प्रासंगिक

‘हिंदी का भला इसी में है कि उसको फौरन राजभाषा पद से हटा दिया जाए’

‘लय के नाविक’ के रूप में प्रसिद्ध हिंदी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना से कृष्ण प्रताप सिंह की बातचीत.

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नरेश सक्सेना (फोटो साभार: हिंदी कविता)

‘लय के नाविक’ के रूप में प्रसिद्ध हिंदी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की हमारी सांस्कृतिक दुनिया में तो विशिष्ट उपस्थिति है ही, वे अपनी बहुआयामी काव्येतर सक्रियताओं के लिए भी जाने जाते हैं. अपनी अनुभूतियों, संवेदनाओं और सृजन की मौलिकता, गुणवत्ता व वस्तुनिष्ठता को लेकर वे कितने सतर्क रहते हैं, साथ ही साहित्य को ‘प्रायोजित सृजन व प्रकाशन का उद्योग’ बनाना चाहने वालों की जमात से कितने अलग, इसे समझने के लिए जानना चाहिए कि अभी तक, जब वे अपने अस्सीवें वसंत की देहरी पर खड़े हैं, उनके कुल मिलाकर दो ही कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं-पहला: ‘समुद्र पर हो रही बारिश’ और दूसरा: ‘सुनो चारुशीला’. अलबत्ता, ये दोनों ही बहुचर्चित रहे हैं और उनकी चुनी हुई कविताओं का एक संग्रह ‘नरेश सक्सेना और उनकी चुनिंदा कविताएं’ नाम से भी छपा है. पेश हैं पिछले दिनों लय के इस नाविक से की गयी लंबी बातचीत के प्रमुख अंश:

पहले ही साफ कर दूं, आप ऐसे व्यक्ति से बात कर रहे हैं, जिसकी पत्रकारीय उतावली उसे कवियों और कविताओं के गूढ़ार्थों के साथ बहुत देर तक रहने की अनुमति नहीं देती.

बेवजह अपराधबोध के शिकार मत होइए. आजकल बहुत से कवि भी रिपोर्टिंग की ही तर्ज पर कविताएं रच रहे हैं. बिना समझे कि भले ही कविता कथ्य पर टिकी होती है, कथ्य कविता नहीं हुआ करता. महत्व के लिहाज से उसका नम्बर इसके बाद आता है कि कविता में जो कुछ भी कहा गया, कैसे कहा गया? यानी कवि का अन्दाज-ए-बयां क्या है?

हम उद्धृत करते हैं-‘कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज-ए-बयां और’ तो इसी की ताईद कर रहे होते हैं. मेरे कहने का मतलब है कि मैं कोई नई बात नहीं कह रहा. लेकिन मुझे दुःख है कि कई समकालीन कवि अपने सृजन में इस जरूरी बात की उपेक्षा कर रहे हैं. अन्दाज-ए-बयां पर कम और कथ्य पर जरूरत से कहीं ज्यादा निर्भर कर रहे हैं. मैं उनसे कहना चाहता हूं और मैं ही क्या, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी कहा ही था, कि समय और समाज में बदलावों के साथ कवि कर्म लगातार कठिन होता जाता है. सो, आज कविताएं रचना मुश्किल ही नहीं, असंभव काम है…लेकिन, वे इस काम को असंभव ही रहने दें, तो ठीक, इतना आसान, मेरा मतलब है, सस्ता न करें.

समझ गया, लेकिन वे कविता को सस्ती करने से कैसे परहेज बरत सकते हैं, जब हिंदी भाषा का हाल भी कुछ अलग नहीं है. उसे भी टके सेर कर दिया गया है.

ठीक कह रहे हैं. इसीलिए तो मैं कहता हूं कि हिंदी का भला इसी में है कि उसको फौरन राजभाषा पद से हटा दिया जाये. आखिर अब तक क्या हासिल क्या कर पाई है वह राजभाषा बनकर? एक तो उसका यह पद हाथी के दांतों जैसा है, जो खाने के और होते हैं, दिखाने के और. दूसरे, इस दिखावे की बिना पर वह अन्य भारतीय भाषाओं की घृणा, दूसरे शब्दों में कहें तो सौतियाडाह, झेलती रहने को अभिशप्त हो गई है. उनके साथ समतल पर नहीं चल पा रही. मैं पूछता हूं कि वह राजभाषा न रहे, जो वह वास्तव में अभी बन भी नहीं पायी है, तो किसी भारतीय भाषा को उसके कथित साम्राज्यवाद का भय क्यों सतायेगा? इसका प्रतिप्रश्न यह है कि किसी भी अन्य भाषा को राजभाषा या राष्ट्रभाषा बना दिया जाये, हिंदी से क्या छिन जायेगा, जब इस बिना पर उसे कभी कुछ मिला ही नहीं? वह बिना राजभाषा पद के भी अपना काम चला लेगी, लेकिन ज्ञान की भाषा बने बिना तो न उसका निस्तार होने वाला है, न उसके समाज का.

