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भीमा-कोरेगांव हिंसा: सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुधा भारद्वाज गिरफ़्तार

पुणे की एक अदालत ने बीते शुक्रवार को सुधा भारद्वाज, वर्णन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा की जमानत याचिका ख़ारिज कर दी, जिसके बाद देर शाम वर्णन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा को गिरफ़्तार कर लिया गया था.

सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुधा भारद्वाज. (फोटो: द वायर)

सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुधा भारद्वाज. (फोटो: द वायर)

नई दिल्ली/पुणे: भीमा-कोरेगांव हिंसा को लेकर माओवादियों से कथित तौर पर संबंध होने के मामले में नज़रबंद मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है.

शुक्रवार को पुणे की एक अदालत ने उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी थी, जिसके बाद देर रात महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने हरियाणा के फरीदाबाद में सूरजकुंड स्थित सुधा भारद्वाज के घर से उन्हें गिरफ़्तार किया.

पुणे पुलिस सुधा भारद्वाज को गिरफ़्तार कर सूरजकुंड थाने ले गई. सूरजकुंड थाने के एसएचओ विशाल कुमार ने बताया कि पुणे पुलिस ने सुधा भारद्वाज की गिरफ़्तारी के बारे में उन्हें सूचना दे दी थी.

बताया जा रहा है कि गिरफ़्तारी से पहले ही सुधा भारद्वाज के घर के बाहर तैनात फरीदाबाद पुलिस के जवानों को हटा लिया गया था.

बहरहाल शनिवार को ही सुधा भारद्वाज को विशेष अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें छह नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया. शुक्रवार को गिरफ़्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ता वर्णन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा को भी छह नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है.

पुणे की एक अदालत ने शुक्रवार को सुधा भारद्वाज के अलावा वर्णन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा की जमानत याचिका ख़ारिज कर दी, जिसके बाद देर शाम वर्णन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा को गिरफ्तार कर लिया गया है.

भारद्वाज को शुक्रवार शाम को इसलिए गिरफ़्तार नहीं किया गया क्योंकि भारतीय क़ानून सूरज डूबने के बाद किसी महिला को गिरफ़्तार करने की इजाज़त नहीं देता. द हिंदू से बातचीत में सुधा भारद्वाज की वकील शालिनी गेरा ने कहा कि महाराष्ट्र की पुणे पुलिस शुक्रवार देर तकरीबन 12:30 बजे उनके घर सादे कपड़ों में गई थी.

बीते एक अक्टूबर को इस मामले में नज़रबंद किए गौतम नवलखा की नज़रबंदी को दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद हटा दिया गया था. उनकी गिरफ़्तारी पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक नवंबर तक रोक लगा दी गई है.

मालूम हो कि महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल 31 दिसंबर को हुए एलगार परिषद के सम्मेलन के बाद दर्ज की गई एक प्राथमिकी के सिलसिले में 28 अगस्त को इन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. इस सम्मेलन के बाद राज्य के भीमा-कोरेगांव में हिंसा भड़की थी.

वर्णन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा को छह नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेजा गया

माओवादियों से संपर्क के आरोप में एक अदालत ने शनिवार को सामाजिक कार्यकर्ताओं- वर्णन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा को छह नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया. अदालत ने कहा था कि पुलिस द्वारा जुटाई गई सामग्री से पहली नज़र में माओवादियों के साथ उनके कथित संपर्क दिखाई देते हैं.

जिला एवं सत्र न्यायाधीश केडी वदाने की अदालत में ज़िला सरकारी वकील और लोक अभियोजक उज्ज्वल पवार ने दलील दी कि क्योंकि सभी आरोपी उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर नज़रबंद हैं, उनसे इन मामले के संबंध में पूछताछ नहीं की जा सकी, इसके बाद अदालत ने दोनों कार्यकर्ताओं को पुलिस हिरासत में भेज दिया.

आरोपियों की 14 दिनों की पुलिस हिरासत मांगते हुए पवार ने अदालत को बताया कि प्रारंभिक जांच में खुलासा हुआ कि उनके प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) से संबंध हैं और माओवादी गतिविधियों के लिये भर्ती और धन जुटाने जैसी गतिविधियों में भी वे शामिल हैं.

पवार ने अदालत को बताया कि वे ‘देश के लोकतांत्रिक ढांचे को धमकी देने वाली व्यापक साज़िश’ में शामिल थे.

अदालत द्वारा जमानत खारिज किये जाने के बाद गोंजाल्विस और फरेरा को मुंबई स्थित उनके घरों से पुणे लाया गया. उनकी चार हफ़्तों की नजरबंदी की अवधि भी शुक्रवार को खत्म हो रही थी.

पुलिस हिरासत का विरोध करते हुए गोंजाल्विस का प्रतिनिधित्व कर रहे बचाव पक्ष के वकील राहुल देशमुख ने अदालत में दलील दी कि पुलिस ने अपनी हिरासत रिपोर्ट में यह नहीं कहा है कि उन्हें आरोपियों से कोई सामग्री बरामद करने की ज़रूरत है.

मालूम हो कि बीते 28 अगस्त को महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर पांच कार्यकर्ताओं- कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंसाल्विस को गिरफ़्तार किया था.

महाराष्ट्र पुलिस ने आरोप लगाया है कि इस सम्मेलन के कुछ समर्थकों के माओवादी से संबंध हैं. जिला और सत्र न्यायाधीश (विशेष न्यायाधीश) केडी वडाणे ने भारद्वाज, गोंसाल्विस और फरेरा की जमानत याचिका ख़ारिज कर दी.

महाराष्ट्र पुलिस के इस क़दम पर इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन, समाजशास्त्र के प्रो. सतीश पांडे और मानवाधिकार कार्यकर्ता माजा दारूवाला ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर इन मानवाधिकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई तथा उनकी गिरफ्तारी की स्वतंत्र जांच कराने का अनुरोध किया था.

इसके बाद 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ताओं की हुई गिरफ्तारी को लेकर विशेष जांच दल (एसआईटी) की मांग को ख़ारिज कर दिया था और कहा कि इस मामले में लोगों की गिरफ्तारी उनकी प्रतिरोध की वजह से नहीं हुई है. जो भी आरोपी हैं वो कानून में मौजूद प्रावधानों के तहत राहत पा सकते हैं.

इससे पहले महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल पुणे में आयोजित एलगार परिषद की ओर से आयोजित कार्यक्रम से माओवादियों के कथित संबंधों की जांच करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन और महेश राउत को जून में गिरफ्तार किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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