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इससे पहले कि बिड़ला-सहारा डायरी केस हमेशा के लिए दफ़न हो जाए, ये सवाल पूछे जाने बेहद ज़रूरी हैं

वह समय आ चुका है जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को गंभीरता से विचार-विमर्श करके इन दस्तावेजों की विस्तृत जांच के लिए कोई रास्ता निकालने के बारे में सोचना चाहिए.

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भ्रष्टाचार लगातार हमारे समाज की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बना हुआ है. नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर सवार होकर 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी. उन्होंने और एक ऐसी सरकार का वादा किया था, जो भ्रष्टाचार और काले धन की समस्या पर तत्परता से कार्रवाई करेगी लेकिन, हकीकत और किए गए वादों के बीच फासला बहुत ज़्यादा है. 

अक्टूबर, 2013 में आयकर विभाग और सीबीआई ने आदित्य बिड़ला ग्रुप की कंपनियों के कई दफ्तरों पर एकसाथ छापे मारे. इन छापों में दिल्ली के कॉरपोरेट ऑफिस से 25 करोड़ रुपए के नकद के साथ ही बड़ी संख्या में दस्तावेजों, नोट शीट्स, अनौपचारिक खातों, ई-मेल्स, कंप्यूटर हार्ड डिस्क और इस तरह की कई दूसरी चीज़ें बरामद हुई थीं. सीबीआई ने जल्दी ही सारे कागज़ात आयकर विभाग को सुपुर्द कर दिए थे, जिसने इस मामले की जांच की. आयकर विभाग ने डीजीएम अकाउंट्स, आनंद सक्सेना से पूछताछ की, जो बरामद हुए नकद के संरक्षक थे. आनंद ने बताया कि कंपनियों को यह नकद विभिन्न हवाला डीलरों से प्राप्त हुआ था, जो रोज़ या एक दिन छोड़कर आते थे और 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक नकद में देकर जाया करते थे. आनंद द्वारा बताए गए एक हवाला डीलर से आयकर विभाग ने पूछताछ भी की, जहां उसने स्वीकार किया कि वह यह काम कर रहा था.

आनंद ने यह भी बताया कि यह नकद इसके बाद ग्रुप प्रेसिडेंट शुभेंदु अमिताभ के कहने पर कुछ खास लोगों तक पहुंचाया जाता था. उन्होंने अपने अलावा चार अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के नाम बताए, जिन्हें यह नकद बांटने जिम्मा दिया गया था. आनंद ने कहा कि उन्हें यह नहीं पता था कि लोगों को नकद में किए जा रहे इस भुगतान के पीछे मकसद क्या था?

‘गुजरात सीएम’ से गुजरात अल्कलीज़ एंड केमिकल्सतक

नकद प्राप्ति और भुगतान को दर्ज करनेवाले कुछ दस्तावेज आनंद सक्सेना की लिखावट में थे, जो बता रहे थे कि 7.5 करोड़ पर्यावरण मंत्रालय को दिए गए. इस एंट्री के सामने ‘प्रोजेक्ट जे’ लिखा गया था. इस दस्तावेज से बिड़ला की परियोजना के पर्यावरण क्लियरेंस के लिए कई और पेमेंट किए जाने की बात का भी पता चल रहा था. इन भुगतानों की तारीखों का मिलान आसानी से इन परियोजनाओं के पर्यावरण क्लियरेंस की तारीख से किया जा सकता था.

शुभेंदु अमिताभ के कंप्यूटर से बरामद किए गए ई-मेलों ने बड़ी संख्या में ऐसे संदेशों को उजागर किया, जो विभिन्न डीआरआई (डायरेक्टोरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलीजेंस) अधिकारियों को किए गए भुगतानों की ओर इशारा करते थे. इन भुगतानों का मकसद एजेंसी द्वारा कोयला निर्यात की अंडर इनवॉयसिंग (कम बिल बनाना) और दूसरी अनियमितताओं के लिए बिड़ला ग्रुप ऑफ कंपनियों के खिलाफ चल रही जांच को लटकाना या उन्हें बंद करना था.

