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गिर शेरों की मौत: सुप्रीम कोर्ट ने पांच साल पहले ही शेरों को शिफ्ट करने के लिए कहा था

गुजरात द्वारा उठाई गईं आपत्तियों और पर्यावरण मंत्रालय व मध्य प्रदेश वन विभाग के पीछे हटने की वजह से सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लागू नहीं किया जा सका. मध्य प्रदेश में शेरों को लाने के लिए हुआ प्रदर्शन.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र से कहा कि गुजरात के गिर अभयारण्य में तीन सप्ताह के भीतर 23 शेरों की रहस्यमय मृत्यु के मामले को गंभीरता से देखा जाए.

इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह मौत के ब्योरे का पता लगाएंगे और कहा कि शेरों से संबंधित मामला अदालत में पहले ही लंबित है.

हालांकि पांच साल पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने एक पूर्व निर्धारित आदेश में गुजरात के कुछ शेरों को मध्य प्रदेश में शिफ्ट करने के लिए कहा था. ऐसा इसलिए कहा गया था ताकि लुप्तप्राय प्रजातियों को आपदा जैसी स्थिति से बचाने के लिए उनके लिए दूसरा घर स्थापित किया जाए.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात सरकार द्वारा उठाई गईं आपत्तियों और पर्यावरण मंत्रालय व मध्य प्रदेश वन विभाग के पीछे हटने की वजह से सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लागू नहीं किया गया.

एशियाई शेर अब केवल गुजरात में ही पाए जाते हैं जहां उनकी आबादी 2010 में 411 से बढ़कर 2015 में 523 हो गई है. ये भी बताया जा रहा है कि ऐसा संदेह है कि किसी वायरस संक्रमण की वजह से इन शेरों की मौत हुई है.

गिर से शेरों को मध्य प्रदेश के कूनों अभयारण्य नहीं भेजे जाने पर विरोध प्रदर्शन

वहीं एशियाई शेरों का दुनिया में एक मात्र घर माने जाने वाले गुजरात के विश्व प्रसिद्ध गिर अभयारण्य के शेरों को मध्य प्रदेश नहीं भेजने पर लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया.

प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि इस प्रजाति को बचाने के लिए उनमें से कुछ को वैकल्पिक आवास मध्यप्रदेश के पालपुर-कूनो अभयारण्य में बसाने की व्यवस्था की जाए.

कूनो अभयारण्य में शेर लाओ संघर्ष समिति और जिला कांग्रेस के पूर्व पदाधिकारी अतुल चौहान के नेतृत्व में गुरुवार को श्योपुर नगर में सैकड़ों लोगों ने गधों के साथ विरोध प्रदर्शन किया.

बैनरों पर ‘शेर दे दो, हमें ले लो’, ‘गिर के शेरों को वायरस से बचाओ, कूनो पहुंचाओ’ लिखा था. एक अन्य बैनर में एशियाई शेरों के परिवार के साथ लिखा था ‘गुजरात का मोह छोड़ो मोदी जी हमें सुरक्षा दो.’

प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांग को लेकर कोतवाली पुलिस स्टेशन में राष्ट्रपति राम कोविंद के नाम एक ज्ञापन पत्र भी सौंपा है.

चौहान ने बताया, ‘पिछले 10 वर्षों से 100 करोड़ रुपये खर्च के साथ 25 गांव के 10,000 परिवारों को विस्थापित करके कूनो अभ्यारण्य को तैयार किया गया है. सभी विशेषज्ञ एवं वन्यजीव वैज्ञानिकों और अधिकारियों की सहमति और सुप्रीम कोर्ट के छह वर्ष पूर्व गिर अभ्यारण्य से कूनो अभ्यारण्य में शेर देने के फैसले के बावजूद अब तक एक भी शेर कूनो को नहीं मिल सका है.’

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि केंद्र, गुजरात और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद विलुप्त हो रहे शेरों की इस प्रजाति को वैकल्पिक तौर पर बसाने के मामले में अभी तक कोई परिणाम नहीं निकाला है.

चौहान ने कहा कि गिर में पिछले 15 दिन में 23 एशियाई शेरों की मौत जहां संक्रमण की बीमारी से हुई है वहीं 35 से ज्यादा शेर इसकी चपेट में हैं, जिसकी पुष्टि गुजरात वनविभाग ने भी की है.

चौहान ने कहा कि गुजरात विधानसभा के 6 माह पूर्व हुए सत्र में भी एक विधायक के प्रश्न के जवाब में गुजरात सरकार ने स्वीकार किया है कि पिछले 2 वर्षों में 184 शेरों की मौत आपसी संघर्ष, संक्रामक बीमारियो, भयंकर बाढ़ व रेल दुर्घटनाओं सहित अन्य कारणों से हुई हैं.

इसे मिलाकर अब तक 225 शेरों की मौत गिर अभ्यारण्य में हुई है.

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी की यदि कूनों में शेरों को नहीं बसाया गया तो 16 अक्टूबर को सालाना सैलानियों के लिए खुलने वाली कूनो अभ्यारण्य के ताले नहीं खुलने दिए जाएंगे.

विशेषज्ञों ने शेरों की वैकल्पिक बसाहट के लिए मध्य प्रदेश के कूनो पालपुर नेशनल पार्क को सबसे उचित जगह बताया.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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