मीडिया

‘लड़कियों के लिए न्यूज़रूम तक पहुंचना जितना मुश्किल है, उससे ज़्यादा मुश्किल वहां टिके रहना है’

न्यूज़रूम की कहानियां: मेरे साथ किसी तरह की बदतमीज़ी नहीं की गई, खुले तौर पर कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ, पर संगठित होकर इस तरह का माहौल बनाया गया, जिसमें काम करना मुश्किल होता गया और आख़िरकार मैंने नौकरी छोड़ दी.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

बीते साल अक्टूबर में अमेरिका से निकली ‘मीटू’ मुहिम बीते हफ्ते फिर चर्चा में आयी, जब अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अपने सह-अभिनेता नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए. इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस चल निकली और अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहीं महिलाओं ने उत्पीड़न के अपने अनुभव साझा करने शुरू किए.

कॉमेडियन उत्सव चक्रवर्ती पर एक महिला कॉमेडियन ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए बताया कि उत्सव ने उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजी हैं. इसके बाद कई महिला पत्रकारों ने सामने आकर उनके साथ हुए उत्पीड़न की आपबीती बताई है.

पिछले एक हफ्ते में सामने आईं ज़्यादातर महिलाएं अंग्रेज़ी पत्रकारिता से ताल्लुक रखती हैं. इन महिलाओं के सामने आने के बाद से लगातार यह सवाल उठ रहा है कि क्या उत्पीड़न की ये कहानियां अंग्रेज़ी न्यूज़रूम तक ही सीमित हैं, क्या भाषाई न्यूज़रूम में महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं और उन्हें अपने सहकर्मियों या वरिष्ठों से कोई शिकायत नहीं है?

पर शायद ये बात उतनी ही झूठी है, जितना मीडिया संस्थानों का अपनी महिला कर्मचारियों के प्रति संवेदनशील होने का दावा. सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में मीडिया एक वर्जित क्षेत्र माना जाता है, खासकर लड़कियों के लिए. न्यूज़रूम की जो छवि आम जन के मन में है, उसमें कोई अपने घर-परिवार की महिला को देखना नहीं चाहता.

बावजूद इसके महिलाएं तमाम बंधन तोड़कर मीडिया जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में आती हैं. मेरी कहानी भी कमोबेश ऐसे ही माहौल से निकलकर एक ‘प्रतिष्ठित’ दैनिक अख़बार के दफ्तर तक पहुंचने की है. इससे पहले मैंने जिन छोटे मीडिया संस्थानों में काम किया था, वहां जान-पहचान के लोग काम करते थे, इसलिए शायद कभी किसी अप्रिय स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा.

ये एक राष्ट्रीय अख़बार था, जिसकी एक राज्य की राजधानी की टीम का मैं हिस्सा बनी थी. जिस विभाग में मुझे काम करना था, उसकी संपादकीय टीम में पहले से केवल दो महिलाएं थीं. एक वरिष्ठ संपादक, जो कवि और विचारक के रूप में जाने जाते थे, के नेतृत्व में यह नई टीम बनी, जिसमें मुझ समेत 4 लड़कियां और 7 पुरुष आए.

क्योंकि अख़बारों के दफ्तर के माहौल के बारे में सुना हुआ था, इसलिए मैंने सिर्फ यही सोचा था कि अपने काम से काम रखना है. मेरा स्वभाव भी काफी रिज़र्व है, घुलने-मिलने में समय लगता है, तो नए माहौल में दोस्त बनाना है, जैसा कोई उत्साह नहीं था. काम पसंद का मिला तो शुरुआत अच्छी भी रही. सब कुछ ठीक ही था, लेकिन धीरे-धीरे पता चलने लगा कि संपादक साहब को ‘गॉसिपिंग’ का चाव है.

कॉपी को लेकर होने वाली कोई चर्चा हो या एडिट मीटिंग्स, किसी न किसी तरह टीम की एक अधेड़ उम्र की गैर-शादीशुदा महिला सदस्य को लेकर होने वाले मज़ाक तक पहुंच जाती. वो महिला किसी भी तरह का प्रतिरोध नहीं जताती थीं. झूठा-सा गुस्सा दिखाकर ‘आप ऐसे हैं, वैसे हैं’ जैसी बातें कहतीं.

