कैंपस

छत्तीसगढ़ की लॉ यूनिवर्सिटी में कुलपति को हटाने के लिए छात्र-छात्राओं का धरना फिर शुरू

रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति को सेवा विस्तार मिलने के बाद उन्हें हटाने की मांग को लेकर छात्र-छात्राओं ने बीते अगस्त महीने में भी दिया था धरना. दोबारा शुरू हुए धरने में तकरीबन 800 छात्र-छात्राओं के अलावा 26 शैक्षणिक कर्मचारी भी शामिल हैं.

रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में रात में प्रदर्शन करते छात्र-छात्राएं.

रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में फ्लैश टॉर्च लाइट प्रदर्शन करते छात्र-छात्राएं.

रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एचएनएलयू) में कुलपति सुखपाल सिंह के फिर से कार्यभार संभालने के बाद छात्र-छात्राओं का एक बार फिर प्रदर्शन शुरू कर दिया था. छात्र-छात्राओं ने कुलपति पर कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और यौन उत्पीड़न के आरोपों के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की कार्रवाई में असफल रहने के आरोप लगाए हैं.

मालूम हो कि कुलपति का कार्यकाल ख़त्म होने के बाद उन्हें सेवा विस्तार मिलने की वजह से छात्र-छात्राएं उनके इस्तीफे की मांग को लेकर इससे पहले बीते 27 अगस्त को धरने पर बैठे थे.

10 दिन तक चले इस प्रदर्शन में कुलपति को हटाने की मांग के साथ हॉस्टल में आने-जाने की समयसीमा को पूरी तरह से ख़त्म करना, लाइब्रेरी के लिए कर्फ़्यू टाइम को बढ़ाना, मोरल पुलिसिंग ख़त्म करना, यौन उत्पीड़न मामलों में कार्यवाई के लिए कमेटी का गठन, स्वतंत्र वॉर्डन की नियुक्ति और छात्र-छात्राओं की प्रतिक्रिया लेने के लिए व्यवस्था बनाने की मांगें शामिल थी.

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कुलपति के सेवा विस्तार को निरस्त कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 25 सितंबर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति सुखपाल सिंह ने फिर से कार्यभार संभाल लिया है. कुलपति की वापसी का छात्र-छात्राओं द्वारा विरोध किया जा रहा है.

अब एक बार फिर छात्र-छात्राओं और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है.

पत्रिका के मुताबिक 25 सितंबर को कुलपति सुखपाल सिंह के इस्तीफे से इंकार के बाद से ही सभी छात्र-छात्राएं विरोध पर अड़ गए हैं. सभी 800 छात्र-छात्राएं परिसर में ही पंडाल लगाकर धरना दे रहे हैं.

छात्रसंघ अध्यक्ष स्नेहल रंजन शुक्ला के नेतृत्व में लगभग 800 छात्र-छात्राओं ने अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते हुए कुलपति को हटाने सहित यौन उत्पीड़न और भ्रष्टाचार पर त्वरित कार्रवाई करने की मांग की है.

अविश्वास प्रस्ताव पर 800 छात्र-छात्राओं के साथ विश्वविद्यालय के 26 कर्मचारियों ने भी हस्ताक्षर कर अपना समर्थन दिया है, जिसमें आठ शैक्षणिक और 18 गैर-शैक्षणिक स्टाफ शामिल हैं.

पत्रिका से बातचीत करते हुए शुक्ला ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन विद्यार्थियों की समस्याओं के मामले में शुरू से ही ढिलाई बरत रहा है. उनकी ओर से भ्रष्टाचार सहित यौन उत्पीड़न के आरोपियों पर कार्रवाई के बजाए संरक्षण दिया जा रहा है.

छात्र-छात्राओं का कहना है कि वे मांगें पूरी होने तक विरोध करते रहेंगे.

पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, कुलपति ने पदभार ग्रहण करने के बाद 25 सितंबर की शाम चार बजे छात्रसंघ को चर्चा के लिए बुलाया था. इसमें छात्र-छात्राओं ने विभिन्न बिंदुओं पर कुलपति से जवाब-तलब किया, जिसमें कोई ठोस जवाब नहीं मिलने पर छात्र-छात्राओं ने मांगे पूरी होने तक विरोध करने का निर्णय लिया है.

छात्रसंघ अध्यक्ष स्नेहल रंजन और उपाध्यक्ष स्वाति भार्गव ने बताया कि बीते महीने 60 छात्र-छात्राओं ने यौन शोषण के विभिन्न मामले की कुलपति से शिकायत की थी, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. इस पर छात्र-छात्राओं ने वित्तीय मामलों सहित कई अन्य सवाल किए, जिस पर भी कुलपति की ओर से की ठोस जवाब नहीं दिया गया.

