भारत

भागवत जी! पहले अपनी परंपरागत सोच के दायरों से तो बाहर निकल आते, फिर संवाद करते

संवाद का भ्रम रचकर बहुत कुछ हासिल करने की संघ की ताज़ा महत्वाकांक्षा की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह अपने घर का दरवाज़ा चौड़ा और ऊंचा करने को तैयार नहीं है.

New Delhi: RSS chief Mohan Bhagwat speaks on the 2nd day at the event titled 'Future of Bharat: An RSS perspective', in New Delhi, Tuesday, Sept 18, 2018. (PTI Photo) (PTI9_18_2018_000190B)

मोहन भागवत (फोटो: पीटीआई)

आज की तारीख में यह एक खुला हुआ तथ्य है कि खुद को ‘सांस्कृतिक’ कहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने स्वयंसेवकों की मार्फत न सिर्फ केंद्र व राज्यों समेत देश की ज्यादातर सरकारों के नेतृत्व बल्कि शीर्ष संवैधानिक पदों पर भी कब्जा कर लिया है.

लेकिन उसकी असुरक्षा ग्रंथि है कि उसे फिर भी चैन नहीं लेने दे रही और अचानक यह महसूस कराने पर उतर आयी है कि उसके बारे में गलतफहमियां बढ़ती जा रही हैं और उनसे निजात पाने के लिए उसे भारत के भविष्य के बारे में अपने दृष्टिकोण को नए सिरे से परिभाषित व प्रचारित करने की जरूरत है.

उसके यह महसूस करने का स्वागत किया जा सकता था, बशर्ते अपनी जन्मशती से महज छह साल दूर खड़े ‘दुनिया के सबसे बड़े’ संगठन के तौर पर वह ऐसा कोई संकेत देता कि जिस ‘हिंदू राष्ट्र’ की स्थापना उसका घोषित लक्ष्य है, उसके लिए लोकतांत्रिक भारत से कभी प्रत्यक्ष तो कभी प्रच्छन्न दुश्मनी बरतने से परहेज बरतने की सोचेगा.

सांस्कृतिक संगठन के चोले में राजनीति करने का ‘निहुरे-निहुरे’ ऊंट चराने या धान कूटने व कांख ढकने का उसका खेल वाकई कुछ ज्यादा दिलचस्प हो जाता अगर वह दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को ‘मनुस्मृति’ के तर्क से दूसरे दर्जे का नागरिक मानने की अपने संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार और ‘गुरु जी’ यानी माधव सदाशिव गोलवलकर की परम्परागत सोचों के दायरों से थोड़ा भी बाहर निकल जाती.

लेकिन राजधानी में संघ का दृष्टिकोण बताने के नाम पर तीन दिनी ‘संवाद’ में सरसंघचालक मोहन भागवत जिस तरह उसके पुराने रवैये की ही ताईद करते नजर आये, उससे ऐसे किसी संकेत की राह एकदम से बंद हो गई लगती है.

चूंकि संघ में लोकतांत्रिक संवाद और सवाल जवाब की परंपरा एकदम से रही ही नहीं है, वह तो देश के लोकतंत्र का उस पर कुछ ऐसा दबाव है कि उसे खुद को लोकतांत्रिक और संवादकामी जताने को विवश होना पड़ा है, इसलिए अनभ्यासे विषम शास्त्रम को सत्य सिद्ध करते हुए उनका यह संवाद भी उनके बहुप्रचारित ‘बौद्धिकों’ के स्तर से ऊंचा नहीं उठ पाया.

गत आठ सितंबर को शिकागो में विश्व हिंदू कांग्रेस के संबोधन में अल्पसंख्यकों को नीचा दिखाने के गर्हित उद्देश्य से हिंदुओं को शेर और हिंदू विरोधियों को जंगली कुत्ते कह आये भागवत ने इस संवाद में देश की विविधताओं में भेदभाव न करने की बात कही, तो भी याद दिलाना नहीं भूले कि डाॅ. हेडगेवार ने भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ ही बताया था.