कई बार हममें से किसी को बुलाकर संपादक उनकी निजी जिंदगी पर चर्चा करते. किसी मीटिंग में वो न भी हों, तब भी उन पर किसी न किसी तरह की टिप्पणी ज़रूर होती.

अगर बात उन तक नहीं पहुंचती तो किसी न किसी तरह से हमसे पहली रही टीम की अकर्मण्यता, पॉलिटिक्स या पहले के संपादक और एक महिला विशेष के व्यवहार और चाटुकारिता के किस्से शुरू हो जाते.

संक्षेप में समझें तो किसी किटी पार्टी में अनुपस्थित महिला की पीठ पीछे जिस तरह की चर्चाएं होती हैं, यह उसी का परिष्कृत रूप था. जिन लोगों का हमारे काम से कोई लेना-देना नहीं है, उन पर घंटों बात करने का क्या अर्थ है, मैं समझ नहीं पाती.

बहुत बाद में समझ आया कि यह सब सिर्फ हम लोगों को ‘परखने’ की एक्सरसाइज़ थी, जहां इन बातों पर हमारी प्रतिक्रिया से हम पर ‘रिसर्च’ किया जा रहा था कि कौन कितनी दिलचस्पी ले रहा है. चूंकि मैं दफ्तर से निकलने के बाद किसी से कोई बात नहीं करती थी, मुझे यह सब नहीं पता था.

संपादक साहब ने चापलूसी की निंदा तो की थी, पर न्यूज़रूम में अपने ‘दाएं’ और ‘बाएं’ तैनात किए हुए थे, जो उन्हें बताते थे कि वहां कौन, किससे बात करता है, किसके साथ खाना खाने जाता है या संपादक की कॉल पर क्या रिएक्शन देता है.

काम को लेकर कभी कोई बात नहीं होती. एडिट मीटिंग्स में उनमें से ही कोई बात निकालकर ‘आपने तो उस दिन फलाने व्यक्ति की बात पर ये कहा था’ सरीखी चर्चा और सवाल-जवाब किये जाते. मेरे साथ हुआ अनुभव इसी से जुड़ा है.

बात महिलाओं को लेकर किसी विषय पर हो रही थी, जिसमें किसी महिला विशेष का जिक्र किया जा रहा था, जो सोशल मीडिया पर खासी सक्रिय हैं. उस चर्चा में हो रही बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखती थी तो मैंने असहमति ज़ाहिर की. इस पर संपादक ने मुझसे कहा, ‘अरे! आप ऐसे क्यों कह रही हैं, आप तो उनके पोस्ट लाइक करती हैं!’

उनके कहने की टोन कुछ ऐसी थी कि मुझे लगा कि शायद मुझसे कोई अपराध हो गया है. लगा कि उस महिला की पोस्ट लाइक करना वर्जित है, ऐसा मुझे वर्क कॉन्ट्रैक्ट में नहीं बताया गया था!

मैं सकपका गई और कहा कि नहीं तो. उन्होंने कहा झूठ मत बोलिये, मुझे पता है आपने उनका पोस्ट लाइक किया है. मुझे समझ नहीं आया कि वो ऐसा क्यों कह रहे हैं, तो मैंने कहा हो सकता है, पर इस चर्चा का इससे क्या संबंध है.

इस पर वे थोड़े झिझके और कुछ देर चुप रहकर कोई और बात करने लगे. बात आई-गई हो गई, लेकिन मेरी सोशल मीडिया एक्टिविटी पर नज़र किसलिए रखी जा रही है, यह मैं नहीं समझ सकी.

वहां इसी तरह माहौल बनने लगा. कौन काम में कैसा है, अपनी ड्यूटी सही से कर रहा है, इस पर कोई बात होती-नहीं होती, इस बारे में नहीं पता, लेकिन कौन ऑफिस के बाद कहां जाता है, रात में फोन पर किससे कितनी देर बात करता है, यह जानकारी संपादक के पास पहुंचाई जाती.

मेरे बारे में कोई कुछ नहीं जान सका तो मनमानी बातें बनाई जाने लगीं. मुझे लेकर लोगों की राय बदलने लगी और अब काम पर असर पड़ना शुरू हुआ. वहां टीम के अंदर दो टीमें बन गईं. एक ब्यूरो ऑफिस के पत्रकार भी काफी इंटरेस्ट लेने लगे और बिना किसी बात के वहां बेबुनियाद राजनीति होने लगी.

