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आईएलएंडएफएस के पूर्व स्वतंत्र निदेशकों ने ख़स्ता हालत के लिए एलआईसी को ज़िम्मेदार बताया

पूर्व स्वतंत्र निदेशकों ने क़र्ज़ के तले डूबे समूह के नए चेयरमैन उदय कोटक को लिखा ख़त, बदलाव प्रयासों में समर्थन का दिया भरोसा.

FILE PHOTO: A bird flies next to the logo of IL&FS (Infrastructure Leasing and Financial Services Ltd.) installed on the facade of a building at its headquarters in Mumbai, India, September 25, 2018. REUTERS/Francis Mascarenhas/File photo

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: कर्ज के तले डूबे इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (आईएलएंडएफएस) से बाहर किए गए स्वतंत्र निदेशकों ने अपनी भूमिका का बचाव किया है. बिजनेस स्टैंडर्ट के मुताबिक, इन पूर्व स्वतंत्र निदेशकों ने को दो-तीन सालों से कंपनी में आने वाले वित्तीय संकट के बारे में मालूम था.

उन्होंने दावा किया कि इसके लिए कई वैकल्पिक समाधान भी सुझाए गए थे जिनमें कंपनी को बेचना, कुछ परिसंपत्तियों को बेचना और आईपीओ लाना शामिल है. हालांकि शेयरधारकों के नामित निदेशकों ने इनमें से किसी भी सुझाव को मंजूरी नहीं दी.

अखबार के मुताबिक एक स्वतंत्र निदेशक ने यह भी बताया कि अजय पीरामल (पीरामल समूह) 600-650 रुपये प्रति शेयर के भाव से आईएलएंडएफएस में हिस्सा खरीदना चाहते थे लेकिन एलआईसी ने इसे रोक दिया. एलआईसी ने एक शेयर का मूल्य 1200 रुपये आंका था.

वहीं, एलआईसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आईएलएंडएफएस की खस्ता हालत के लिए उनकी कंपनी को खलनायक माना जा रहा है.

पूर्व स्वतंत्र निदेशकों ने बदलाव प्रयासों में समर्थन का भी भरोसा दिया है

सरकार की ओर से आईएलएंडएफएस के निदेशक मंडल को हटाने एक दिन बाद मंगलवार को पूर्व स्वतंत्र निदेशकों ने कर्ज के तले डूबे समूह के नए चेयरमैन उदय कोटक को कंपनी को फिर से खड़ा करने में अपना पूरा समर्थन देने का भरोसा दिया है.

आईएलएंडएफएस के पूर्व चेयरमैन एस बी माथुर समेत पांच पूर्व स्वतंत्र निदेशकों ने पत्र में कहा कि कई प्रयासों के बावजूद कंपनी अतिरिक्त पूंजी जुटाने में असमर्थ रही और संपत्ति पर देनदारी विसंगतियां बढ़ती रही. पत्र लिखने वालों में आर सी भार्गव, माइकल पिंटो, जयतीर्थ राव और रीना कामत भी शामिल हैं.

पूरा समर्थन देने का भरोसा देते हुए स्वतंत्र निदेशकों ने कहा कि सरकार की कार्रवाई सही है. यह आईएलएंडएफएस के ऋणदाताओं और लेनदारों समेत अन्य पक्षों को स्पष्ट और मजबूत स्थिति में पहुंचने में सक्षम बनाता है.

पत्र में कहा गया है कि हमारे कार्यकाल में कई प्रयासों के बावजूद आईएलएंडएफएस सीधे या अपनी अनुषंगियों के स्तर पर अतिरिक्त पूंजी जुटाने में नाकाम रहा. कंपनी एक रणनीतिक पक्ष के साथ विलय प्रक्रिया को पूरा करने में असमर्थ रही.

उनके मुताबिक, आईएलएंडएफएस की बड़ी अनुषंगी कंपनी आईटीएनएल में नई बीओटी-पीपीपी (बिल्ट ऑपरेट ट्रांसफर- सार्वजनिक निजी भागीदारी)परियोजनाएं तीन साल से बंद पड़ी हैं.