उनके द्वारा मुसलमानों के बगैर हिंदुत्व को अधूरा बताकर यह सफाई देना भी कि हिंदू राष्ट्र का यह मतलब नहीं है कि भारत में मुसलमान होने ही नहीं चाहिए, इस कड़वी सच्चाई को छिपाने की जुगत के सिवा कुछ नहीं है कि उसका अभीष्ट हिंदू राष्ट्र कभी बना तो उसमें मुसलमान तो क्या सारे गैरहिंदू ‘सीमित समय तक और बिना किसी अधिकार के’ रहेंगे.

गुरु गोलवलकर के शब्दों में ‘हिन्दुस्तान में राष्ट्र का अर्थ हिंदू है…गैरहिंदू उसमें रह सकते हैं, लेकिन सीमित समय तक और बिना किसी अधिकार के…उनके सामने दो ही विकल्प हैं-या तो वे राष्ट्रीय जाति के साथ मिल जायें और उसकी संस्कृति अपना लें या जब तक वह अनुमति दे, उसकी दया पर रहें और जब कहे देश छोड़कर चले जायें…. उन्हें हिंदू जाति में मिलकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व गंवाना होगा या हिंदू राष्ट्र की गुलामी करते हुए बिना कोई मांग किये…यहां तक कि बिना नागरिकता के अधिकार के रहना होगा.’

कोई तो बताये कि संघ के गुरु की इस ‘दो टूक’ के बाद संवाद की मार्फत उसके बारे में और क्या जानना बाकी रहता है?

कुछ नहीं, तभी तो उसके भीतर के तानाशाही भरे जातिवादी व अलोकतांत्रिक ढांचे पर (जिसके कारण उसका हर सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी का नाम देेकर जाता है और जो अब तक एक अपवाद को छोड़कर चितपावन ब्राहमण ही होता आया है) सवाल उठने पर भागवत ने जवाब दिया-‘संघ के अंदर आकर देखो, तब उसकी असलियत पता चलेगी’, तो कई लोगों को कवि हरिवंशराय बच्चन की ‘मधुशाला’ की पंक्तियां याद आ गयीं: ‘बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे वह मतवाला, पी लेने पर तो उसके मुंह पर पड़ जायेगा ताला’ और वे पूछने लगे कि अगर इन्हीं पंक्तियों की तर्ज पर भागवत दास और द्रोहियों दोनों में संघ की जीत का एलान करना चाहते हैं तो यह तो लोग पहले से ही जानते और मानते आ रहे हैं कि संघ में जिन अंधताओं की पैरोकारी की जाती है, एक बार लत लग जाने पर उनसे मुक्ति मुमकिन नहीं रह जाती.

क्योंकि ‘मूंदहु आंखि कतहुं कछु नाहीं’ का प्रतिगामी सोच उससे पीड़ित को, और तो और, अपने आगे-पीछे और अगल-बगल भी कुछ प्रेरणास्पद नहीं देखने देता. इसका सबसे बड़ा प्रमाण महिलाओं के लिए संघ के दरवाजे बंद होने को लेकर पूछे गये एक सवाल का खुद भागवत द्वारा डा. हेडगेवार के हवाले से दिया गया यह जवाब है कि उस दौर में (यानी 1925 में, जब संघ की स्थापना की गई) महिलाओं व पुरुषों के एक साथ काम करने का माहौल ही नहीं था और जब तक यह नहीं लगेगा कि ऐसा माहौल बन गया है कि बदलना चाहिए, सब कुछ ऐसे ही चलेगा.

अब इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहें कि न संघ की स्थापना के वक्त डाॅ. हेडगेवार यह देख सके कि दुर्गावती देवी, साथी भगवतीचरण वोहरा की जीवनसंगिनी होने के कारण क्रांतिकारी जिन्हें दुर्गा भाभी कहा करते थे, बेटे शचींद्र को गोद में उठाये हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन/आर्मी में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी आॅपरेशनों में भाग ले रही हैं और न अभी, जब देश की महिलाओं ने शायद ही किसी क्षेत्र में पितृसत्ता के चोंचलों की पोल खोलने में कोई कोर-कसर बाकी रखी हो, भागवत को ही संघ में व्याप्त पुरुष महिला भेदभाव में कुछ गलत दिखाई देता है.

