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‘यौन उत्पीड़न पर ख़ामोश रहने का फ़ायदा सिर्फ़ आरोपी को मिलता है’

साक्षात्कार: कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और मीटू आंदोलन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर जानी-मानी इतिहासकार व नारीवादी उमा चक्रवर्ती और आंबेडकर विश्वविद्यालय की शिक्षक वसुधा काटजू से सृष्टि श्रीवास्तव की बातचीत.

वसुधा काटजू और उमा चक्रवर्ती. (ग्राफिक्स: मनिंदर पाल सिंह)

वसुधा काटजू (बाएं)और उमा चक्रवर्ती (दाएं). (ग्राफिक्स: मनिंदर पाल सिंह)

पिछले कुछ महीनों से विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं #मीटू मुहिम के तहत अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा कर रही हैं. महिलाओं ने सोशल मीडिया पर अपने साथ हुए उत्पीड़न के मामलों पर आपबीती बताते हुए उन पुरुषों के नाम भी खुलकर लिखे जिनके कारण उनको शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुज़रना पड़ा और कई बार तो नौकरी भी छोड़नी पड़ी.

इस सिलसिले में कई बड़े नाम सामने आए और उस पर बहुत सी प्रतिक्रियाएं भी आईं. बहुत से आरोपियों ने इस पर चुप्पी साधना ठीक समझा और बहुतों ने इस पर ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ और ‘विक्टिम शेमिंग’ यानी इसके लिए पीड़िता को ही ज़िम्मेदार ठहराया और उसे शर्मसार करने का प्रयास किया.

जब कभी भी बलात्कार, यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आती हैं तो समाज अक्सर महिला को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराता है.

इस सिलसिले में कई बार महिलाओं से ही सवाल किए जाते हैं कि आख़िर वे उस समय पर उस जगह पर मौजूद क्यों थीं या उन्होंने कैसे कपड़े पहने थे या वे उस व्यक्ति के साथ क्यों गईं, किसी पर विश्वास क्यों किया या जब परेशानी थी तो नौकरी या कॉलेज छोड़ क्यों नहीं दिया.

मतलब समाज में विश्वास तोड़ने और उत्पीड़न करने वाले को नहीं बल्कि पीड़ित को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है और कई ऐसे मामले भी सामने आए जिसमें पीड़िता को किसी व्यवस्थित समर्थन प्रणाली के न होने के कारण नौकरी तक छोड़नी पड़ी.

#मीटू आंदोलन अपने आप में कई मायनों में विशेष था. उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि महिलाएं एक दूसरे के साथ मज़बूती से खड़ी नज़र आईं.

विशाखा गाइडलाइन आने के बाद भी बहुत से विश्वविद्यालयों और कार्यस्थलों में आंतरिक शिकायत समिति (इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी यानी ईसीसी) का गठन नहीं हुआ है और कुछ में आईसीसी गठन होने में सही प्रक्रिया का पालन न होने के कारण पारदर्शिता में बहुत सी ख़ामियां हैं. कहीं आईसीसी होने के बाद भी यौन उत्पीड़न की समस्या में पीड़िता और आरोपी दोनों के अधिकारों को महत्व न दे पाने का एक बड़ा कारण संस्थानों में ‘पावर इक्वेशन’ है यानी अलग-अलग पदों पर होने के कारण ताक़त का प्रयोग, जिसको समझते हुए ही विशाखा गाइडलाइन लाई गई.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 1992 में कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न को लेकर दिशा निर्देश बनाए गए थे. राजस्थान सरकार और विशाखा एनजीओ के बीच यह एक ऐतिहासिक केस था, जिसने समाज में महिलाओं की स्थिति मज़बूत करने में काफी सहायता की.

उस दौरान बाल विवाह रोकने के लिए राजस्थान सरकार ने अभियान चलाया था जिसमें भंवरी देवी नाम की महिला राजस्थान सरकार के महिला विकास परियोजना से जुड़कर कार्य कर रहीं थीं.