अमिताभ के ई-मेलों में एक को़ड एंट्री भी थी- ‘गुजरात सीएम 25 करोड़’ (12 का भुगतान किया गया, बाकी?)  जब उनसे इस एंट्री के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था कि ‘गुजरात सीएम’ का मतलब है गुजरात अल्कलीज एंड केमिकल्स. जब उनसे पूछा गया कि क्या किसी और जगह पर उन्होंने ‘गुजरात अल्कलीज एंड केमिकल्स’  को ‘गुजरात सीएम’ के तौर पर दर्ज किया है, तो वे इसका जवाब नहीं दे पाए. न ही वे ऐसा कोई दस्तावेज भी पेश कर पाए, जो गुजरात अल्कलीज एंड केमिकल्स और बिड़ला ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के बीच 25 करोड़ के किसी लेन-देन की ओर इशारा करते हों.

आयकर विभाग ने तब एक विस्तृत मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की, जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि शुभेंदु अमिताभ द्वारा दी गई यह सफाई यकीन के लायक नहीं है और इस मामले की आगे जांच करने की ज़रूरत है लेकिन  दुर्भाग्य से विभाग ने इस मामले को प्रिवेंशन ऑफ करप्शन अधिनियम के तहत सीबीआई को सुपुर्द नहीं किया, जबकि प्रथमदृष्टया डीआरआई अधिकारियों, पर्यावरण मंत्रालय और ‘गुजरात सीएम’ आदि को किया गया भुगतान सरकारी कर्मचारियों को किया गया था, जो कि प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी मे आता है और इसकी जांच के लिए सीबीआई ही नामित एजेंसी है.

यहां आश्चर्य यह नहीं है कि जब ये छापे पड़े और कागज़ात आदि बरामद किए गए, उस समय की मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया, क्योंकि इस डायरी में जिन भुगतानों का जिक्र था, वे सब यूपीए सरकार के अधिकारी थे. लेकिन  यह जरूर आश्चर्यजनक है कि सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने, जिसे जाहिर तौर आयकर विभाग द्वारा की गई जांच की जानकारी थी,  इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया. मोदी ने अपनी रैलियों में कई बार ‘जयंती टैक्स’ का ज़िक्र किया था, इससे उनका इशारा पर्यावरण क्लियरेंस के लिए तब पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन को पहुंचाए जाने वाले ‘टैक्स’ की ओर था. बरामद किए गए बिड़ला कागज़ातों की जांच से उनके इन आरोपों को बल मिलता. बिड़ला कागज़ातों की जांच कराने के प्रति मोदी की अनिच्छा का संबंध सिर्फ उस एक एंट्री से जोड़ा जा सकता है और वह है, 25 करोड़ के लिए ‘गुजरात सीएम’  के नाम का ज़िक्र. कोई भी समझदार व्यक्ति यह मान सकता है कि यह एंट्री मोदी के नाम की है, क्योंकि जिस समय बिड़ला के कर्मचारियों ने यह लिखा था, उस समय वे ही ‘गुजरात सीएम’ (गुजरात के मुख्यमंत्री) थे.

