के बाद की थी.

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(फोटो साभार: फेसबुक/दिग्विजय सिंह)

सिंधिया के उस पूजन अभिषेक को सोशल मीडिया पर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा खूब उछाला गया और दिखाने की कोशिश की गई कि शिवराज के मुकाबले सिंधिया ने सम्मान के साथ महाकाल के दर्शन किए जबकि शिवराज की पूजा अर्चना में अहंकार दिखा.

तो वहीं, प्रदेश के पार्टी नेताओं में एकजुटता लाने के लिए कांग्रेस की समन्वय यात्रा की शुरुआत भी दिग्विजय सिंह ने ओरछा के राम राजा मंदिर से की थी. हाल ही में राहुल गांधी कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर थे तो दिग्विजय सिंह ने भी इच्छा जता दी कि वे भी एक बार कैलाश मानसरोवर जाना चाहते हैं.

हालांकि, दिग्विजय सिंह का कैलाश मानसरोवर जाना या कांग्रेसी नेताओं का मंदिर-मंदिर जाना उनका व्यक्तिगत मसला हो सकता है लेकिन इनका संदेश जनता में राजनीतिक ही जा रहा है.

गौर करने वाली बात यह भी है कि स्वयं कांग्रेसी ही इस सबका प्रयोग राजनीति में कर रहे हैं. जैसेकि दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा यात्रा को कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने राजनीतिक तौर पर यह कहकर भुनाया कि शिवराज ने जहां करोड़ों यात्रा में फूंके, विमान और वाहन से घूमे, दिग्विजय सिंह पैदल ही परिक्रमा पर गए. स्वयं दिग्विजय सिंह ने ही यात्रा को राजनीतिक सक्रियता से जोड़ा.

इसी तरह ज्योतिरादित्य के महाकाल मंदिर जाने की भी तुलना शिवराज के मंदिर जाने से करना, ये कुछ उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि कहीं न कहीं कांग्रेस के इस धार्मिक झुकाव और राजनीति का वास्ता है.

बहरहाल राजनीतिक विशेषज्ञ गिरिजा शंकर के अनुसार कांग्रेस का वर्तमान रुख केवल उसकी सत्ता पाने की बदहवासी है और ये सारे फैसले उसी बदहवासी में बिना किसी रणनीति के लिए गए हैं.

वे कहते हैं, ‘न तो यह कांग्रेस का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ है और न ही यह उनकी कोई रणनीति. कांग्रेस यह सारे फैसले निराशा में कर रही है. क्योंकि तीन बार लगातार चुनाव हारने के बाद यह चुनाव वह किसी भी तरह से जीतने के लिए बेकरार हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसीलिए उसी बेकरारी में उन योजनाओं या घोषणाओं को भी वे अपने एजेंडे में शामिल कर रहे हैं जो उनकी राजनीति में कभी रही ही नहीं. दरअसल बात बस ये है कि भाजपा या शिवराज से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस इन रास्तों पर जा रही है. यह इनकी कोई रणनीति नहीं है, नीतिगत रूप से लिया कोई फैसला नहीं है. एक तरह से यह बस जीतने की बदहवासी है.’

भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कांग्रेस की हालिया घोषणाओं पर कहते हैं, ‘वे कोई हिंदुत्व की बात नहीं कर रहे. केवल चुनावों के समय इन मुद्दों पर माहौल बनाने की कोशिश करते हैं. क्या राम सेतु को कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया? क्या राम मंदिर की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 2019 के बाद हो, कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में यह मांग नहीं रखी? कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में बतौर सरकार राम के अस्तित्व को नकारने का शपथपत्र दाखिल करती है और आज राम की बात करती है.’

वे आगे कहते हैं, ‘आज वे गोशाला बनाने की भी बात कर रहे हैं, लेकिन इन्होंने ही मध्य प्रदेश में जो गोचर भूमि (चरनोई की जमीन) कहलाती थी, उसे गोवंश से हड़प लिया. यानी कि दिग्विजय सिंह के शासनकाल में कांग्रेस ने गायों को चरने के लिए जमीन भी नहीं छोड़ी. आज गाय अगर सड़कों पर आई हैं तो इनके कारण. इतने ही हितैषी हैं तो बताएं कि जो जमीन इन्होंने छीनी थी क्या उसे वापस करेंगे?’

