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अजीत जोगी: पल-पल पाला बदलने वाला नेता

अजीत जोगी के हालिया फ़ैसले दिखाते हैं कि वे जल्दबाज़ी में हैं और किसी भी तरह सत्ता पाने की ललक रखते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें भाजपा से ही हाथ क्यों न मिलाना पड़े.

अजीत जोगी (फोटो: फेसबुक/अजीत जोगी)

अजीत जोगी (फोटो: फेसबुक/अजीत जोगी)

अजीत प्रमोद जोगी को कई शक्तिशाली और बुद्धिमान लोगों के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि नौकरशाह से राजनेता बने जोगी ने उनसे कुछ सीखा है.

कई बार श्रोता के तौर पर या बस पिछलग्गू के तौर पर ऐसे लोगों के साथ अनगिनत घंटे गुज़ारने वाले जोगी से यह उम्मीद की जाती है कि वे प्रणब मुखर्जी, अर्जुन सिंह, पीवी नरसिम्हा राव, पी. शिवशंकर और अहमद पटेल के प्रसिद्ध धैर्य और कौशल का थोड़ा-सा परिचय देंगे.

लेकिन हक़ीक़त यह है कि वे इसके ठीक उलट का प्रदर्शन करते हैं.

कलेक्टरी छोड़कर कांग्रेस में हुए थे शामिल

एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले तेज़तर्रार जोगी अपने समकालीनों को मात देने के लिए तेज़ घोड़े पर सवार रहे हैं. उनमें ख़ुद को सबसे अव्वल साबित करने की भूख थी और एक युवा सतनामी युवक के तौर पर पहले भारतीय पुलिस सेवा और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर उन्होंने पर्याप्त नाम भी कमाया.

जब वे इंदौर के कलेक्टर थे, तब उनकी छवि एक कठोर प्रशासक की बनी और ख़ुद राजीव गांधी का ध्यान उनकी तरफ गया. आख़िरकार उन्होंने 1986 में राज्यसभा में जाने के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र दे दिया.

यह वह वक़्त था, जब लोकसभा में भारी बहुमत होने के बावजूद राजीव गांधी कठिन विरोध का सामना कर रहे थे.

सुरेंद्र सिंह अहलूवालिया, सुरेश पचौरी, रत्नाकर पांडे, बाबा मिश्रा और बाकियों की ही तरह जोगी राजीव के (कु)ख्यात हो-हल्ला ब्रिगेड के सदस्य बन गए, जिसका काम वीपी सिंह और उनके साथियों पर खूंखार कुत्ते की तरह टूट पड़ना था.

मई, 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की सियासी भूल-भुलैया में कई वफादार पीछे रह गए.

राजीव गांधी के साथ अजीत जोगी (फोटो साभार: फेसबुक/अजीत जोगी)

राजीव गांधी के साथ अजीत जोगी (फोटो साभार: फेसबुक/अजीत जोगी)

इस सियासी भूल-भुलैया में एक तरह वैरागी सोनिया गांधी थीं, दूसरी तरफ पार्टी संगठन और प्रधानमंत्री कार्यालय पर अपनी पकड़ मज़बूत कर रहे चतुर नरसिम्हा राव थे, तीसरी तरफ राव के ख़िलाफ़ साज़िश रचने वाले अर्जुन सिंह, माखनलाल फोतेदार और विंसेंट जॉर्ज की तिकड़ी थी और साथ में थे कांग्रेस शासित राज्यों के भ्रमित मुख्यमंत्री और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य, जिनकी संख्या काफी थी.

1993 से 1996 के बीच का दौरान जोगी अपने पूरे रंग में थे. वे अपने दिन की शुरुआत विंसेंट जॉर्ज, अर्जुन सिंह और कई दूसरे नेताओं से मिलने से करते थे और यह सिलसिला पाइप पीने वाले प्रणब मुखर्जी की दरबार में समाप्त होता था, जिनके अंदर अर्जुन सिंह के प्रति और थोड़ी मात्रा में नरसिम्हा राव के प्रति अवमानना का भाव हमेशा दिखाई देता था.