उन्होंने एक साल की बच्ची का विवाह रोकने की कोशिश की थी जिसके बाद पांच ग्रामीणों ने भंवरी के पति को बांधकर उनकी आंखों के सामने उनका बलात्कार किया था.

चौंकाने वाली बात यह थी कि जिला एवं सत्र न्यायलय ने बाद में इन पांचों आरोपियों को बरी कर दिया. इस घटना के बाद ‘विशाखा’ नाम के एनजीओ द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली गई.

इसमें याचिकाकर्ताओं ने कार्यस्थल को महिलाओं की लिए सुरक्षित बनाने और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं से निपटने के लिए एक क़ानून बनाने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग रखी थी.

इस मामले में कामकाजी महिलाओं को यौन अपराध, उत्पीड़न और प्रताड़ना से बचाने के लिए कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइन को उपलब्ध कराया और अगस्त 1997 में इस फैसले में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की बुनियादी परिभाषाएं दीं गई. जिसके बाद दिशानिर्देश तैयार किए गए और फिर क़ानून बनाया गया और सार्वजानिक व निजी कार्यस्थलों में इनका पालन अनिवार्य कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाया गया यह क़दम ऐतिहासिक था.

उसके बाद कार्यस्थल पर महिलाओं के सम्मान की सुरक्षा के लिए वर्कप्लेस बिल, 2012 भी लाया गया जिसमें लैंगिक समानता, जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों को लेकर कड़े क़ानून बनाए गए हैं. लेकिन इस पर क़ानून होते हुए भी अभी भी समस्या बहुत ज़्यादा दिखती है.

आज भी अधिकांश मामलों में पीड़िता को ही कीमत चुकानी पड़ती है. बहुत सी जगहों पर आज भी आईसीसी नहीं है जहां है भी वहां पारदर्शिता नहीं और ताकत का दुरुपयोग होता है और कई जगहों पर जहां महिलाएं संविदा कर्मचारी हैं वहां उन्हें कर्मचारी समझा ही नहीं जाता और यौन उत्पीड़न की शिकायत करने पर नौकरी तक से निकाल दिया जाता है.

हाल ही में आकाशवाणी में जो हुआ वो इस बात का उदाहरण है. वहां यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली नौ महिला कर्मचारियों को निकाल दिया गया.

मीटू आंदोलन के साथ बहुत सारे सवाल भी खड़े हुए. इसके महत्व, दायरे, इतिहास और तरीके पर बहस हुई. कुछ लोगों को कहना था ये एलीट महिलाओं का आंदोलन है, कुछ लोग ने इसे ‘नेम एंड शेम’ यानी नाम लेकर किसी को बदनाम करने की कोशिश कहकर इस आंदोलन का विरोध किया.

हालांकि कुछ लोग इस तरीके के पक्ष में भी थे. कुछ महिलाओं का कहना था कि इस तरह का आंदोलन पहली बार हुआ है वहीं कुछ महिलाएं कह रही थीं कि इतिहास में छोटे स्तर पर ही लेकिन कुछ महिलाओं के प्रतिरोध के कारण एक ज़मीन तैयार हुई जिस पर बाद में यौन उत्पीड़न को लेकर क़ानून बना.

इन तमाम पहलूओं को लेकर जानी-मानी इतिहासकार और नारीवादी उमा चक्रवर्ती और आंबेडकर विश्वविद्यालय की शिक्षक वसुधा काटजू की द वायर के साथ बातचीत.

उमा ने जाति और लैंगिक समानता सहित इतिहास के कई विषयों पर किताबें लिखीं हैं. उमा को भारत में नारीवाद आंदोलन की ‘फाउंडिंग मदर’ भी कहा जाता है.

वसुधा लंबे समय तक नारीवादी आंदोलन से जुड़ी रहीं हैं. उन्हें शिक्षक के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता के तौर भी जाना जाता है. दोनों ही यौन उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर मुखर होकर अपनी आवाज़ उठती रहीं हैं.

इन दिनों महिलाएं मीटू आंदोलन के तहत कार्यस्थल पर होने वाले उत्पीड़न के अपने अनुभवों के साथ सामने आई हैं. इसके बारें में आप क्या सोचती हैं?

