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क्या क़ानून मोदी सरकार को सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को हटाने का अधिकार देता है?

सरकार का कहना है कि सीवीसी की सिफारिश के आधार पर आलोक वर्मा को हटाया गया है. हालांकि कानून के मुताबिक सीवीसी तब तक ऐसी सिफारिश नहीं कर सकती है जब तक की अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप दर्ज न किए गए हों.

नरेंद्र मोदी और आलोक वर्मा. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

नरेंद्र मोदी और आलोक वर्मा. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

नई दिल्ली: सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को केंद्र सरकार ने छुट्टी पर भेज दिया है. विपक्षी पार्टिया और सामजिक संगठन इसे लेकर सरकार पर हमलावर हैं और आरोप लगा रहे हैं कि सरकार स्वतंत्र संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है.

आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के साथ सीबीआई के संयुक्त निदेशक एम. नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक नियुक्त किया गया है. कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया है कि राकेश अस्थाना को बचाने और राफेल सौदे की जांच से बचने के लिए सरकार ने ऐसा किया है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार सीबीआई निदेशक को इस तरह अचानक छुट्टी पर भेज सकती है? क्या कानून में ऐसी कोई प्रक्रिया दी गई है?

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि चूंकि निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर आरोप लगाए हैं. इसलिए निष्पक्ष जांच के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग की सलाह पर दोनों को छुट्टी पर भेजा गया है.

हालांकि दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 की धारा 4अ(1) के तहत सीबीआई निदेशक को उस चयन समिति की सहमति के बिना नहीं हटाया जा सकता है, जिसने निदेशक की नियुक्ति की सिफारिश की थी.

इस चयन समिति में प्रधानमंत्री, संसद में विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश होते हैं. कानून के मुताबिक सीबीआई निदेशक का तबादला भी बिना चयन समिति की सहमति के नहीं किया जा सकता है.

अब सवाल ये उठता है कि आखिर सीवीसी की सिफारिश को चयन समिति के सामने क्यों नहीं रखा गया और क्यों सरकार ने आनन-फानन में आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेज दिया.

केंद्र सरकार अपने बचाव में ये तर्क दे रही है कि सीवीसी की सलाह पर आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजा गया है. हालांकि डीएसपीई अधिनियम, 1946 की धारा 4(1) के तहत सीवीसी उसी स्थिति में सीबीआई पर अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकता है जब भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया हो. हालांकि हकीकत ये है कि आलोक वर्मा के खिलाफ इस अधिनियम के तहत कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है.

कैसे होती है सीबीआई निदेशक की नियुक्ति

सीबीआई निदेशक के नियुक्ति की प्रक्रिया दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 की धारा 4अ में दी गई है. धारा 4अ को लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के बनने के बाद संशोधित किया गया था.

लोकपाल कानून बनने से पहले सीबीआई निदेशक की नियुक्ति दिल्ली स्पेशल पुलिस एक्ट के तहत की जाती थी. इस एक्ट के तहत, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, गृह सचिव और कैबिनेट सचिवालय के सचिवों की समिति में संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार की जाती थी. इस पर आखिरी फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय के साथ बातचीत के बाद लिया जाता था.

हालांकि लोकपाल कानून आने के बाद गृह मंत्रालय द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी मामलों की जांच करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की एक सूची तैयार की जाती है जिसमें से किसी एक को सीबीआई निदेशक नियुक्त करना होता है. इसके बाद इस सूची को प्रशिक्षण विभाग के पास भेजा जाता है जहां पर इसकी वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर आकलन किया जाता है. इसके बाद एक सूची लोकपाल सर्च कमेटी के पास भेजी जाती है जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता होते हैं. सर्च कमेटी नामों की जांच करती है और सरकार को सुझाव भेजती है.

आलोक वर्मा 1979 बैच के एजीएमयूटी (अरुणाचल, गोवा, मिजोरम, केंद्र शासित प्रदेश) कैडर के अधिकारी हैं. सीबीआई निदेशक का पद संभालने से पहले आलोक वर्मा दिल्ली पुलिस के कमिश्नर, दिल्ली कारागार निदेशक, मिजोरम और पुदुचेरी के डीजीपी जैसे पदों पर रह चुके थे. वर्मा सीबीआई के एकमात्र ऐसे निदेशक हैं जो एजेंसी के अंदर काम किए बगैर सीधे नियुक्त किए गए थे.

वर्मा को 17 जनवरी 2017 को सीबीआई निदेशक नियुक्त किया गया था. आलोक वर्मा की नियुक्ति के लिए जो समिति बनाई गई थी उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विपक्ष के नेता मल्लिकाअर्जुन खड्गे और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर थे. ध्यान देने वाली बात ये है कि खड्गे वर्मा की नियुक्ति को लेकर सहमत नहीं थे और उन्होंने मीटिंग में विरोध पत्र (डिसेंट नोट) दिया था.