पूर्व नौकरशाह जोगी ने एक की बात को दूसरे तक पहुंचाने की नारद वाली भूमिका निभाने या कांग्रेस के किसी ख़ास गुट के साथ जाने से ख़ुद को रोक कर रखा.

इसलिए जब उनके दोस्त असलम शेर ख़ान, दिलीप सिंह भूरिया, रंगराजन कुमार मंगलम और अन्य सूरजकुंड अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति के दौरान धरने पर बैठे तब जोगी ने हरियाणा पुलिस के हाथों किए जाने वाले बुरे बर्ताव से ख़ुद को बचा लिया.

हुआ यह था कि जब ‘गांधीवादी’ शेर ख़ान, भूरिया और अन्य ने पोडियम की तरफ बढ़ने की कोशिश की थी, जहां राव बैठे हुए थे, तब सेवा दल के कुछ स्वयंसेवकों ने उनको रोका.

कांग्रेस के भीतर यह कहानी इस तरह सुनाई जाती है कि वे दरअसल कांग्रेस सेवा दल स्वयंसेवकों की पोशाक में हरियाणा पुलिस के जवान थे. बिना लाठी के या भाईचारे वाले प्रेम के बिना, उन्होंने प्रदर्शन करने वालों पर काबू पाने के लिए उनके शरीर के निजी अंग को दबाया.

आख़िरकार जब अर्जुन सिंह ने इस्तीफा दे दिया और एनडी तिवारी के साथ तिवारी कांग्रेस का गठन किया, तब जोगी उनके साथ नहीं दिखाई दिए.

1995 तक जोगी ने राव के प्रधानमंत्री कार्यालय के एक कम चर्चित मंत्री भुवनेश चतुर्वेदी के साथ मित्रता गांठ ली थी. अहलूवालिया और असलम शेर ख़ान के विपरीत जोगी राव की सरकार में जूनियर मंत्री नहीं बन पाए थे, लेकिन वे 7 रेसकोर्स रोड आमदरफ़्त रखने वालों में शामिल हो गए और अन्यथा अल्पभाषी नरसिम्हा राव के दरबारी बन गए.

1996 में कांग्रेस की हार के बाद जोगी ने बिना वक़्त गंवाए पाला बदल लिया. वे प्रियरंजन दास मुंशी, पृथ्वीराज चह्वाण और अन्यों के साथ थे, जिन्होंने संसद में कांग्रेस पार्टी के नेता के पद से राव को बाहर का रास्ता दिखाया था.

जोगी अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के नए अध्यक्ष सीताराम केसरी के घर पर नियमित तौर पर देखा जा सकता था. केसरी अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह दोनों को ही नापसंद करते थे.

केसरी के लिए कांग्रेसी सिर्फ तीन तरह के थे- फॉरवर्ड, बैकवर्ड और हार-वर्ड (विदेशों में शिक्षा पाए वे कांग्रेसी, जिन्होंने कांग्रेस को हार की तरफ धकेला).

यह जोगी जैसे लोगों के लिए भी एक स्वर्णिम काल था और वे केसरी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के दरमियान गहरी खाई बनाने में क़ामयाब रहे.

हालांकि इससे पहले कि केसरी दिग्विजय सिंह को बाहर का रास्ता दिखा पाते और उनकी जगह सुभाष यादव को बैठा पाते, वे ख़ुद एआईसीसी के अध्यक्ष पद से हटाए जा चुके थे.

जोगी ने राजनीतिक शीर्षासन करने में थोड़ा भी वक़्त नहीं गंवाया और वी. जॉर्ज, एमएल फोतेदार और अन्यों के कैंप में चले गए.

ajit-jogi mayawati-alliance PTI

बसपा प्रमुख मायावती के साथ गठबंधन करने के बाद अजीत जोगी (फोटो: पीटीआई)

घटनाप्रधान मगर नीरस कार्यकाल  

नवंबर, 2000 में नियति उन पर तब मेहरबान हुई, जब एनडीए के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन नए राज्यों, झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के गठन का फैसला किया.