काश, हमारे सत्ताधीश इस बात को समझते!

सचमुच नहीं समझते. इससे भी बड़ी मुश्किल यह है कि हिंदी के संदर्भ में, उसके समाज के उन्नयन के लिहाज से जो सबसे जरूरी बात है, उसे ज्ञान की भाषा बनाये जाने की, वह होती ही नहीं. जानबूझकर नहीं की जाती. अभी तो कई मायनों में वह अज्ञान की ही भाषा बनी हुई है. उसके कथित अलम्बरदार समझते नहीं कि दुनिया के उन्हीं देशों ने ठीक से तरक्की की है, जिन्होंने अपनी भाषा को ज्ञान की भाषा बनाया. यहां तरक्की से मेरा आशय सिर्फ आर्थिक तरक्की से नहीं, सामाजिक व सांस्कृतिक तरक्की से भी है. मैं कहता हूं कि जैसे सृजन वैसे ही ज्ञानार्जन भी अपनी भाषा में ही बेहतर और मुकम्मल होता है. वरना तो वही होता है जो नहीं होना चाहिए. अमर्त्य सेन जैसी हमारी नोबेल पुरस्कारजयी प्रतिभाओं का भी अपनी अंग्रेजी किसी और से दिखवा लेने की नियति से पीछा नहीं छूटता.

तो आप ही बताइये, ऐसे में हिंदी को ज्ञान की भाषा कैसे बनाया जा सकता है?

मैं आपको बताऊं, भाषा सभी कलाओं के बाद आई है. सबसे पहले संगीत आया, क्योंकि वह सिर्फ ध्वनियों से काम चला सकता था. बाद में स्वर और लय उसके आधार बने. ताल तो खैर हमें जन्म से ही मिली है. भाषा नहीं थी तो हम खुद को अपनी विभिन्न मुद्राओं से ही तो अभिव्यक्त करते थे. इन अभिव्यक्तियों में रंग, आपको पता है कि, जीवन की जिजीविषा से आते हैं. सारी कलाओं के बाद आने के चलते भाषा की यह सहूलियत है कि वह उन सबका सदुपयोग कर सकती है. जिस दिन हिंदी के लोग, खासकर उसके साहित्यसेवी, भाषा की इस सहूलियत का समुचित उपयोग सीख जायेंगे, हिंदी को ज्ञान की भाषा बनने से कोई नहीं रोक सकेगा….इसी कारण मेरे निकट अच्छे कवि की एक कसौटी यह भी है कि वह इस सहूलियत के उपयोग में कितना निष्णात है. उसे महसूस करना चाहिए कि इन कलाओं के बिना कविता नहीं होती. हो ही नहीं सकती. पूर्ण तो कतई नहीं हो सकती.

आपकी एक पुरानी कविता याद आती है, गिरने वाली-‘गिरना’ शीर्षक. उसमें कहते हैं आप-खड़े क्या हो बिजूके की तरह नरेश… गाज की तरह गिरो/ उल्कापात की तरह गिरो/ वज्रपात की तरह गिरो. अपनी उस बात पर अभी भी कायम हैं या गिरने का कोई नया तरीका…?

माफ कीजिएगा, जिस कविता को आप गिरने की कविता कहकर संबोधित कर रहे हैं, मेरे निकट वह गिरने की नहीं, उठने की कविता है. लेकिन पूछते हैं तो बता देता हूं, अभी भी मैं समाज के कोढ़ों और विद्रूपताओं पर वज्र की तरह ही गिरना चाहता हूं. शब्दों से ही नहीं कर्मों की मार्फत भी. अब तक किसी और तरीके से नहीं गिर सका तो अब गिरने के किसी नये तरीके का सवाल ही कहां उठता है?

अभी कह रहे थे आप कि हिंदी में कुछ खास पेशों को ही काव्य सृजन के अनुकूल या उर्वर माना जाता है. आप तो अनुर्वर पेशे से इसमें आये, अभियांत्रिकी के क्षेत्र से. इससे कोई असुविधा हुई आपको?

नहीं-नहीं, मैंने किसी असुविधा की आशंका ही पैदा नहीं होने दी. दरअसल, मुझे आज भी नहीं मालूम कि वह कौन-सा ज्ञान है, जो कविता का विरोध करता हो. मेरे निकट तो कविता भी संवेदनात्मक ज्ञान ही है. फिर मैं अपनी दुनिया से सृजन की दुनिया में अकेला नहीं आया. अपने पेशे के अनेक बिंब और प्रतीक वगैरह भी साथ ले आया. तभी मेरी कविताओं के लिए अणु, नाइट्रोजन और कार्बन जैसे तत्व या शब्द न अपरिचित हैं, न वर्ज्य या त्याज्य. वे उनकी शक्ति हैं. मनुष्यता का सत्य खोजने में मददगार. हां, मैंने कभी भी अपने सृजन को करियर की तरह नहीं लिया. उससे अपना बायोडाटा समृद्ध करने के फेर में नहीं पड़ा, क्योंकि कवि के काम को वैज्ञानिक के काम से ज्यादा बड़ा मानता हूं क्योंकि कवि से हर बार एक नई चीज मांगी जाती है.

