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सीबीआई बनाम सीबीआई: आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच लड़ाई की पूरी कहानी

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के इतिहास में पहला ऐसा मौका है जब उसके दो वरिष्ठतम अधिकारी एक दूसरे पर बेहद संगीन आरोप लगा रहे हैं.

सीबीआई के वरिष्ठतम अधिकारी राकेश अस्थाना और आलोक वर्मा. (फोटो साभार: पीटीआई/विकिपीडिया/फेसबुक)

सीबीआई के वरिष्ठतम अधिकारी राकेश अस्थाना और आलोक वर्मा. (फोटो साभार: पीटीआई/विकिपीडिया/फेसबुक)

नई दिल्ली: इस समय देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच लड़ाई जारी है. सीबीआई ने मोईन कुरैशी भ्रष्टाचार मामले में रिश्वत लेने के आरोप में अस्थाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है और अपने ही डीएसपी देवेंद्र कुमार को गिरफ्तार किया है.

जांच एजेंसी के इतिहास में यह पहला मौका है जब सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक के खिलाफ केस दर्ज किया है. इस मामले के बाद सीबीआई के नंबर एक (आलोक वर्मा) और नंबर दो (राकेश अस्थाना) के बीच चली आ रही जंग खुल कर सामने आ गई है. अस्थाना की सीबीआई में नियुक्ति विवादित रही है. इनकी नियुक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई थी.

ये भी आरोप है कि सीबीआई में अस्थाना की नियुक्ति बहुत जल्दबाजी में की गई थी. राकेश अस्थाना को केंद्र की मोदी सरकार का करीबी माना जाता है.

कौन हैं आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस लड़ाई की शुरुआत से पहले दोनों का काफी लंबा और अविवादित कार्यकाल रहा है. वर्मा 22 साल की उम्र में 1979 में आईपीएस अधिकारी बने थे और उन्हें एजीएमयूटी (अरुणाचल, गोवा, मिजोरम, केंद्र शासित प्रदेश) कैडर दिया गया था. वर्मा अपनी बैच में सबसे कम उम्र के अधिकारी थे.

सीबीआई निदेशक का पद संभालने से पहले आलोक वर्मा दिल्ली पुलिस के कमिश्नर, दिल्ली कारागार निदेशक, मिजोरम और पुदुचेरी के डीजीपी जैसे पदों पर रह चुके थे. वर्मा सीबीआई के एकमात्र ऐसे निदेशक हैं जो एजेंसी के अंदर काम किए बगैर सीधे नियुक्त किए गए थे.

वहीं राकेश अस्थाना गुजरात कैडर के 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. अस्थाना ने चारा घोटाला, 2002 गोधरा ट्रेन अग्निकांड जैसे कई महत्वपूर्ण मामलों की जांच की है. गोधरा मामले के समय अस्थाना इंस्पेक्टर जनरल इंचार्ज थे. लालू यादव को सजा दिलाने को लेकर चारा घोटाला मामले में अस्थाना की जांच काफी महत्वपूर्ण थी. अस्थाना को मौजूदा केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का करीबी माना जाता है.

कैसे होती है सीबीआई निदेशक की नियुक्ति

लोकपाल कानून बनने से पहले सीबीआई निदेशक की नियुक्ति दिल्ली स्पेशल पुलिस एक्ट के तहत की जाती थी. इस एक्ट के तहत, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, गृह सचिव और कैबिनेट सचिवालय के सचिवों की समिति में संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार की जाती थी. इस पर आखिरी फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय के साथ बातचीत के बाद लिया जाता था.

हालांकि लोकपाल कानून आने के बाद गृह मंत्रालय द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी मामलों की जांच करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की एक सूची तैयार की जाती है जिसमें से किसी एक को सीबीआई निदेशक नियुक्त करना होता है. इसके बाद इस सूची को प्रशिक्षण विभाग के पास भेजा जाता है जहां पर इसकी वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर आकलन किया जाता है. इसके बाद एक सूची लोकपाल सर्च कमेटी के पास भेजी जाती है जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता होते हैं. सर्च कमेटी नामों की जांच करती है और सरकार को सुझाव भेजती है.