‘आपने उससे उस दिन ये कहा था, क्यों? ‘आप इस विषय पर ऐसा सोचती हैं, क्यों?’ ‘फलाने ब्यूरो से तुम्हारे पास ही फोन आया, क्यों?’

काम से इन बातों का कोई सरोकार नहीं था पर काम के अधिकतर समय यही सब बातें हो रही थीं. और एक रोज़ जब परिस्थितियां ऐसी बनीं कि कोई फैसला लेना होगा, तो मैंने इस्तीफा मेल कर दिया.

यह कोई सोचा-समझा फैसला नहीं था. बस मैंने आवेग में आकर लिया था. उस दिन घर लौटकर दुख हुआ, कई दिनों तक हुआ. लेकिन मैंने दफ्तर में किसी से भी कोई संपर्क नहीं किया, न वहां से ही कोई फोन आया. ऐसा लगा कि शायद वे सब यही चाहते थे और जिस घटनाक्रम को लेकर मैंने इस्तीफा दिया, वो रचा गया था.

हालांकि कुछ समय बाद कुछ सहकर्मियों ने बताया कि मेरे जाने के बाद मुझे लेकर उनसे सवाल-जवाब किए गए कि क्या मैं उनसे मिली, उन्हें फोन किया, क्या पूछा, क्या नहीं! मैं समझ नहीं सकी कि ऐसा क्यों हुआ, लेकिन जिन सपनों और उम्मीदों को लेकर मैं वहां पहुंची थी, उसे बहुत चोट लगी.

मेरे निजी जीवन को लेकर उत्सुकता का यह आलम कि मेरे काम को छोड़कर वरिष्ठों का उद्देश्य मेरे बारे में जानकारियां निकालना हो गया था. क्या इसलिए कि मैं उस बड़े शहर में ‘अकेली’ रहने आई एक लड़की थी, जो दफ्तर के किसी भी व्यक्ति से किसी भी तरह की कोई मदद नहीं लेती थी! क्या इसकी कोई और वजह थी. नौकरी छोड़ने के कई महीनों बाद तक मैंने यह सोचा और खुद को उनके इस व्यवहार का ज़िम्मेदार माना.

इस दौरान एक दिन तो सोशल मीडिया पोस्ट लाइक करने वाला वाकया भी उनके इस व्यवहार के लिए उत्तरदायी लगा, मैंने अगली नौकरी कई महीनों बाद जॉइन की, और तब तक इस बारे में सोचा और अपनी गलती ढूंढती रही.

एक ठेस इस बात को लेकर भी थी कि जो भी कुछ हुआ, उसका मेरे काम, मेरी पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं था.

यह अनुभव हरैसमेंट या उत्पीड़न का वह रूप नहीं है, जो अक्सर सामने आता है. पर हिंदी के न्यूज़रूम में महिलाओं, खासकर अकेली रहने वाली लड़कियों को लेकर बहुत-से पूर्वाग्रह हैं. कई बार आपका संपादक/वरिष्ठ आपके निजी जीवन पर अपना अधिकार समझता है. वो सोशल मीडिया पर आपके लाइक से लेकर दफ्तर के बाद उठ रहे कदम की जानकारी रखना चाहता है.

यह पितृसत्ता का वह रूप है, जहां इसके खिलाफ संपादकीय कॉलम रंगने के बावजूद वो टीम की वयस्क महिलाओं को उनके फैसले लेने लायक नहीं समझता, टीम की महिलाओं के कपड़ों/मैरिटल स्टेटस/निजी फैसलों पर दूसरे सदस्यों के सामने टिप्पणी करता है और फिर अपने खुले दिमाग का होने का दम भरता है.

मेरे अनुभव में कहीं किसी तरह की बदतमीज़ी नहीं की गयी, खुले तौर पर कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ, पर संगठित होकर इस तरह का माहौल बनाया गया, जिसमें काम करना मुश्किल बना दिया गया. मेरे पास यह विकल्प था कि उस नौकरी को छोड़ सकती थी, पर दिन-रात देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंदी के न्यूज़रूम महिला सशक्तिकरण पर लेख प्रकाशित करते हुए, उनका वहां रहना दूभर कर रहे हैं.

(लेखक के अनुरोध पर उनकी व संस्थान की पहचान नहीं लिखी गई है. अगर आपके पास भी न्यूज़रूम से जुड़ा कोई अनुभव हो, तो [email protected] पर साझा कर सकते हैं.)

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