याद होगा आपको, अरसा पहले ‘परसाई जी की बात’ में परसाई जी ने आपको चेताया था कि अच्छी कविता पर सजा भी मिल सकती है. वह इस बीच कितनी मिली आपको?

जो भी और जितनी भी मिली, मैंने बिना उफ किए कुबूल की. जब तक नहीं मिली, क्यों नहीं मिली, इसका उत्तर भी उसी कविता में है. उस शक में, जो मैंने परसाई जी की बात पर नहीं अपनी कविता पर किया था.

इस समय को किस रूप में देखते हैं. खासकर अपने देश के संदर्भ में?

हमारा मध्यवर्ग पतित तो पहले से ही था. भूमंडलीकरण की शक्तियों ने जैसे-जैसे देश को बाजार बनाने में सफलता पाई है, यह और संस्कारहीन होता गया है. तिस पर इसकी अंग्रेजी माध्यम वाली शिक्षा प्रणाली दो नंबर के दिमाग पैदा करके रही-सही कसर भी पूरी कर दे रही है. इसको न अपने देश की चिंता है और न समाज की. सो, तेजी से अमेरिकन हो रहा है या आॅस्ट्रलियन. सपने भी उन्हीं जैसे देखने लगा है और उनके बारम्बार मुंगेरीलाल के हसीन सपनों में बदल जाने से भी कोई सबक नहीं ले रहा. देश की बड़ी आबादी हताश और निराश है तो इसकी बला से. किसानों की भूमि तक उनकी दुश्मन हो गयी है, इस कदर कि वे समझ नहीं पा रहे कि उसका क्या करें और आत्महत्याएं करने को अभिशप्त हैं तो क्या हुआ? इस वर्ग के बदले हुए नायक तो सही-सलामत हैं. किसी को तो पूछना चाहिए देशभक्ति के नकली अलम लिए फिर रहे इसके नायकों से कि उन्होंने देश के लिए किया क्या है?

कौन और कैसे पूछे. कई लोग कहते हैं कि राजनीति में कोई प्रतिपक्ष ही नहीं बचा.

वाकई कोई प्रतिपक्ष नहीं बचा. बचा होता तो उन लोगों के लिए लड़ता जरूर दिखता, जिन्हें अब तक जबरन भूखा-प्यासा और निरक्षर बनाये रखा गया है. तब युद्ध और प्यार में सब-कुछ जायज है जैसे कुतर्क न चलते. भलमनसी की बातें होतीं. सद्भाव के पैरोकार विलुप्त न होकर न रह जाते. मुझे तो लगता है कि डाॅ. राममनोहर लोहिया के बाद देश में कोई नेता ही नहीं हुआ. विडम्बना यह कि जिन कम्युनिस्टों से ढेर सारी उम्मीदें थीं, गहराती हताशा और निराशा के चलते उनसे कोई सार्थक हस्तक्षेप करते नहीं बन रहा.

कहीं इसके पीछे हिंदी समाज की…

नहीं, नहीं. हिंदी समाज इतना बुरा-भी नहीं है. दरअसल, उसकी हैसियत नहीं रहने दी गई है कोई. इसलिए वहां जीवन और कविता में फांक है. माना जाता है कि कविता से क्या होता है? राजनीति पर तो इसका कोई असर होता नहीं. उसमें लोग पढ़े लिखे होकर भी निरक्षर हैं या अंग्रेजी में पढ़े हुए हैं. वे विचारों को ठीक से ग्रहण ही नहीं कर पाते. इसीलिए कविता और जीवन में फांक है. पश्चिम का संस्कार दूसरा है. उनके पास जो समुद्र है वह हमारे पास नहीं है अंग्रेजी में जो एमए में टाॅप करके लेक्चरर वगैरह हो जाता है, वह भी मजे में रहता है. हिंदी में कवि अध्यापक हो तो उसकी अकारण भी बल्ले-बल्ले हो जाती है, जबकि एकदम से मसिजीवी हो तो उसकी गुजर-बसर मुश्किल हो जाती है. विडम्बना यह भी है कि हिंदी में सृजन और प्रकाशन की राह में इतने रोड़े हैं कि कविताएं अपने वास्तविक पाठकों तक पहुंच ही नहीं रहीं.

(कृष्ण प्रताप सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)