जानें किसका इंतजार कर रहे हैं वे, जो आकर उन्हें आश्वस्त करे कि अब देश इतना बदल गया है कि पुरुष व महिलाएं एक साथ काम कर सकते हैं और तब वे संघ और राष्ट्र सेविका समिति के बीच आमदरफ्त की सोचें!

पता नहीं, इसके बावजूद कैसे वे कहते हैं कि संघ के कामों के कारण उसकी शक्ति खासी बढ़ गई है. उनका यह कथन तो उसकी शक्तिहीनता की ही गवाही देता है. शक्ति और साथ ही इच्छा होती तो वह महिलाओं व पुरुषों के एक साथ काम करने के लिए माहौल अनुकूल होने की प्रतीक्षा करता या उसे अनुकूल बनाने में लग जाता?

अभी तक तो उसकी जो शक्ति है भी, वह उसकी स्वाभाविक इच्छा का ऐसा माहौल बनाने में जाया हुई जा रही है, जिसमें गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे एक पार्टी कार्यकर्ता द्वारा उनका पैर धोकर पीने से अभिभूत हो जाते और उसे कृष्ण व सुदामा के प्रसंग से जोड़ने लग जाते हैं.

यही कारण है कि संघ के ‘असीम विस्तार’ की तमाम दर्पोक्तियों के बावजूद दुनिया भर में ऐसी एक भी बड़ी शख्सियत नहीं है, जो संघ से बाहर की हो और उसकी तारीफ करती हो.

जहां तक भागवत द्वारा आजादी की लड़ाई में कांग्रेस का बड़ा रोल ‘स्वीकार लेने’ की बात कही जा रही है, उसमें कोई अचरज की बात इसलिए नहीं है कि संघ का लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं के लिए संघर्ष करने या उनमें योगदान देने का कोई इतिहास नहीं रहा है. न आजादी के पहले का और न ही बाद का.

इसीलिए उसे इतने साल बाद यह ‘प्रमाणित’ करना पड़ रहा है कि डाॅ. हेडगेवार ने क्रांतिकारियों के लिए हथियार जुटाने और उनकी भूमिका के बारे में लोगों को जागरूक करने का काम किया था.

इतिहासहीनता की इसी ग्रंथि के चलते महात्मा गांधी की हत्या, आपातकाल या बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, जब भी उस पर प्रतिबंध लगे, उसने उनके खिलाफ लोकतांत्रिक ढंग से लड़ने के बजाय तत्कालीन कांग्रेस सरकारों की लप्पो-चप्पो करके ही उन्हें हटवाने की कोशिशें कीं.

इस चक्कर में उसने उस आपातकाल के समर्थन से भी परहेज नहीं किया था, जिसके खिलाफ उसके स्वयंसेवक आजकल बेवजह भी गरजते रहते हैं.

इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के चीफ रहे टीवी राजेश्वर ने अपनी पुस्तक ‘द क्रूशियल इयर्स’ में लिखा है कि उसके पूर्व सरसंघचालक बालासाहब देवरस आपातकाल के समर्थन में थे और इसे जताने के लिए इंदिरा गांधी व संजय गांधी से मिलना चाहते थे लेकिन न इंदिरा गांधी और न ही संजय ने इस मुलाकात की सहमति दी थी क्योंकि उन्हें डर था कि इससे गलत राजनीतिक संदेश जायेगा.

