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‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार की अनिवार्यता निराशाजनक’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संतोषजनक बताते हुए भोजन के अधिकार पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने कहा कि आधार लिंक नहीं करा पाने की वजह से कई लोगों को कल्याणकारी योजनाओं से वंचित कर दिया गया, जिसकी वजह से लगभग 20 लोगों की मौत हो चुकी है.

Aadhaar PTI

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने 26 सितंबर को आधार को संवैधानिक ठहराते हुए उसके कुछ प्रावधानों को निरस्त कर दिया. कोर्ट कहा कि आधार समाज के वंचित तबके को सशक्त बनाता है और उन्हें पहचान देता है.

साथ ही न्यायालय ने कहा कि मोबाइल और बैंक अकाउंट को आधार से लिंक करना असंवैधानिक है, कानून में इसका कोई प्रावधान नहीं है. कोर्ट ने आधार एक्ट की धारा 57 और धारा 33(2) को निरस्त कर दिया.

हालांकि पांच जजों की बेंच में एक जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने बहुमत के फैसले के विरोध में अपना फैसला दिया और कहा कि आधार पूरी तरह से असंवैधानिक है और जो भी डाटा इसके तहत इकट्ठा किया गया है, उसे नष्ट किया जाना चाहिए.

साल 2012 में आधार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले कर्नाटक हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज केएस पुट्टास्वामी ने फैसले का स्वागत किया है. बेंगलुरु में अपने घर पर उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘मैंने अभी पूरा फैसला नहीं पढ़ा है. लेकिन टीवी पर जो कुछ अभी तक मैंने देखा है, उसमें मेरा विचार ये है कि आधार एक्ट वित्तीय अपराधियों को पकड़ने के लिए जरूरी प्रतीत होता है. हालांकि आम नागरिक के लिए ये कोई ज्यादा फायदेमंद नहीं है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कुल मिलाकर ये फैसला ठीक और तार्किक है.’

कोर्ट ने मोबाइल, बैंक अकाउंट, सीबीएसई और नीट परिक्षाओं, स्कूल में दाखिला, निजी कंपनियां जैसी चीजों के लिए आधार की अनिवार्यता को खत्म कर दिया. हालांकि कोर्ट ने कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने और सरकार से मिलने वाली सब्सिडी लेने के लिए आधार अनिवार्य कर दिया है.

पिछले कुछ सालों में आधार से राशन कार्ड नहीं लिंक करा पाने की वजह से लगभग 20 लोगों की मौत हो चुकी है. इस संदर्भ में भोजन अधिकार के लिए काम करने वाले संगठनों ने आधार फैसले पर निराशा जताई है.

गैर-सरकारी संगठन एनसीपीआरआई की सदस्य अमृता जौहरी ने कहा, ‘ये चिंताजनक है कि कोर्ट ने कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार अनिवार्य करने वाले प्रावधान को बरकरार रखा है. ये कहा जाना चाहिए था कि पीडीएस, पेंशन, जैसी चीजें कोई दान नहीं है, बल्कि ये मानव अधिकार हैं. देश का हर एक नागरिक टैक्स देता है, इसलिए सरकार की जिम्मेदारी होती है कि लोगों को भोजन और पेंशन जैसी चीजें मुहैया कराई जाए.’

उन्होंने कहा  कि कोर्ट ने सरकार को कहा है कि इन योजनाओं से कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति छूटना नहीं चाहिए. लेकिन कोर्ट ने ये देखा नहीं कि आधार की वजह से कई लोगों को लाभकारी योजनाओं से बाहर (बहिष्कृत) कर दिया गया.

हालांकि जब कोर्ट के सामने इसके आंकड़े रखे गए थे तो कोर्ट ने कहा कि इसका कोई प्रूफ नहीं है और हमें नहीं पता कि बहिष्कार हुआ है या नहीं.