सरकार केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) से बातचीत करने के बाद सीबीआई में अन्य सबऑर्डिनेट अधिकारियों की नियुक्ति करती है. हालांकि सीबीआई में आधिकारिक रूप से नंबर 2 का कोई पद नहीं है. निदेशक ही एजेंसी का सबसे बड़ा अधिकारी होता है. अन्य किसी अधिकारी के पास कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं होती है जो निदेशक के आदेश की अवहेलना कर सके. निदेशक पास ये भी अधिकार होता है कि वो कौन सा मामला किस अधिकारी को आवंटित करेगा. इसके अलावा मात्र निदेशक को ही किसी मामले में अंतिम फैसला लेने का अधिकार है.

क्या है मौजूदा मामला?

इस मामले की शुरुआत साल 2017 से होती है जब मोदी सरकार ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा की सिफारिश के बावजूद कुछ आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति सीबीआई में नहीं की. अक्टूबर 2017 में राकेश अस्थाना की नियुक्ति को लेकर सीवीसी के साथ हुई बैठक में सीबीआई निदेशक वर्मा ने एक गोपनीय पत्र दिया था.

कथित रूप से उस पत्र में स्टर्लिंग बायोटेक मामले को लेकर अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत थी. आरोप है कि कंपनी के परिसर में पाई गई एक डायरी के मुताबिक अस्थाना को कंपनी द्वारा 3.88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. स्टर्लिंग बायोटेक पर 5,000 करोड़ रुपये से ऊपर के लोन की हेराफेरी की जांच चल रही है.

इस साल जून में सीबीआई निदेशक वर्मा ने एक बार फिर अस्थाना पर निशाना साधा. निदेशक ने सीवीसी को लिखा कि उनकी अनुपस्थिति में राकेश अस्थाना सीवीसी मीटिंग में सीबीआई नियुक्ति के दौरान उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं.

वर्मा ने कहा कि अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को लेकर जांच चल रही है. हालांकि अस्थाना ने भी निदेशक पर पलटवार किया. अस्थाना ने कैबिनेट सचिव को अगस्त में पत्र लिखा कि आलोक वर्मा उनकी जांच में हस्तक्षेप कर रहे हैं और आईआरसीटीसी घोटाला मामले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ छापेमारी रोकने की कोशिश की.

इस मामले के दो महीने के अंदर ही वर्मा ने अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में एफआईआर दर्ज कराया.

क्या है अस्थाना पर आरोप

अस्थाना पर आरोप है कि उन्होंने मीट कारोबारी मोईन कुरैशी भ्रष्टाचार मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के जरिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी. सीबीआई का आरोप है कि लगभग तीन करोड़ रुपये पहले ही बिचौलिये के जरिये अस्थाना को दिए जा चुके हैं.

सीबीआई का दावा है कि वॉट्सऐप मैसेजेस से इस बात की पुष्टि होती है कि अस्थाना को रिश्वत दी गई है. हालांकि हैदराबाद का व्यापारी अस्थाना से न तो कभी मिला और न ही बात की है. ये भी  कहा जा रहा है कि चूंकि अस्थाना वाले मामले में कोई रंगे हाथ रिश्ववत लेते पकड़ा नहीं गया इसलिए सीबीआई को एफआईआर करने से पहले सरकार से इजाजत लेनी चाहिए थी.

इस मामले को लेकर सीबीआई के अंदर भी दो धड़े हो गए हैं. ज्यादातर लोग आलोक वर्मा के साथ हैं. हालांकि कुछ लोग राकेश अस्थाना के भी साथ हैं. इनके अलावा तमाम अधिकारियों ने किसी का पक्ष नहीं लिया है.

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