दूसरे पहलू से देखें तो सच्चाई यह है कि संघ जानबूझकर ऐसे गलत राजनीतिक संदेशों पर निर्भर करता रहा है. आज वह जिस स्पष्टता और पारदर्शिता के लिए व्यग्र है, उन दोनों से उसे हमेशा एक किस्म की एलर्जी रही है. उसका बार-बार यह कहना भी कि इस एलर्जी के तहत ही है कि न वह राजनीतिक संगठन है और न उसके हर काम को भाजपा से जोड़कर देखा जाना चाहिए.

इसी के तहत उसने प्रायः हर चुनाव से पहले आने वाली उन खबरों का कभी खंडन नहीं किया, जिनमें उसके हजारों कार्यकर्ताओं के भाजपा के पक्ष में कूद पड़ने का दावा किया जाता रहा है.

अब जब भाजपा भी उसकी इस उपलब्धि पर उन्मत्त होती नहीं थकती कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व प्रधानमंत्री समेत देश के तीनों शीर्ष पदों पर स्वयंसेवकों को बैठा दिया गया है, उसके कई स्वयंसेवक खुल्लमखुल्ला राजनीति करते हुए मंत्री पदों का लुत्फ ले रहे हैं और भागवत उनका बचाव करते हुए कह रहे हैं कि स्वयंसेवक संघ से सिर्फ विचार लेते हैं और अपने क्षेत्र में क्या करना है, इसका फैसला खुद करते हैं, तो भी उसमें स्पष्टता व पारदर्शिता का हाल ऐसा है कि इस ‘संवाद’ में अपने अनेक विरोधियों को आमंत्रित करने के डपोरशंखी एलान के बाद उसने आमंत्रितों की सूची तक सार्वजनिक नहीं की है.

वैसे भी ‘वर्क टुगेदर सेपरेटली’ का पुराना तर्क संघ के बहुत काम आता रहा है. इसी की बिना पर वह अपने किसी भी स्वयंसेवक के किये-धरे की जिम्मेदारी लेने से साफ कन्नी काट जाता रहा है. गोरक्षा के नाम पर उपद्रवों व हत्याओं में अपने आनुषंगिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की लिप्तता की शर्म भी वह इसी तर्क से महसूस नहीं करता.

अब कई प्रेक्षक उसे रहस्यमयता की जिस धुंध से बाहर आने को बेकरार बता रहे हैं, वह भी इसीलिए फैली है कि अब तक वह उसे अपने लक्ष्यसंधान में सहायक मानता रहा है. इस बाबत उसका लोहा मानते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पिछले दिनों ठीक ही कहा कि 2017 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की आड़ में उनका असली मुकाबला संघ से ही हुआ, जो यों तो कहीं नजर नहीं आता था, नेपथ्य से वार पर वार करता जाता था.

भाजपा के लिए उपयोगी तमाम झूठे प्रचार उसने ही किए. ऐसे में क्या आश्चर्य कि कई प्रेक्षकों की निगाह में संघ के इस संवाद का इतना ही मतलब है कि अब जब उसने भाजपा की मार्फत खुद नेपथ्य में रहते हुए अपने कई राजनीतिक लक्ष्य साध लिये हैं, उसका खुले में आने का मन हो रहा है. क्योंकि अब तक उसके पास एक भी ऐसी नजीर नहीं है, जिससे वह सिद्ध कर सके कि उसने कभी किसी से संवाद करके कुछ सीखा है.

पिछले दिनों पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी उसे कुछ सिखाने नागपुर गये तो इन्हीं भागवत ने उनके मुंह पर ही यह कहकर उन्हें दरकिनार कर डाला था कि संघ, संघ है और प्रणब, प्रणब.

जाहिर है कि संवाद का भ्रम रचकर बहुत कुछ हासिल करने की संघ की ताजा महत्वाकांक्षा की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि वह अपने घर का दरवाजा तो चौड़ा और ऊंचा करने को तैयार नहीं है, तिस पर बाहर निकलकर विरोधियों तक फैली व्यापक स्वीकार्यता के हाथी पर सवार होकर अकड़ता हुआ घर के अंदर आना चाहता है.

(कृष्ण प्रताप सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

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