विश्वविद्यालय में वर्तमान में केवल 30 शिक्षकों के भरोसे शैक्षणिक कार्य हो रहा है. इस पर छात्र-छात्राओं ने शिक्षकों की नियुक्ति के संदर्भ में कुलपति को तलब किया, उन्होंने कोई योग्य लोग नहीं मिलने की बात कही.

छात्र-छात्राओं का कहना है कि डॉ. सुखपाल सिंह ही कैंपस की समस्याओं की मुख्य जड़ हैं क्योंकि इतने सालों में उन्होंने न समस्याओं को सुना न ही किसी समस्या को व्यवस्थित ढंग से सुलझाने की कोशिश की.

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक दोबारा पदभार संभालने के बाद छात्र-छात्राओं के प्रस्ताव पर कुलपति सामूहिक बैठक के लिए तैयार हो गए. छात्रसंघ अध्यक्ष स्नेहल रंजन शुक्ला और उपाध्यक्ष स्वाति भार्गव ने कुलपति के सामने 10 मुद्दों को उठाया.

उन्होंने वित्तीय अनियमितता, भ्रष्टाचार, विश्वविद्यालय में शिक्षकों की कमी, एकेडमिक और फाइनेंशियल नियमों में स्पष्टता नहीं होने का मुद्दा उठाया.

इसके अलावा मेस सहित अन्य निर्माण कार्यों में धांधली, कार्यपरिषद और विद्या परिषद में छात्र-छात्राओं की सहभागिता नहीं होने जैसे कई सवाल उनसे किए गए. छात्र-छात्राओं ने ऑडिट रिपोर्ट जारी करने की मांग की, लेकिन कुलपति ने इसे मानने से इनकार कर दिया.

विश्वविद्यालस में क़ानून की पांचवें वर्ष की छात्रा जया ने द वायर से बातचीत में बताया, ‘हम ने कुलपति के इस्तीफे की मांग की है. इसे लेकर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने बुधवार शाम को कुलपति निवास तक एक मौन ‘फ्लैश लाइट मार्च’ निकाला. अगर वे इस्तीफा नहीं देते हैं तो हम भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे.’

जया कहती हैं, हम छात्रों-छात्राओं ने कुलपति के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव जारी किया था अब उनको जाना ही होगा. इन्होंने इतने सालों में विश्वविद्यालय का माहौल ख़राब करने के अलावा कुछ नहीं किया है. हम लड़कियां जब भी किसी मांग को लेकर इनके पास जाती हमें दुत्कार कर भगा दिया जाता था.’

एक छात्रा ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, ‘हम इस वीसी की दोबारा नियुक्ति के एकदम ख़िलाफ़ हैं क्योंकि हमारे कैंपस की ख़राब व्यवस्था और कुप्रबंधन के वो मुख्य कारण हैं.

जया कहती हैं, ‘हमने उनके सामने कुप्रबंधन, यौन उत्पीड़न की समस्या, कर्फ़्यू टाइम जैसे कुछ सवाल रखे और हमें जवाब में सिर्फ़ निराशा हासिल हुई. उन्हें कोई नियम क़ानून की जानकारी ही नहीं है. साथ ही उन्होंने ने माना ही नहीं कि कैंपस में कुछ गड़बड़ियां हैं. जिसके बाद हमने एक मत हकर वीसी के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पास किया.’

दरअसल कुलपति के रिटायर होने के बाद उन्हें दो साल का सेवा विस्तार दिया गया था. इसके ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका में दाख़िल की गई थी. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उनके सेवा विस्तार देने को अवैध बताया था. कुलपति की नियुक्ति की के ख़िलाफ़ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. अविनाश सामल की ओर से एक याचिका दाख़िल की गई थी जिस पर हाईकोर्ट का यह फैसला आया था.

याचिका में कहा गया था कि कुलपति के तौर पर खुखपाल की नियुक्ति 2011 में हुई थी. नियुक्ति शर्तों के अनुसार, कार्यकाल पांच साल या 65 वर्ष की उम्र के लिए थी, लेकिन सितंबर 2014 में कुलपति को सेवा विस्तार दे दिया गया. नियमों में बदलाव कर इसे पांच वर्ष या 70 वर्ष की आयु कर दिया गया.

याचिका में कहा गया था कि 2014 में कुलपति की आयु 63 वर्ष छह महीने थी, इसके बाद नियमों पर बदलाव कर उन्हें गलत तरीके से फायदा पहुंचाया गया. इसके बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कुलपति की नियुक्ति निरस्त कर दी.

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