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दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द किया कोबरापोस्ट की डॉक्यूमेंट्री सार्वजनिक करने से रोकने वाला आदेश

बीते मई में दिल्ली हाईकोर्ट ने कोबरापोस्ट के ऑपरेशन- 136 पर दैनिक भास्कर समूह की याचिका के बाद रोक लगा दी थी. शुक्रवार को इस आदेश को रद्द करते हुए अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि कथित अपमानजनक सामग्री दुर्भावनापूर्ण या झूठी है, तब तक एकतरफा रोक का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए.

फोटो साभार: cobrapost.com

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नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को वेब पोर्टल कोबरापोस्ट को उसकी डॉक्यूमेंट्री को सार्वजनिक करने से रोकने वाले वाले एक आदेश को रद्द कर दिया. इस डॉक्यूमेंट्री में कई मीडिया कंपनियों पर पेड न्यूज जैसे अनैतिक कार्यों में शामिल होने का आरोप लगाया गया.

जस्टिस एस रविंद्र भट्ट और जस्टिस एके चावला की पीठ ने कहा कि दैनिक भास्कर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डीबी कॉर्प) की याचिका पर पूरे मुकदमे के लंबित रहने के दौरान एकतरफा रोक लगाने का आदेश न्यायसंगत नहीं था.

पीठ ने कहा, ‘जब तक शुरुआत में ही यह नहीं साबित हो जाता है कि कथित अपमानजनक सामग्री दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से झूठी है, तब तक वह भी एकतरफा रोक का आदेश और वो भी बिना कोई कारण दर्ज किये नहीं दिया जाना चाहिये.’

हालांकि, पीठ ने पक्षों के दलीलों के आधार पर अंतरिम राहत देने के प्रश्न पर विचार करने के लिए मामले को फिर से एकल न्यायाधीश वाली पीठ को भेजते हुए कहा कि डीबी कॉर्प को अंतरिम राहत देने वाली याचिका पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए.

पीठ ने दोनों पक्षों से 3 अक्टूबर को एकल न्यायाधीश वाली पीठ के सामने मौजूद रहने को कहा है.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार हाईकोर्ट ने यह भी कहा, ‘इस बात में कोई शक नहीं है कि नए ज़माने का मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इंटरनेट अधिक चुनौतीपूर्ण है. इसके लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी के महत्वपूर्ण अधिकार को कम नहीं किया जा सकता, जो लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है.

कोर्ट ने एकतरफा तरीके से रोक लगाने के मामले पर कहा, ‘फ्री स्पीच से जुड़ा स्थापित सिद्धांत यही है कि किसी तरह की कथित मानहानि या निंदा का दावा करने वाले प्रतिष्ठित लोगों और सार्वजनिक संस्थानों को किसी तरह की रोक या निषेध पाने के लिए एक बड़े मानक को पूरा करना चाहिए.’

मालूम हो कि डीबी कॉर्प ने बीते 24 मई को दिल्ली हाईकोर्ट से कोबरापोस्ट की उस डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन पर रोक लगवाने में कामयाबी हासिल की थी, जिसमें दैनिक भास्कर समेत देश के करीब दो दर्जन शीर्ष मीडिया घरानों को एक अंडर कवर रिपोर्टर के पैसे के एवज में हिंदुत्व के पक्ष में मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने वाली खबरें छापने के प्रस्ताव पर राजी होते दिखाया गया है.

इस आदेश के खिलाफ कोबरापोस्ट अदालत पहुंचा था और इसके पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ा हुआ बताते हुए इस रोक के फैसले को चुनौती दी थी.

दैनिक भास्कर कोबरापोस्ट द्वारा लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए कहा था कि यह उन्हें बदनाम करने की दुर्भावना पर आधारित हैं. उन्होंने कहा था कि अगर डॉक्यूमेंट्री को जारी करने पर रोक नहीं लगायी गयी, तो इससे अखबार को ‘कभी न भरपाई करनेवाला नुकसान’ पहुंचेगा.

हालांकि कोबरापोस्ट ने यह स्टिंग जारी किया, लेकिन उसमें से दैनिक भास्कर वाला हिस्सा निकाल दिया गया था.

गौरतलब है कि इसी साल 26 मार्च को जारी हुई कोबरापोस्ट के खुलासे, जिसे ‘ऑपरेशन 136’ नाम दिया गया है, की पहली किश्त में देश के कई नामचीन मीडिया संस्थान सत्ताधारी दल के लिए चुनावी हवा तैयार करने के लिए राजी होते नजर आए थे.

वहीं, 26 मई को जारी हुई इस ऑपरेशन की दूसरी किश्त में देश के कई नामचीन मीडिया संस्थान सत्ताधारी दल के लिए चुनावी तैयारी के लिए आध्यात्मिकता और धार्मिक प्रवचन के ज़रिये हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए सहमत होते नज़र आए थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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