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‘आंबेडकर नगर’ में 15 साल बाद भी जनता की जुबान पर ‘महू’ कायम

दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बीआर आंबेडकर के सम्मान में जून 2003 में महू का नाम बदलकर ‘आंबेडकर नगर’ रखने का फैसला किया था.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: indiarailinfo.com)

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: indiarailinfo.com)

 

इंदौर: इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने के बाद देश में शहरों के नामों में तब्दीली को लेकर बहस तेज हो गई है. लेकिन क्या स्थानों के नाम में एकाएक सरकारी बदलाव को आम लोगों द्वारा आसानी से अपना लिया जाता है? इस सवाल के जवाब में एक मिसाल संविधान निर्माता डॉ. बीआर आंबेडकर की मध्यप्रदेश के इंदौर जिले स्थित जन्मस्थली महू की भी दी जा सकती है.

सैन्य छावनी के रूप में ऐतिहासिक पहचान की इसी साल दो सदी पूरी करने वाला यह कस्बा प्रदेश सरकार द्वारा नाम परिवर्तन के डेढ़ दशक बाद भी आम जन मानस में व्यावहारिक तौर पर ‘आंबेडकर नगर’ नहीं बन सका है.

दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ‘दलितों के मसीहा’ के सम्मान में जून 2003 में महू का नाम बदलकर ‘आंबेडकर नगर’ रखने का फैसला किया था. केंद्र की मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार एक और कदम बढ़ाते हुए महू रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘डॉ. आंबेडकर नगर रेलवे स्टेशन’ कर चुकी है.

बहरहाल, इंदौर से करीब 25 किलोमीटर दूर महू में दुकानों के साइन बोर्ड से लेकर लोगों के आम व्यवहार में इस कस्बे के परिवर्तित नाम यानी ‘आंबेडकर नगर‘ का प्रचलन अब भी बहुत कम दिखाई देता है.

डॉ. भीमराव आंबेडकर के पोते और पूर्व लोकसभा सांसद प्रकाश आंबेडकर ने कहा कि संविधान निर्माता की विरासत इतनी विशाल और मजबूत है कि उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि महू को ‘महू‘ ही कहा जाए या ‘आंबेडकर नगर’.

उन्होंने कहा, ‘महू ऐतिहासिक सैन्य छावनी के साथ बाबा साहब के जन्मस्थान के रूप में भी मशहूर है. लेकिन मेरी निजी राय में इस कस्बे को महू के पुराने नाम से ही पुकारा जाना चाहिए, क्योंकि इससे सैन्य इतिहास के साथ इसका जुड़ाव आगे भी बना रहेगा. वैसे भी जनता की जुबान पर महू का नाम चढ़ चुका है.’

देश में कथित रूप से राजनीतिक फायदे की नीयत से शहरों के नाम बदले जाने के सिलसिले पर असहमति जताते हुए आंबेडकर के पोते ने कहा, ‘किसी जगह का नाम भर बदल देने से उसका नया इतिहास नहीं बन जाता.’

‘डॉ. बीआर आंबेडकर ने सैन्य अफसर रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की संतान के रूप में 14 अप्रैल, 1891 को महू के काली पलटन इलाके में जन्म लिया था. इसी स्थान पर आंबेडकर का स्मारक बनाया गया है.

यह जानना दिलचस्प है कि ब्रितानी सैन्य छावनी के रूप में महू को बसाए जाने की नींव वर्ष 1818 में इंदौर रियासत के तत्कालीन होलकर शासकों और अंग्रेजों के बीच एक संधि से पड़ी थी. इस कस्बे का नाम दरअसल मिलेट्री हेडक्वार्टर्स ऑफ वॉर (एमएचओडब्ल्यू)था. साल 1947 में अंग्रेजी राज से भारत की आजादी के बाद भी महू के सैन्य छावनी के दर्जे को बरकरार रखा गया. इस कस्बे में भारतीय थलसेना के कुछ महत्वपूर्ण संस्थान हैं.

इस बीच, आंबेडकर के अनुयायी लगातार मांग कर रहे हैं कि सार्वजनिक व्यवहार में महू के स्थान पर ‘आंबेडकर नगर’ का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि यह परिवर्तित नाम संविधान निर्माता की गौरवशाली विरासत से सीधे जुड़ा है.

महू आंबेडकर जन्मस्थली पर बने स्मारक से जुड़ी डॉ. बाबा साहब आंबेडकर मेमोरियल सोसायटी के सचिव मोहनराव वाकोड़े ने कहा, ‘आंबेडकर नगर नाम हमारी अस्मिता से जुड़ा है. महू का नाम बदलवाने के लिए हमने वर्ष 2002 में हस्ताक्षर अभियान चलाते हुए एक लाख से ज्यादा लोगों को इस मुद्दे से जोड़ा था.’

आम बोलचाल में ‘आंबेडकर नगर’ के मुकाबले महू के ज्यादा इस्तेमाल के पीछे भाषा विज्ञान का एक सामान्य-सा फॉर्मूला भी जिम्मेदार है.

जैसा कि महू में जन्मे सामाजिक कार्यकर्ता दीपक विभाकर नाईक कहते हैं, ‘महू केवल दो अक्षरों का शब्द है और इसका उच्चारण आम लोगों को अपेक्षाकृत ज्यादा आसान लगता है.’

उन्होंने कहा कि महू की दो सदी पुरानी फौजी पहचान से स्थानीय लोगों का गहरा भावनात्मक जुड़ाव है. इसलिए कस्बे का पुराना नाम महू इन बाशिदों के दिल के बेहद नजदीक है.

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