आज तक न तो लोकसभा और न ही कोई विधानसभा चुनाव जीतने वाले इस बिना जड़ वाले नेता के पास छत्तीसगढ़ के आधा दर्जन विधायकों का भी समर्थन नहीं था.

लेकिन उन्होंने अपनी दावेदारी आदिवासी राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश की, जबकि आदिवासी होने के उनका दावा विवादों में था और कोर्ट में इसको लेकर मामला चल रहा था.

सोनिया गांधी ने अपरिपक्वता का परिचय दिया. विद्याचरण शुक्ल के प्रति उनकी चिढ़ का कारण यह तथ्य था कि उन्होंने 1977 की हार के बाद इंदिरा गांधी को धोखा दिया था और राव के समय में उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री के तौर पर बोफोर्स के मसले को हवा दी थी.

उन्होंने इस बात का शायद ही एहसास था कि वर्षों बाद जोगी भी शुक्ला की राह पर चलेंगे. यह भी आरोप लगाया गया कि ईसाई धर्म से संबंध रखने वाले कई धार्मिक प्रमुखों ने उनकी पैरवी की थी.

हालांकि उस समय सोनिया गांधी और कांग्रेस ने दृढ़ता से इन आरोपों से इनकार किया था. एक नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी नियुक्ति दिलचस्प थी.

ऐसी चर्चा थी कि एआईसीसी के पर्यवेक्षक प्रभा राव और गुलाम नबी आज़ाद रायपुर में समय बिताने के लिए फिल्म ‘मिशन कश्मीर’ देखना चाहते थे. लेकिन इसकी जगह उन्हें शुक्ला और दिग्विजय सिंह के समर्थकों के बीच अचानक शुरू हो गए झगड़े से सामना करना पड़ा.

अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, अपने हाथ से उपजाऊ भूमि का बड़ा रकबा और खदानों के निकल जाने से चंद घंटे पहले ज़मीन पर गिरे हुए लात-घूंसे खा रहे थे.

शपथग्रहण के वक़्त राजधानी रायपुर एक डरावनी चुप्पी ओढ़े हुआ था, मानो स्थानीय शुक्ल के अपना देय पाने में नाकाम रहने का मातम मना रहा हो.

मुख्यमंत्री के तौर पर जोगी का कार्यकाल किसी भी तरह से प्रभावशाली नहीं था. एक तरफ तो कई उन्हें एक तानाशाह के तौर पर देखते थे, वहीं दूसरी तरफ वे एक नई राजधानी को भी तकसीम नहीं कर पाए, जिसकी घोषणा उन्होंने पूरे गाजे-बाजे के साथ की थी.

उन्हें खुली छूट दी गई थी. ऐसा लगता था कि सोनिया गांधी ने अपने आंख और कान बंद कर लिए थे. जोगी के बेटे का उभार संजय गांधी की तरह हुआ. शासन में उसकी तूती बोलती थी और वह संविधानेत्तर शक्ति केंद्र बन गया.

नवंबर, 2003 में जब उनके तीन साल के कार्यकाल की समाप्ति हुई और विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई, एक जबरदस्त आत्मविश्वास से भरे जोगी अपने ही पार्टियों के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ साज़िश रच रहे थे ताकि उन्हें किसी तरह से सिर्फ कामचलाऊ बहुमत ही मिले और इस तरह से ‘हाईकमान’(सोनिया गांधी) के पास उनकी जगह किसी और को मुख्यमंत्री के पद पर बैठाने का रास्ता न रहे.

लेकिन चुनाव परिणाम उनकी योजना के उलट आया. उन्होंने कथित तौर पर राज्यपाल को यह सूचित किया कि नवनिर्वाचित विधायकों का एक धड़ा उनके पाले में आने के लिए तैयार है.