वसुधा: मीटू आंदोलन एक महत्वपूर्ण शुरुआत है लेकिन हमें ये समझना होगा कि यह पहला आंदोलन नहीं है जिसने कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा का मुद्दा उठाया है. इससे पहले भी कई महिला संगठनों ने इस मुद्दे को उठाया है जिसके कारण विशाखा गाइडलाइन क़ानूनी रूप से लागू हो सका.

इससे पहले भी कुछ महिलाओं ने अपने कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की शुरुआत की थी. लेकिन इस बार की ख़ासियत यह है कि ये सारी कहानियां या घटनाएं खुले तौर पर सार्वजनिक हुई हैं.

जो बातें पहले छिपी रहती थीं या अनकही रह जाती थीं वो अब पूरे समाज के सामने आई हैं. यौन उत्पीड़न को लेकर जो खामोशी होती है, उससे केवल आरोपी को फ़ायदा होता है. जब यह बातें सामने आती हैं तो यह संभावना पैदा होती है कि पीड़िता को न्याय मिले.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक महिला के बोलने से इस बात की संभावना बहुत बढ़ जाती है कि अन्य महिलाएं भी अपनी बात बोलने की हिम्मत कर सकेंगी.

किसी कार्यस्थल पर जब एक पीड़िता अपनी आपबीती को बताते हुए शिकायत दर्ज कराती है तो उसके साथ मज़बूती से लोग खड़े होते हैं तो और दूसरी महिलाओं को भी हिम्मत मिलती है.

जैसा कि आपने कहा कि मीटू अभियान के पहले भी बहुत से ऐसे मामले सामने आए जिनके ज़रिये कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न पर बहस शुरू हो सकी. मीटू अभियान समाज में क्या बदलाव लाएगा?

वसुधा: यह बात सही है कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि कार्यस्थल पर उत्पीड़न का मुद्दा सामने आया है. इससे पहले भी कुछ बहुत बड़े नाम इसमें सामने आ चुके हैं जिनमें जस्टिस एके गांगुली, जस्टिस स्वतंत्र कुमार और पर्यावरणविद्र आके पचौरी के नाम शामिल हैं.

अलग-अलग समय में सामने आए ये अलग-अलग मामले महत्वपूर्ण हैं. इससे पहले कई बार महिलाओं ने यौन उत्पीड़न के साथ कार्यस्थल पर होने वाले भेदभाव, आय में अंतर और महिलाओं के लिए बुनियादी व्यवस्थाओं कि मांग उठाई है, जिनका असर भी हुआ है.

मीटू आंदोलन ने महिलाओं को एक साथ आने का एक मौका दिया, इन कहानियों को एक गति दी जिससे वे एक दूसरे से हिम्मत लेकर सामने आ पाईं हैं.

विशाखा गाइडलाइन को मीडिया हाउस या किसी भी संस्थान में लागू करने में क्या क्या दिक्कतें आ रही हैं और इसमें संस्थान में अलग अलग पदों के कारण ‘पावर इक्वेशन’ कैसे काम करता है?

उमा: सबसे पहले तो हमें समझना पड़ेगा कि हर तरह के कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न की समस्या से निपटने के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली बनाना बहुत ज़रूरी है.

विशाखा गाइडलाइन ने इस बात को साफ किया है कि यह ज़िम्मेदारी नियोक्ता की होती है. ज़्यादातर संस्थानों जैसे कि मीडिया हाउस में बॉस या एडिटर के पास बहुत सी ताकत होती है. वे एक रिपोर्टर को कहीं भी भेज सकते हैं या बुला सकते हैं, अपने मन की चीज़ें करने का लाइसेंस होता है.

रिपोर्टर को नौकरी देना और निकाल देना, प्रमोशन देना पूरी तरह से उनके हाथ में होता है, हमें समझना होगा मालिक हायर एंड फायर पॉलिसी का प्रयोग कर सकते हैं.