सरकार ने सोमवार को कहा कि नए आईएलएंडएफएस के निदेशक मंडल में बाजार का भरोसा तथा कंपनी को फिर से खड़ा किए जाने की जरूरत है. सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए आईएलएंडएफएस के निदेशक मंडल में बदलाव कर बड़ा कदम उठाया है. कंपनी के गैर-कार्यकारी चेयरमैन के रूप में कोटक कंपनी को फिर से खड़ा करने के लिए व्यापक बदलाव के प्रयास करेंगे.

आईएलएंडएफएस संकट के चलते म्यूचुअल फंडों पर भुगतान दबाव

म्यूचुअल फंडों पर भुगतान दबाव और अपर्याप्त पूंजी की वजह से 1,500 छोटी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लाइसेंस रद्द होने का जोखिम चिंता का कारण बने हैं. इसे आईएलएंडएफएस संकट का वित्तीय बाजारों पर पड़ने वाले प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है.

कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने संकट में फंसी आईएलएंडएफएस के प्रबंधन में बदलाव के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में दायर अर्जी में इन कारकों का उल्लेख किया है.

मंत्रालय ने 30 सितंबर की तारीख के आर्थिक मामलों के विभाग के एक गोपनीय नोट का उल्लेख करते हुए कहा कि इस समूह के डूबने की आशंका और इसके अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव पर चिंता जताई है.

मंत्रालय द्वारा दायर अर्जी के अनुसार, ‘नोट में कहा गया है कि आईएलएंडएफएस बांड में 2,800 करोड़ रुपये का निवेश करने वाली संपत्ति प्रबंधन कंपनियों पर कॉरपोरेट ग्राहकों की ओर से भुगतान का दबाव हो सकता है.’

इसमें कहा गया है कि आईएलएंडएफएस संकट की वजह से जो एक और चिंता उभरी है कि 1,500 एनबीएफसी का लाइसेंस रद्द हो सकता है क्योंकि उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं है.

गौरतलब है कि आईएलएंडएफएस समूह की कुछ इकाइयों द्वारा ऋण चूक के बाद वित्तीय बाजारों में नकदी संकट की आशंका बढ़ी है. भारतीय रिजर्व बैंक ने जोर देकर कहा है कि प्रणाली में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करने के लिए जरूरी उपाय किए जा रहे हैं.

वाणिज्यिक बैंकों की बढ़ सकती है क़र्ज़ वितरण हिस्सेदारी

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के गहराते संकट का लाभ वाणिज्यिक बैंकों को हो सकता है. वह एक बार फिर से कंपनियों को ऋण देने वाले प्रमुख स्रोत के रुप में उभर सकते हैं. इससे ऋण वितरण में उनकी घटती हिस्सेदारी बढ़ सकती है.

सिंगापुर की ब्रोकरेज कंपनी डीबीएस ने अपनी एक रपट में कहा कि 2014 के बाद से बुनियादी क्षेत्र को ऋण देने वाली आईएलएंडएफएस जैसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की ऋण बाजार में हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है, जबकि वाणिज्यिक बैंक इस दौरान गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) के संकट को लेकर जूझने लगे.

रपट के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 में संभावना है कि घरेलू बैंकों की ऋण देने में हिस्सेदारी फिर से बढ़ेगी और वह बांड बाजार एवं गैर-बैंकिंग कंपनियों के मुकाबले वाणिज्यिक क्षेत्र को ऋण देने वालों में फिर से मुख्य स्रोत बन कर उभरेंगे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 11 बैंकों के त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई के तहत होने के बावजूद बैंक कर्ज देने वाले प्राथमिक स्रोत के रूप में आगे आयेंगे. बाजार आधारित उधारी की लागत बढ़ने, बाजार में नकदी की कमी और बैंकों की संपत्ति गुणवत्ता मुद्दों को सुलझाने के लिये किये जा रहे प्रयासों से यह संभव होगा.

इसमें कहा गया है कि वित्त वर्ष 2016-17 में वाणिज्यिक क्षेत्र को बैंक के वित्तपोषण का हिस्सा पिछले साल के 55 प्रतिशत से घटकर 34 प्रतिशत रह गया. इसके बाद 2017-18 में यह बढ़कर 50 प्रतिशत पर पहुंच गया.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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