सहारा का मिला सहारा

नवंबर, 2014 में जब मोदी सरकार का कार्यकाल शुरू हो चुका था, आयकर विभाग ने सहारा समूह की कुछ कंपनियों पर छापा मारा. इस छापे में 137 करोड़ रुपए के अलावा कॉरपोरेट ऑफिस से कई कंप्यूटर स्प्रेड शीट और नोट शीट बरामद हुईं. बरामद हुए इन दस्तावेजों ने भी सरकारी कर्मचारियों को किए गए भुगतानों को उजागर किया. एक स्प्रेड शीट में तारीखों, राशियों और 2013-14 तक की 115 करोड़ रुपए नकद की प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख था. ये लेन-देन 40 से 50 अलग-अलग दिनों में किए गए थे. दूसरी तरफ अलग-अलग लोगों को इस नकद के वितरण का उल्लेख था. (सटीक तौर पर कहें, तो 115 करोड़ में से 113 करोड़ का). इस नकद वितरण के ब्यौरे स्पष्ट लिखे थे. इसमें तारीखें लिखी थीं, जिस व्यक्ति को कैश दिया गया उसका नाम, जिस जगह पेमेंट दिया गया उसका नाम, यहां तक कि जो व्यक्ति यह भुगतान करने गया था उसकी जानकारी भी थी. इस स्प्रेडशीट में जिस व्यक्ति के नाम सबसे ज्यादा भुगतान का उल्लेख था, वे थे ‘गुजरात सीएम मोदी जी’. इन सभी एंट्री के मुताबिक उन्हें 9 किस्तों में कुल 40 करोड़ रुपए पहुंचाए गए. इसके बाद दूसरे सबसे बड़े हिस्से का भुगतान हुआ था मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को. उन्हें दो तारीखों पर 10 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया. इसमें अन्य नामों के साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को 4 करोड़ और दिल्ली के मुख्यमंत्री (जो उस समय शीला दीक्षित थीं) के नाम 1 करोड़ दर्ज था. एक और नोट शीट में 2010 में विभिन्न लोगों को किए गए पेमेंट के ब्यौरे दर्ज थे.

ये सारे दस्तावेज आयकर अधिकारियों के द्वारा जब्त किए गए थे और इन पर उनके दस्तखत हैं. इसके अलावा इन पर दो गवाहों और सहारा के एक अधिकारी ने दस्तखत किया है. लेकिन चौंकाने वाली बात है कि इन दस्तावेजों की गंभीरता के बावजूद आयकर विभाग ने प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत इस मामले की जांच सीबीआई को नहीं सौंपी.

इस मामले में आयकर विभाग की मूल्यांकन रिपोर्ट अब तक उपलब्ध नहीं है लेकिन इनकम टैक्स सेटलमेंट कमीशन के बाद आए एक आदेश के आधार पर यह कयास लगा सकते हैं कि आयकर विभाग का निष्कर्ष क्या रहा होगा था.  सहारा कंपनी ने इनकम टैक्स एक्ट के अनुच्छेद 245 के तहत आयकर विभाग के साथ इस मामले को सुलझाने के लिए सेटलमेंट कमीशन का दरवाजा खटखटाया था. सेटलमेंट कमीशन के सामने आया एक मुद्दा यह था कि क्या स्प्रेडशीट में वर्णित भुगतानों को अघोषित आय के रूप में सहारा की आमदनी के तौर पर शामिल किया जा सकता है? आयकर विभाग ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ये भुगतान साफ तौर पर प्रामाणिक थे, क्योंकि (पहला) ये खाते लंबे समय से चले आ रहे थे और इनकी देखभाल की जा रही थी. (दूसरा) क्योंकि स्प्रेडशीट में दिखाई गयी नकद प्राप्ति सहारा की मार्केटिंग कम्युनिकेशन कंपनी मैरकॉम के खाते की एंट्री से मेल खाती है. (तीसरा). सहारा द्वारा दी गई सफाई जिसमें उसने इन दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठाए थे, विरोधाभासी थी और उन पर यकीन नहीं किया जा सकता था.

इसलिए यह साफ था कि सहारा को इस मामले में बेदाग नहीं कहा जा सकता था, लेकिन फिर भी सेटलमेंट कमीशन ने सहारा को आयकर अधिनियम के तहत आपराधिक जवाबदेही से मुक्त कर दिया और उसे छिपा कर रखी गयी आमदनी पर एक हजार करोड़ रुपए के करीब का टैक्स भरने का आदेश देकर छोड़ दिया.

इससे भी ज्यादा दिलचस्प यह है कि सेटलमेंट कमीशन ने इस मामले का निपटारा रिकॉर्ड समय में यानी सिर्फ तीन सुनवाइयों और तीन महीने से कम समय के भीतर कर दिया. इस मामले में 10 नवंबर, 2016 को फैसला आ गया था. और तो और यह मामला कमीशन के सिर्फ दो सदस्यों ने मिलकर निपटा दिया गया, क्योंकि सरकार द्वारा तीसरे सदस्य का तबादला कर दिया गया था.