अमृता जौहरी ने इस पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा, ‘न सिर्फ सिविल सोसायटी बल्कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए लोकल कमिश्नर ने दिखाया था कि जमीनी पर लोगों को बाहर किया जा रहा है. कोर्ट ने इसे गंभीरता से नहीं लिया.’

आधार को लेकर सरकार ये भी दावे करती रही है कि आधार के जरिए बिचौलियों से बचा जा रहा है और पैसे की चोरी रोकी जा रही है. जौहरी ने कहा कि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि आधार के जरिए सरकार ने कितना पैसा बचा लिया है, कितनी फर्जी चीजें खत्म की हैं.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने सहयोगी जजों दीपक मिश्रा, आरएफ नरीमन, एके सीकरी और अशोक भूषण से उलट फैसला दिया था. उन्होंने आधार को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि सरकार को इसे मनी बिल के रूप में पास नहीं करना चाहिए था, ये संविधान के साथ फ्रॉड है.

आधार प्रोजेक्ट की आलोचक रहीं वकील उषा रामनाथन ने कहा, ‘ये बेहद महत्वपूर्ण फैसला है. पहले हम जो भी सरकार से आदेश पाते थे, सरकार उसका उल्लंघन करती थी. अब अच्छी बात है कि इस समय हमारे पास एक अंतिम फैसला है.’

उन्होंने कहा, ‘अब ये देखना है कि किस तरह उन योजनाओं को अलग किया जाएगा जिसे पहले ही इससे जोड़ दिया गया है. इस मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ का डिसेंट निर्णय बहुत महत्वपूर्ण है.

वहीं वकील एस प्रसन्ना ने कहा, ‘आधार के फैसले से ये स्पष्ट हो जाता है कि अब आधार प्रोजेक्ट का सिर्फ हड्डियों का ढांचा ही बचा है. इसके पीछे का जो उद्देश्य था कि प्राइवेट कंपनियां लोगों की निजी जानकारी ले सकेंगी, वो अब खत्म कर दिया गया है. इस फैसले में कई सारी सकारात्मक चीजें हैं.’

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ में से जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को छोड़कर बाकी के चार जजों ने आधार एक्ट को मनी बिल की तरह पास किए जाने के निर्णय को सही ठहराया है. हालांकि कोर्ट ने ये भी कहा है कि कौन सा विधेयक मनी बिल की तरह पास किया जाएगा, इसके लिए स्पीकर का फैसला ही पर्याप्त नहीं है. अगर इसमें कोई खामी है तो फैसले को चुनौती दी जा सकती है.

इस पर सतर्क नागरिक संगठन की सदस्य अंजलि भारद्वाज ने कहा, ‘कोर्ट ने कहा है कि आधार बिल को मनी बिल की तरह पास किया जा सकता था, ये बेहद चिंताजनक और गलत चलन की शुरूआत करने वाला कदम है. इस समय सरकार जिस तरह से संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करन रही है, ये फैसला इसे और बढ़ाएगी.’

उन्होंने आगे कहा कि अगर हर एक विधेयक को मनी बिल की ही तरह पास करना है तो राज्य सभा की क्या ही जरूरत है. बता दें कि मनी बिल को सिर्फ लोकसभा से ही पास कराने की जरूरत होती है. इसे राज्य सभा में पेश नहीं किया जाता है.

भारद्वाज ने ये भी कहा की आधार की वजह से होने वाले बहिष्कार और कल्याणकारी योजनाओं से बाहर किए गए लोगों की तरफ गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया. झारखंड में संतोषी की मौत आधार की वजह से हुई थी. उसे राशन नहीं दी गई क्योंकि राशन कार्ड आधार से लिंक नहीं था. उसे भोजन के अधिकार से वंचित किया गया.

जहां भी लोग कल्याणकारी योजनाओं (चाहे राशन हो या पेंशन या अन्य) के लिए आधार लिंक नहीं करा पाए हैं, उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा हो.

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