भारत

…लेकिन जनता को सियासी बूचड़खाने से कौन बचाएगा?

‘सर कलम कर दूंगा. हाथ काट दूंगा. पैर तोड़ दूंगा. फांसी पर लटका दूंगा. फांसी चढ़ जाऊंगी. गाय मत खाओ. मंदिर बनकर रहेगा. मंदिर के लिए जान दे देंगे. मंदिर के लिए जान ले लेंगे. वंदे मातरम गाओ. भारत माता की जय बोलो वरना पाकिस्तान चले जाओ. किसान को गोरक्षकों ने पीटा तो अच्छा किया. सिर काट लाओ, एक करोड़ देंगे.’

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‘सर कलम कर दूंगा. हाथ काट दूंगा. पैर तोड़ दूंगा. फांसी पर लटका दूंगा. जान ले लूंगा. जान दे दूंगा. गाय खाओ. गाय मत खाओ. हमें जिता दो हम गाय बैन नहीं करेंगे. हम जीत जाएंगे तो गाय बैन कर देंगे. मंदिर बनकर रहेगा. मंदिर के लिए जान दे देंगे. मंदिर के लिए जान ले लेंगे. बंदे मातरम गाओ. भारत माता की जय बोलो वरना पाकिस्तान चले जाओ. गाय ले जा रहे किसान को गोरक्षकों ने पीटा तो अच्छा किया. सीएम का सिर काट लाओ, एक करोड़ देंगे. विरोधियों को पाकिस्तान भेज देंगे.’

ये शर्मनाक जुमले पिछले कुछ दिनों में भाजपा नेताओं के मुंह से सुने गए हैं. ये बयान किन्हीं गुंडों, बदमाशों, लंठ या माफ़िया के नहीं हैं, ये बयान उन लोगों के मुंह से निकले हैं जिन्हें लोकतंत्र को चलाने का काम सौंपा जाता है, जो जनता के लिए क़ानून बनाते हैं, जो प्रशासन संभालते हैं, जिन्हें जनता का प्रतिनिधि माना जाता है, जिन्हें जनता अपना मत देकर पांच सालों के लिए अपना सियासी नसीब सौंप देती है. ये सारे बयान किसी विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री या मंत्री के मुंह से निकले हैं.

ऐसे नेताओं की अच्छी ख़ासी संख्या है जिनके लिए अब भारत में कोई समस्या नहीं बची है. उनके लिए मंदिर, मस्जिद, गाय, राम, रहीम, हिंदू-मुसलमान ही बचा है जिसके नाम पर भड़काने वाले बयान दिए जाएं. ऐसा लगता है कि जनता ऐसे लोगों सिर्फ़ इसीलिए चुनती है कि वे दंगा करने और लोकतंत्र की खटिया खड़ी करने वाली बयानबाज़ी करें.

ताज़ा बयान-बहादुर हैं हैदराबाद से भाजपा विधायक टी. राजा सिंह. सिंह ने रविवार को कहा कि वे मंदिर के लिए जान दे भी सकते हैं और जान ले भी सकते हैं. उनका दावा है कि ‘आने वाली रामनवमी तक अयोधया में राममंदिर बनकर रहेगा और जो ये कहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण किया तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे, हम उनके द्वारा ये बात कहने का इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि उनका सिर काट सकें.’

टी. राजा सिंह उस राजनीति के हिस्से हैं जो बहुसंख्यकवाद की उग्र राजनीति में यक़ीन रखती है. टी. राजा सिंह के साथ कोई मानसिक समस्या नहीं है. वे बाक़ायदा विधानसभा के सदस्य हैं. वे विधानसभा के तमाम संवैधानिक कार्यों में हिस्सा लेते हैं. वे जहां हैं, उस ज़िम्मेदार पद बैठकर यह कोई शर्म की बात नहीं है कि जिसे क़ानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी में हिस्सा लेना है, वही क़ानून-व्यवस्था के लिए ख़तरा बना हुआ है.

टी. राजा ऐसा करने वाले अकेले नहीं हैं. जब टी राजा यह बयान दे रहे थे, तभी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बयान दिया, ‘हम देशभर में गोवध पर रोक लगाने वाला एक क़ानून चाहते हैं…गोरक्षों को क़ानून का पालन करना चाहिए.’ वे क़ानून के लिए चिंतित हैं कि लेकिन यह काम सरकार पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं. गोरक्षक गोरक्षा या धर्म रक्षा का भार संभालने के लिए कैसे अधिकृत हैं, कौन सा क़ानून उन्हें यह अधिकार देता है, यह प्रश्न अपनी जगह बरक़रार है.

टी. राजा के बयान के ठीक एक दिन पहले केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर कहा, ‘राम मंदिर मेरी आस्था का विषय है. मेरे विश्वास का विषय है. मुझे इस पर गर्व है… अगर जेल भी जाना पड़े तो जाऊंगी, फांसी पर लटकना पड़े तो लटक जाऊंगी.’

गनीमत है कि उमा भारती ख़ुद फांसी पर लटकने की बात कह रही हैं. छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह ने तो सारी सीमाएं पार कर दीं. रमन सिंह ने एक पत्रकार के सवाल के जवाब में कहा, ‘अगर कोई गाय मारेगा तो उसे लटका देंगे.’