सीवीसी चौधरी का प्रवेश

लंबे समय तक ये दस्तावेज आयकर विभाग के अंदर ही दफ़न रहे और जैसे-तैसे 2016 में ही फिर से सामने आ पाए. इसी समय मैंने इसकी प्रतियां हासिल कीं. इन दस्तावेजों से पहली नजर में प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत किए गए अपराधों का पता चल रहा था, जिनकी जैन हवाला मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप गंभीरता से पूर्ण जांच किए जाने की जरूरत थी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ डायरी में की गयी कोड एंट्रियों- जिसमें सिर्फ शुरुआती अक्षर (इनिशियल्स) और दी गई रकम का ज़िक्र था- को कोर्ट की निगरानी में जांच बैठाने के लिए पर्याप्त आधार माना था. यह अलग बात है कि कोर्ट के इस आदेश के बावजूद सीबीआई ने जैन डायरियों की जांच के दौरान इसमें शामिल सरकारी कर्मचारियों की संपत्ति की जांच नहीं की और सिर्फ डायरियों के आधार पर ही चार्जशीट दायर कर दी. दिल्ली हाईकोर्ट ने इसके बाद इस चार्जशीट को इस आधार पर खारिज कर दिया कि महज डायरियों को किसी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता.

जब सहारा-बिड़ला दस्तावेज मेरे हाथ लगे,  तब मेरा ध्यान इस तथ्य की और गया कि आयकर जांच के इंचार्ज केवी चौधरी थे, जो संबंधित अवधि में आयकर विभाग में मेंबर,  इनवेस्टीगेशन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. जून, 2015 में मोदी सरकार ने उन्हें भारत का केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) नियुक्त कर दिया. कॉमन कॉज़ ने इस नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में कई आधारों पर चुनौती दी. इन आधारों में आयकर जांचों को विफल करने और ‘स्टॉक गुरु’  घोटाले में संलिप्तता (इसमें उनके मातहत आयकर अधिकारियों द्वारा आयकर जांच में मदद पहुचाने के एवज में स्टॉक गुरु कंपनी से बतौर रिश्वत करोड़ों रुपए लेने की बात सामने आई थी) शामिल थे.

कॉमन कॉज़ के वकील के तौर पर हमने तब चौधरी की नियुक्ति के विचाराधीन मामले में ही बिड़ला-सहारा दस्तावेजों के मामले को उठाने का फैसला किया क्योंकि आयकर विभाग द्वारा इन दस्तावेजों को अपने पास दबा कर रखने और इन्हें सीबीआई के पास आपराधिक जांच के लिए न भेजने में चौधरी द्वारा कर्तव्यों का निर्वाह न करने का एक गंभीर मामला बनता था.

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प्रधानमंत्री के साथ चीफ जस्टिस जेएस खेहर (फोटो : RSTV)

आखिरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में

सुप्रीम कोर्ट में इस आवेदन पर 26 नवंबर, 2016 को जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ द्वारा सुनवाई  हुई. इस सुनवाई में जस्टिस खेहर ने हमसे कहा कि इन दस्तावेजों को जांच के लिए ज़रूरी प्रमाण नहीं माना जा सकता, अच्छा होगा कि हम बेहतर सबूत लेकर आएं. अगली सुनवाई से ठीक पहले मुझे बिड़ला केस की आयकर मूल्यांकन रिपोर्ट (एप्रेज़ल रिपोर्ट) हासिल हुई. सुनवाई के दिन मैंने इस रिपोर्ट का अध्ययन करने और अतिरिक्त सबूत दाखिल करने के लिए अदालत से थोड़ी मोहलत देने की इल्तज़ा की. कोर्ट ऐसी मोहलत देने के लिए तैयार नहीं था और मामले को महज दो दिन बाद दोबारा सुनवाई की तारीख मिली. इस समय तक नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का समय नज़दीक आ रहा था. जस्टिस खेहर वरिष्ठता क्रम में सबसे आगे थे, पर सेवानिवृत्त हो रहे मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश के बावजूद सरकार ने उनके नाम पर अब तक मुहर नहीं लगाई थी. मैंने कोर्ट से कहा कि ऐसे समय में जब जस्टिस खेहर की नियुक्ति की फाइल प्रधानमंत्री के पास विचाराधीन है, इस मामले में जल्दबाज़ी करना उचित नहीं होगा  क्योंकि इस मामले में प्रधानमंत्री को किए गए भुगतान के आरोपों की जांच भी शामिल है. थोड़ी नाराज़गी और थोड़े गुस्से के साथ कोर्ट ने अनिच्छा से इस मामले को 11 जनवरी, 2017 तक के लिए स्थगित कर दिया.