20-21 साल की एक महिला के साथ जो कुछ हुआ वो आज उसे बता पा रही है, लेकिन बहुत सी महिलाएं ऐसी भी हैं जो बीस साल पहले की घटनाएं साझा कर रहीं है, अब जब वे किसी प्रोफेशन में सेटल हो गई हैं या उस संस्थान से निकल कर कहीं और नौकरी करने लगी हैं.

मतलब अब उन्हें डर नहीं है जैसा बीस साल पहले करिअर की शुरुआत में था. इसका सीधा कारण है मीडिया और एनजीओ जैसे संस्थानों की जवाबदेही में कमी होना.

अगर कर्मचारियों की कोई स्थायित्व ही नहीं होगी और वो हर तरह से संस्थान के मालिक पर निर्भर करेंगी ऐसे में ताकत का दुरुपयोग होना आम बात है.

अगर 20-22 साल की किसी लड़की को एडिटर किसी होटल में बुलाता है तो उनका वहां जाना मजबूरी होती है. आख़िर वो मालिक है जो नौकरी देता है या नौकरी से निकाल सकता है.

किसी भी संस्थान में इस तरह की व्यवस्थित प्रणाली होनी ज़रूरी है जो महिलाओं के प्रति जवाबदेह हो और संस्थान में महिला को वस्तु की तरह न देखा जाए.

जिस तरह की कहानियां बाहर आ रही हैं वो दिल दहलाने वाली हैं किसी महिला को कार्यस्थल पर ग़लत तरीके से छुआ जा रहा है, ग़लत बातें बोली जा रही हैं, धमकाया जा रहा है, इससे ख़तरनाक और क्या हो सकता है.

विशाखा गाइडलाइन ने इस बात को साफ तरीके से कहा कि किसी भी संस्थान में महिलाओं के प्रति जवाबदेह एक व्यवस्थित प्रणाली का होना मालिक या नियोक्ता की ज़िम्मेदारी हैं.

इस प्रोफेशन में इतनी सारी महिलाएं आई हैं, पर उस हिसाब से व्यवस्था ठीक नहीं की गई, किसी ने नहीं सोचा कि महिलाएं आकर काम करेंगी तो उस जगह का माहौल भी सुधारा जाए, सुरक्षित बनाया जाए और ऐसी नीतियां हों जो महिला के प्रति जवाबदेह हों.

जो लोग कह रहे हैं कि महिला को सार्वजनिक तौर पर लिखकर ‘नेम एंड शेम’ नहीं करना चाहिए वो ख़ुद बताएं कि तरीका क्या बचा है. जब यौन उत्पीड़न की समस्या से निपटने के लिए किसी भी संस्थान में पारदर्शी और मज़बूत प्रणाली है ही नहीं तो महिलाओं के पास एक ही रास्ता बचता है वो है सार्वजनिक तौर पर आकर #मीटू कहना.

अगर आपकी व्यवस्था पारदर्शी, निष्पक्ष और मज़बूत नहीं है कि महिला को उस पर विश्वास हो सके तो उसे जो तरीका सही लग रहा है उसे वह अपनाना ही चाहिए.

हर संस्थान में चुनी हुई आईसीसी होनी ज़रूरी है, हर संस्थान को उसके विभागों में बांटा जाना चाहिए और हर विभाग का प्रतिनिधि आईसीसी में होना चाहिए. संस्थान में ताकत को समझते हुए यह बात बहुत पहले साफ कर दी गई थी आईसीसी के सदस्य मालिक द्वारा नियुक्त नहीं होने चाहिए.

आपने अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की है और लंबे समय तक पढ़ाया भी है. इस दौरान उत्पीड़न से संबंधित आपका कोई अनुभव?

उमा: मैं वर्ष 1970 में अपनी रिसर्च के लिए विशेष भाषा का कोर्स कर रही थी. उस कोर्स में सिर्फ़ तीन छात्र-छात्राएं थे. बाद में दो ने ड्रॉप कर दिया तो मैं अकेले बची. अब अकेले किसी भी छात्र-छात्रा को पूरा क्लासरूम तो नहीं दिया जा सकता तो प्रोफेसर के केबिन में ही पढ़ाई होती थी.