सीबीआई निदेशक को हटाने या तबादले के क्या है नियम?

दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम, 1946 की धारा 4बी के तहत सीबीआई निदेशक कार्यकाल दो साल के लिए होता है. इससे पहले निदेशक को हटाया नहीं जा सकता है. अधिनियम के मुताबिक, ‘निदेशक, सेवा की शर्तों से संबंधित नियमों के विपरीत किसी भी चीज के बावजूद, उस पद से दो साल के लिए रहेगा, जिस तारीख से वह पद्भार ग्रहण करता है.’

इसके अलावा धारा 4बी(2) के तहत सीबीआई निदेशक का तबादला भी इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता है. अगर निदेशक का तबादला करना है तो उस कमेटी से सहमति लेनी होगी जिसने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए नाम की सिफारिश की थी.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में विनीत नारायण बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में कहा था कि सीबीआई निदेशक, उसकी वरिष्ठता की तारीख के बावजूद, का कार्यकाल कम से कम दो साल का होगा. इससे यह सुनिश्चित होगा कि सभी मामलों में उपयुक्त एक अधिकारी को केवल इस आधार पर अनदेखा नहीं किया जा सकेगा क्योंकि उसकी नियुक्ति की तारीख की वजह से दो साल से कम समय तक ही काम कर पाएगा.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेहद जरुरी स्थिति में अगर सीबीआई निदेशक का तबादला करना है तो उसमें चयन समिति की सहमति होनी चाहिए.

क्या है मौजूदा मामला?

इस मामले की शुरुआत साल 2017 से होती है जब मोदी सरकार ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा की सिफारिश के बावजूद कुछ आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति सीबीआई में नहीं की. अक्टूबर 2017 में राकेश अस्थाना की नियुक्ति को लेकर सीवीसी के साथ हुई बैठक में सीबीआई निदेशक वर्मा ने एक गोपनीय पत्र दिया था.

कथित रूप से उस पत्र में स्टर्लिंग बायोटेक मामले को लेकर अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत थी. आरोप है कि कंपनी के परिसर में पाई गई एक डायरी के मुताबिक अस्थाना को कंपनी द्वारा 3.88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. स्टर्लिंग बायोटेक पर 5,000 करोड़ रुपये से ऊपर के लोन की हेराफेरी की जांच चल रही है.

इस साल जून में सीबीआई निदेशक वर्मा ने एक बार फिर अस्थाना पर निशाना साधा. निदेशक ने सीवीसी को लिखा कि उनकी अनुपस्थिति में राकेश अस्थाना सीवीसी मीटिंग में सीबीआई नियुक्ति के दौरान उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं.

वर्मा ने कहा कि अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को लेकर जांच चल रही है. हालांकि अस्थाना ने भी निदेशक पर पलटवार किया. अस्थाना ने कैबिनेट सचिव को अगस्त में पत्र लिखा कि आलोक वर्मा उनकी जांच में हस्तक्षेप कर रहे हैं और आईआरसीटीसी घोटाला मामले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ छापेमारी रोकने की कोशिश की.

इस मामले के दो महीने के अंदर ही वर्मा ने अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में एफआईआर दर्ज कराया.

क्या है अस्थाना पर आरोप

अस्थाना पर आरोप है कि उन्होंने मीट कारोबारी मोईन कुरैशी भ्रष्टाचार मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के जरिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी. सीबीआई का आरोप है कि लगभग तीन करोड़ रुपये पहले ही बिचौलिये के जरिये अस्थाना को दिए जा चुके हैं.

सीबीआई का दावा है कि वॉट्सऐप मैसेजेस से इस बात की पुष्टि होती है कि अस्थाना को रिश्वत दी गई है. हालांकि हैदराबाद का व्यापारी अस्थाना से न तो कभी मिला और न ही बात की है. ये भी  कहा जा रहा है कि चूंकि अस्थाना वाले मामले में कोई रंगे हाथ रिश्ववत लेते पकड़ा नहीं गया इसलिए सीबीआई को एफआईआर करने से पहले सरकार से इजाजत लेनी चाहिए थी.

इस मामले को लेकर सीबीआई के अंदर भी दो धड़े हो गए हैं. ज्यादातर लोग आलोक वर्मा के साथ हैं. हालांकि कुछ लोग राकेश अस्थाना के भी साथ हैं. इनके अलावा तमाम अधिकारियों ने किसी का पक्ष नहीं लिया है.

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