जस्टिस खेहर ने 4 जनवरी,  2017 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली. 11 जनवरी को दो वरिष्ठ जजों को, जो सामान्य तौर पर सुप्रीम कोर्ट की पीठों की अध्यक्षता करते थे, को उनसे भी वरिष्ठ जज के साथ बैठाया गया और जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता में (जो सामान्य स्थितियों में पीठ की अध्यक्षता नहीं करते) एक नई पीठ गठित की गई. जस्टिस अमिताभ रॉय को सहयोगी (जूनियर) जज बनाया गया. बिड़ला-सहारा मामला इस पीठ को भेजा गया. इन जजों ने इस मामले को सुना और अंत में एक आदेश पारित किया जिसमें कहा गया कि चूंकि ये नियमित या औपचारिक खाते नहीं हैं, इसलिए जैन हवाला मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर इन्हें जांच बैठाने के आधार के तौर पर नहीं स्वीकार किया जा सकता. उन्होंने खास तौर पर यह बात कही कि ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को इस तरह के ढीले-ढाले कागज़ों के आधार पर जांच के दायरे में नहीं लाया जा सकता. उन्होंने सेटलमेंट कमीशन के आदेश का इस्तेमाल करते हुए यह भी कहा कि सेटलमेंट कमीशन को इन दस्तावेजों का कोई सबूत नहीं मिला, इसलिए ये प्रामाणिक नहीं माने जा सकते.

कुछ समय बाद हमें पता चला कि जब जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस खेहर इस मामले की सुनवाई कर रहे थे, उस दौरान जस्टिस मिश्रा ने दिल्ली के अपने आधिकारिक निवास के साथ-साथ ग्वालियर के अपने निवास पर भी अपने भतीजे की शादी का समारोह किया था. यह जानकारी हमें सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने दी जो इस समारोह में मौजूद थे. उन्होंने बताया कि इस आयोजन में भाजपा के कई नेता मौजूद थे. एक अखबार में ग्वालियर में हुए इस रिसेप्शन में शिवराज सिंह के शामिल होने की तस्वीर भी आई. ये जानकारी महत्वपूर्ण इसलिए है कि सहारा स्प्रेडशीट में पैसे लेनेवालों की सूची में शिवराज सिंह चौहान का नाम भी था और जस्टिस मिश्रा इसी मामले की सुनवाई कर रहे थे.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए के लिए एक आचार संहिता निर्धारित की है, जिसमें कहा गया है कि जजों को अपने पद की प्रतिष्ठा के अनुरूप थोड़ा अलग-थलग रहना चाहिए. यहां स्वाभाविक तौर पर मतलब यह है कि उन्हें उन नेताओ के साथ मिलने-जुलने से परहेज करना चाहिए, जिनके मामले उनके सामने सुनवाई के लिए आने वाले हैं. इस आचार-संहिता में यह भी कहा गया है कि जजों को अपने मित्रों या संबंधियों से जुड़े मामलों की सुनवाई नहीं करनी चाहिए, उन पर फैसला नहीं करना चाहिए. इन दोनों को अगर एक साथ जोड़कर पढ़ा जाए, तो साफ है कि अगर एक जज अपने पारिवारिक समारोह में किसी राजनेता को अपने आवास पर आमंत्रित करता है, तो यह माना जा सकता है कि राजनेता उसका मित्र है और उस जज को अपने मित्र से जुड़े मामले की सुनवाई और उस पर फैसला नहीं करना चाहिए.