हाल ही में अलवर में गोरक्षकों की पिटाई से एक किसान की मौत हो गई. उसके बाद राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने गोरक्षकों के कृत्य को जायज़ ठहराते हुए कहा था, ‘गोरक्षकों ने अच्छा काम किया. जब वे जानते थे कि राजस्थान में गायों की तस्करी पर प्रतिबंध है तो आख़िर वे ऐसा क्यों कर रहे थे?’ गनीमत है कि गुलाब चंद कटारिया ने यह भी मान लिया कि गोरक्षकों ने क़ानून का उल्लंघन किया है.

बहुचर्चित दादरी कांड में भी भाजपा के केंद्रीय मंत्रियों और नेताओं की यही लाइन थी, अख़लाक की मौत दुखद है लेकिन उसने गोमांस खाया क्यों? यानी गोमांस खाने या न खाने की बात कन्फर्म हुए बिना केंद्रीय मंत्री और बड़े नेता मुतमईन हैं कि गोहत्या हुई है और भीड़ का न्याय जायज़ है.

हाल ही में आरएसएस प्रचारक कुंदन चंद्रावत ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का सिर काटकर लाने वाले को एक करोड़ रुपये का इनाम देने का ऐलान कर डाला था. एक वीडिया में वे बड़े गर्व से गुजरात नरसंहार का बखान करते हुए देशद्रोहियों की पहचान भी कर रहे हैं और भारत माता को तीन लाख नरमुंडों की माला पहनाने का संकल्प ले रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में भाजपा से विधायक विक्रम सैनी ने भी कुछ दिन पहले घोषणा की थी कि जो भी गाय का वध करेगा उसकी टांगें तोड़ देंगे. मज़े की बात यह है कि विधायक विक्रम सैनी 2013 में हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगे में आरोपी हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत पकड़े गए थे.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के पहले योगी आदित्य नाथ ऐसे ही बयानों के लिए चर्चित रहे हैं. उनके मुंह से ऐसी ऐसी बातें निकली हैं जो किसी लोकतंत्र में कतई स्वीकार्य नहीं हो सकतीं, लेकिन उसके इनाम स्वरूप योगी को सूबे की कुर्सी मिली है. उत्तर प्रदेश में भाजपा नेता साक्षी महराज, साध्वी प्राची, साध्वी निरंजन ज्योति आदि नेता पिछले कई वर्षों से सिर्फ़ ऐसी बयानबाज़ियों के लिए चर्चित रहे हैं.

पढ़े लिखे समझदार नेताओं ने शुमार पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक तरुण विजय भी सियासी काजल की कोठरी में घुसे तो कालिख पोतकर ही निकले. नोएडा में अफ्रीकी छात्रों पर हुए हमले के बाद भारत का बचाव करते हुए तरुण विजय बोल गए कि ‘अगर हम नस्लभेदी होते तो हमारे साथ समूचा दक्षिण क्यों होता? आप तमिल, केरल को जानते हैं, कर्नाटक और आंध्र को जानते हैं, हम उनके साथ क्यों रहते हैं? हमारे यहां तो हर तरफ अश्वेत हैं.’ हालांकि, बाक़ी भगवा ब्रिगेड के अलंबरदारों के मुक़ाबले तरुण विजय या मोहन भागवत काफ़ी शालीन और क़ानून के नज़दीक दिखे.  इतना ही क्या कम है!

भाजपा नेता गिरिराज सिंह, जो अब केंद्रीय मंत्री भी हैं, उनका पाकिस्तान प्रेम जग ज़ाहिर है. वे हर जुमले में पाकिस्तान का उच्चारण किए बगैर कोई बात ही पूरी नहीं करते. लोकसभा चुनाव के पहले उनका कहना था, ‘जो कोई भी नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहा है वो पाकिस्तान का समर्थक है, उन्हें पाकिस्तान चला जाना चाहिए.’ इस बयान पर ख़ासी किरकिरी हुई तो अड़ गए कि माफ़ी नहीं मागेंगे, चाहे जो हो जाए. तबसे वे पाकिस्तान-प्रेम प्रदर्शित करते हुए अनगिनत बयान दे चुके हैं.

संविधान से विशेष अधिकार प्राप्त सांसद और विधायक जब ऐसे बयान देते हैं तब वे समूचे संविधान और अपनी जवाबदेही को ताक पर रख देते हैं. क्या भारतीय जनता पार्टी, उसकी सरकार और भाजपा का मातृ संगठन जानबूझ कर इन चीज़ों को बढ़ावा दे रहा है? या ये सारे बयानवीर नेता संघ भाजपा के क़ब्ज़े से बाहर हो चुके हैं? अगर ऐसा है तो भी, ऐसा नहीं है तो भी, भारतीय लोकतंत्र एक उन्मादीतंत्र की ओर बढ़ रहा है, जो हर हाल में ख़तरनाक है. अवैध बूचड़खानों पर अभियान चलाने वाली सरकारों को और जनता को यह भी सोचना चाहिए कि इस डरावने ‘सियासी बूचड़खाने’ से मुक्ति कौन दिलाएगा?