उस दौरान एक प्रोफेसर ने अपनी ताक़त और पद का प्रयोग करते हुए मुझसे कई बार आपत्तिजनक बातें कहीं और उस जगह को मेरे लिए बहुत डरावना बना दिया.

ख़ास बात यह है उस समय यौन उत्पीड़न जैसी चीज़ों को समझाने के लिए भाषा ही नहीं होती थी एक शब्द हम जानते हैं वो था ईव टीज़िंग पर वो शब्द तो सड़क के गुंडों द्वारा की गई छेड़छाड़ के लिए प्रयोग किया जाता था.

आख़िरकार मैंने कुछ नहीं कहा और क्लास जाना ही छोड़ दिया. जब परीक्षाएं हुईं तो हर हर विषय में मुझे 70% से ज़्यादा अंक मिले और इस प्रोफेसर के विषय में मात्र 40% अंक मिले. चुप रहने का और न बोल पाने की कीमत आख़िरकार मुझे ही चुकानी पड़ी.

ऐसे भी कुछ मामले आए जहां निवारण की कोई व्यवस्था न होने के कारण उस समय हम लोगों ने पोस्टर लगाकर सार्वजनिक रूप से आरोपी का नाम लेते हुए प्रदर्शन किया.

उस समय जब हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा तो हमने भी नेम एंड शेम का तरीका अपनाया.

बहराहल आज के समय में महिलाएं जो कर रही हैं वो बहुत अच्छा है इससे और महिलाओं को हिम्मत मिलेगी और महिलाओं का उत्पीड़न करने वाले कुछ करने से पहले कम से कम दो बार सोचेंगे.

मीटू आंदोलन में शामिल महिलाएं जिस जाति या वर्ग से आती हैं, कुछ लोग इसे एलीट वुमेन का आंदोलन भी बता रहे हैं?

वसुधा: एक तरह से देखा जाए तो इस आंदोलन मे वो औरतें सामने आई हैं जो उच्च वर्ग की हैं और ज़्यादातर सवर्ण जातियों से हैं लेकिन यह ‘एलीट वुमेन’ अपनी जाति और वर्ग के कारण यौन उत्पीड़न से मुक्त नहीं हो जातीं.
हमें समझना होगा कि समाज में किसी भी पद पर महिलाओं को हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न जैसी चीज़ों का सामना करना पड़ता है.

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाएं कार्यस्थल मे होने वाली यौन हिंसा और उत्पीड़न का मुद्दा उठा रही हैं. कार्यस्थल की समस्याएं बताते हुए उसे एक बेहतर जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.

मीटू आंदोलन की क्या सीमाएं हैं?

वसुधा: इस आंदोलन में अब तक यौन उत्पीड़न के बहुत सारे क़िस्से सामने आ चुके हैं. बहुत सारी महिलाओं ने यह बताया है कि उन पर क्या बीती है.

लेकिन आगे जब इन हादसों पर कार्रवाई की जाएगी तब भी इन औरतों को मदद और सही महिलाओं के सहारे की ज़रूरत होगी. आपको बता दूं कि व्यक्तिगत रूप से और एक संस्थान के तौर ऐसा सहारा देना आसान नहीं है और इस आंदोलन के सामने यह एक चुनौती है.

दूसरी बड़ी चुनौती है कि महिलाओं को ख़ुद अब इस समाज को आगे का रास्ता दिखाना होना. मीटू आंदोलन के चलते अलग-अलग क्षेत्रों में यौन उत्पीड़न के क़िस्से सामने आए हैं. इन क्षेत्रों में जिस तरीके का नियोक्ता-कर्मचारी संबंध है उसे भी समझना होगा.

जिन जगहों पर कर्मचारी पर्मानेंट है और जिन जगहों पर कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर हैं, उन दोनों में स्थिति और लड़ाई एक समान नहीं होगी. हमें इन अलग-अलग परिस्थितियों में यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं से निपटने के लिए एक व्यवस्था तैयार करनी होगी.