कालिखो पुल का सुसाइड नोट :  एक गुम कड़ी

हमारे आवेदन को खारिज करने के कुछ दिनों के बाद, ‘द वायर’  ने 8 फरवरी, 2017 को अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखे पुल के 60 पन्नों के कथित सुसाइड नोट को प्रकाशित किया. कालिखो पुल ने सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक पीठ द्वारा उन्हें कुर्सी से हटाने के आदेश के महज तीन हफ्तों के बाद 9 अगस्त, 2016 को आत्महत्या कर ली थी. इस पीठ का नेतृत्व जस्टिस खेहर और जस्टिस दीपक मिश्रा कर रहे थे. इस सुसाइड नोट, जो कि मृत शरीर के पास पाया गया था, जिसके हर पन्ने पर उनके इनिशियल और दस्तखत थे, में पुल ने कई राजनेताओं के साथ ही न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्यों से नज़दीकी तौर पर जुड़े लोगों के भ्रष्टाचार का ब्यौरा दिया है. इस नोट में ये बात सामने आती है कि वे खासतौर पर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से व्यथित थे. उन्होंने लिखा है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले (जिसमें अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन को निरस्त कर दिया गया और उन्हें कुर्सी से हटा दिया गया) जस्टिस खेहर के छोटे बेटे वीरेंद्र खेहर ने उनके पक्ष में फैसला देने के लिए 49 करोड़ रुपए देने की मांग रखी थी. उन्होंने यह भी लिखा है कि उनके पक्ष के फैसले के लिए 37 करोड़ रुपए की एक और मांग आदित्य मिश्रा द्वारा की गई थी, जिन्हें उन्होंने जस्टिस दीपक मिश्रा का भाई बताया है. इस सुसाइड नोट में राजनेताओं और संवैधानिक पदों पर बैठे कई लोगों पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनकी जांच किए जाने की जरूरत है. पुल की पत्नी दांगविम्साई भी सरकार से इसकी मांग कर रही हैं लेकिन  इस नोट की जांच कराने की ज़हमत किसी ने नहीं उठाई बल्कि इसकी प्रतियों को दबाकर इसे किसी को उपलब्ध नहीं कराया गया.

उस समय अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल जेपी राजखोवा ने ऑन रिकॉर्ड कहा था कि उन्होंने पुल के सुसाइड नोट में लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच कराने के लिए सीबीआई जांच की सिफारिश की है लेकिन फिर भी इसकी कोई जांच नहीं हुई है. फरवरी में ‘द वायर’ को इसकी एक प्रति मिली और उन्होंने इस नोट में लिखे जजों के नामों को ढककर हिंदी में लिखी इसकी मूल प्रति के साथ-साथ इसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया. इस नोट को बिना संशोधन के ‘कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटिबिलिटी एंड रिफॉर्म्स’ (सीजेएआर) ने प्रकाशित किया, ताकि मामले में पारदर्शिता बनी रहे और छिपाए गए नामों को लेकर अफवाहें न फैलाई जाएं.

सवाल जो अब भी बाकी हैं

जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने बिड़ला-सहारा डायरी के मामले की जांच को दफ़न कर दिया और जिस तरह से सरकार ने कालिखो पुल के सुसाइड नोट को दबा दिया और इस मामले में किसी आपराधिक जांच के आदेश नहीं दिए, वह अपने आप में कई परेशान करने वाले सवाल खड़े करता है :

  1. क्या मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर को कालिखो पुल के सुसाइड नोट के बारे में पता था? क्या उन्हें मालूम था कि इसमें उनका नाम भी लिखा हुआ है- जो कि ‘कैश फॉर जजमेंट’ (पैसे के बदले में फैसले) घोटाले के आरोपों को जन्म देता है.

  2. क्या जस्टिस खेहर द्वारा मामले को जानबूझकर जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ को हस्तांतरित करने का फैसला पुल के सुसाइड नोट के कारण किया गया?

  3. क्या जस्टिस खेहर जस्टिस अरुण मिश्रा के भाजपा नेताओं के साथ नज़दीकी संबंधों से वाक़िफ थे?