साथ ही रजनीश का कहना है कि राम गमन पथ को शिवराज सरकार विकसित कर चुकी है, लेकिन कांग्रेस केवल चुनाव की दृष्टि से मुद्दा उछाल रही है.

यह पूछे जाने पर कि क्या कांग्रेस भाजपा की हिंदुत्व की पिच पर ही लड़ने की तैयारी कर रही है, इस पर रवि सक्सेना कहते हैं, ‘सबसे पहले अगर भगवान राम की बात की तो महात्मा गांधी ने की, रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम. वैष्णव जन की बात महात्मा गांधी ने की. राम राज्य की परिकल्पना सबसे पहले महात्मा गांधी ने की. हम तो राम को तब से आत्मसात किए हुए हैं. यह जरूर है कि राम के नाम पर हम पाखंड नहीं करते हैं. अयोध्या के राम मंदिर का दरवाजा खुलवाने राजीव गांधी स्वयं गए थे. हमने ताला खुलवाया. राम लला तो ताले मे बंद थे. हमने ताला खुलवाकर पूजा-अर्चना चालू करवाई. आरती हमने शुरू करवाई. लेकिन भाजपा के पांखंडियों को यह रास नहीं आया और उन्होंने इमारत को ही तोड़ दिया. अब रामलला टाट में और भाजपा भी ठाठ में.’

वे आगे कहते हैं, ‘भाजपा केवल वोट की राजनीति करती है, न उन्हें राम से मतलब है और न ही दलित से, न मुसलमान से और न हिंदू से और न गाय से और गोबर से, और न 370 से.’

हालांकि, जानकार बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में हार की समीक्षा के लिए एके एंटनी की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पार्टी की छवि अल्पसंख्यक समर्थक से ज्यादा ‘हिंदू विरोधी’ की बन गई है, गुजरात, कर्नाटक या अब मध्य प्रदेश हो, कांग्रेस बस उस छवि को ही बदलने की कोशिश कर रही है.

बहरहाल, प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस की इन कवायदों का चुनाव परिणाम में उसके पक्ष में असर दिखेगा?

राजनीतिक टिप्पणीकार लोकेंद्र सिंह कहते हैं, ‘प्रारंभिक तौर पर तो इसका फायदा होता नहीं दिखता. भारतीय समाज इतनी जल्दी उनकी यह छवि स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है. अभी जो दिग्विजय सिंह कहते हैं कि जीतने पर राम गमन पथ बनाएंगे तो समाज उसको प्रतिक्रिया स्वरूप देखता है कि अब क्यों आपको राम की चिंता हो रही है जबकि आपने तो सुप्रीम कोर्ट में राम के अस्तित्व को ही नकारा था. इसलिए अभी उनके कैलाश मानसरोवर या कहीं भी जाने पर लोग उन्हें संदेह की दृष्टि से देखते हैं. हालांकि, फायदे का आकलन भविष्य पर निर्भर है लेकिन समाज की प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि अभी तो कांग्रेस को उसी दृष्टि से देखा जा रहा है कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली.’

लोकेंद्र गुजरात में भी कांग्रेस को उसके ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का फायदा न होने की बात करते हैं और कहते हैं कि जो फायदा वहां मिला वह वर्ग संघर्ष का मिला.

गिरिजा शंकर भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं. वे कहते हैं, ‘कांग्रेस को यदि लगता है कि गुजरात में इन नीतियों के कारण फायदा मिला तो मैं ऐसा नहीं मानता. दरअसल, इसका आकलन करना बहुत मुश्किल है कि मंदिर में जाने के कारण किसी ने वोट दिया या नहीं जाने के कारण वोट दिया. ऐसा कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं इस बात को मापने का कि जो कुछ सीट कांग्रेस की वहां बढ़ीं, वह मंदिर जाने के कारण बढ़ी हैं. वहां हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और तमाम लोग जो थे, उनको जोड़ने के कारण कांग्रेस को कहीं न कहीं फायदा मिला.’

(दीपक गोस्वामी स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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