  4. क्या जस्टिस अरुण मिश्रा की भाजपा से नजदीकी- खासकर उन लोगों से जिनके नाम बिड़ला-सहारा डायरी में काला धन पानेवालों के तौर पर शामिल हैं (मसलन, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान) का संबंध इस मामले की जांच न कराने के फैसले से है?

  5. क्या सरकार द्वारा कालिखो पुल के सुसाइड नोट का इस्तेमाल बिड़ला-सहारा केस में जजों पर दबाव बनाने के लिए किया गया?

  6. क्या मोदी सरकार ने कालिखो पुल के सुसाइड नोट को तब तक दबाने का फैसला किया (इस तथ्य के बावजूद कि इसमें कांग्रेस के कई नेताओं और सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं) जब तक न्यायपालिका बिड़ला-सहारा रिश्वत मामले की जांच का आदेश नहीं देती?

यह क़ानून का आधारभूत सिद्धांत है कि मुकदमा दाखिल करने वाले के मन में पक्षपात की छोटी-सी शंका भी नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन करती है और न्यायालय के किसी निर्णय को महत्वहीन बना देती है. बिड़ला-सहारा छापे में बरामद किए गए कागज़ातों और कालिखो पुल के सुसाइड नोट में मौजूद तथ्य देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के बारे में सबसे मारक खुलासे हैं. ये देश के सबसे ऊंचे संवैधानिक पदों-  भारत के प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश- को लेकर गंभीर सवाल उठाते हैं. ऐसे दस्तावेज शायद ही कभी हमारे हाथ लगते हैं जो राजनेताओं और अधिकारियों को किए गए भुगतानों के बारे में इतने सिलसिलेवार ढंग और इतने विस्तार से बताते हों. खासतौर पर कालिखो पुल का सुसाइड नोट, मृत्यु के समय किसी व्यक्ति, वह भी किसी मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए आखिरी बयान की तरह है. क़ानून में इसे बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि क़ानून शास्त्र की सूक्ति है, ‘मुंह में झूठ लेकर कोई व्यक्ति अपने बनाने वाले से नहीं मिल सकता’ या यूं समझें कि मृत्यु शय्या पर पड़ा व्यक्ति झूठ नहीं बोलता.

भारतीय जनता को लंबे समय से राजनीति में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार की जानकारी रही है. नरेंद्र मोदी ने इन सबसे ऊपर होने का दावा किया था, लेकिन बिड़ला-सहारा कागज़ात कुछ और ही इशारा करते हैं. कालिखो पुल के सुसाइड नोट ने शीर्ष न्यायपालिका की ईमानदारी को लेकर जनता के यकीन को हिलाकर रख दिया है. बिड़ला-सहारा कागज़ातों और कालिखो पुल के सुसाइड नोट को बिना जांच किए दफ़न करने से जनता के मन का यह संदेह दूर नहीं होगा बल्कि ऐसा करने से उनका संदेह और मज़बूत होगा और अंततः यह नरेंद्र मोदी और न्यायपालिका की ईमानदारी के प्रति लोगों के विश्वास को दरकाने का काम करेगा. इसी कारण से इन दस्तावेजों के तथ्यों की एक पूर्ण और विश्वसनीय जांच कराने की ज़रूरत और बढ़ जाती है. देखा जाए तो असल में यह आज़ादी के बाद भारतीय न्यायपालिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट के जज आपस में मिल-बैठकर विचार करें और इन गंभीर दस्तावेज़ों की विस्तृत जांच कराने के लिए कोई रास्ता निकालें. इससे कम कुछ भी देश के उच्चतम राजनीतिक और न्यायिक पदों के प्रति लोगों के कम हुए विश्वास को बहाल करने में मददगार नहीं होगा.

(प्रशांत भूषण वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और कॉमन कॉज़ एनजीओ द्वारा केवी चौधरी की केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के तौर पर नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी जनहित याचिका के वकील हैं. इसी मुक़दमे के दौरान ही बिड़ला-सहारा डायरी मामले की सुनवाई हुई थी)

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