औचित्य और नैतिकता के पाठ पढ़कर आए सेना के भूतपूर्व लेफ्टिनेंट जनरल रहे राज्यपाल ने अनौपचारिक तरीके से इसकी जानकारी 10, जनपथ को दी और जोगी को जनादेश को स्वीकार करने की सख़्त शब्दों में हिदायत दी गई.

परदे के पीछे तेज़ गति से की गई कार्रवाई ने सामान्य तौर पर अच्छे स्वभाव के वाजपेयी और सोनिया गांधी के बीच एक बड़े टकराव को टाल दिया.

एक हादसे में जोगी की गाड़ी एक पेड़ से टकरा गई लेकिन अस्पताल में महीनों और सालों गुज़ारने वाले जोगी में प्रासंगिक बने रहने का संकल्प कम नहीं हुआ.

कुछ अरुचिकर घटनाओं को लेकर सोनिया गांधी के मोहभंग और राहुल गांधी की उदासीनता ने वफादारी के मुखौटे को उतार दिया और जोगी रायपुर चले आए और कांग्रेस को सबक सिखाने की धमकी देने लगे.

लेकिन ऐसा करते हुए भी उनके परिवार ने कांग्रेस और बसपा के साथ संबंध बनाए रखा और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के साथ भी अनौपचारिक संबंध जोड़ कर रखा.  

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अगर इच्छाएं घोड़े की तरह होती हों, तो अजीत जोगी खुद को घुड़सवार की भूमिका देते. अब जबकि छत्तीसगढ़ में पहले चरण का चुनाव 12 नंवबर को है तो वह भूतपूर्व मुख्यमंत्री रायपुर में कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की उपलब्धि को दोहराने का मंसूबा पाल रहे हैं.

लेकिन, जनता दल (सेकुलर) के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के विपरीत जोगी कांग्रेस या भाजपा में से किसी से भी समर्थन लेने के लिए तैयार हैं.  

एक चुनावी सभा में बेटे अमित जोगी (बाएं) के साथ अजीत जोगी (फोटो साभार: फेसबुक/अजीत जोगी)

एक चुनावी सभा में बेटे अमित जोगी (बाएं) के साथ अजीत जोगी (फोटो साभार: फेसबुक/अजीत जोगी)

क्या जोगी बन सकते हैं किंगमेकर? 

2019 में किस्मत जोगी पर मेहरबान होगी, इसकी संभावना काफी कम है. लेकिन, एक नवंबर, 2000 की तरह 11 दिसंबर को जोगी के पास भले ज़्यादा विधायकों का समर्थन न हो, लेकिन अगर चुनाव नतीजे त्रिशंकु विधानसभा की ओर जाते हैं, तो जोगी अपनी किस्मत आज़माने में कोई क़सर बाकी नहीं रखेंगे.

कांग्रेस के ख़िलाफ़ उनकी संभावनाएं तभी पैदा होंगी, जब छत्तीसगढ़ चुनावों के नतीजे त्रिशंकु विधानसभा के तौर पर निकलें और उनके गठबंधन को 10 विधानसभा सीटों पर जीत मिले.

ऐसी स्थिति में वे कांग्रेस के साथ ज़बरदस्त सौदेबाज़ी करेंगे, जिसमें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावेदारी भी शामिल है. बसपा के साथ उनके गठबंधन के पीछे का मक़सद ख़ुद को ‘किंग मेकर’ की स्थिति में लाना और कांग्रेस का खेल ख़राब करना है.

मायावती भी 2019 के चुनाव के लिए एक कमज़ोर कांग्रेस चाहती हैं. महागठबंधन का विचार एक मृगमरीचिका है, क्योंकि बसपा और तृणमूल कांग्रेस जैसी ग़ैर-एनडीए पार्टियां छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को जीतते हुए नहीं देखना चाहतीं.

अगर भाजपा एक-दो सीटों से पीछे रह जाए तो वे भाजपा को समर्थन दे सकते हैं. अगर कांग्रेस या भाजपा में से किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है, तो सूबे की सियासत से ‘जोगी फैक्टर’ का अंत हो जाएगा.

चुनाव प्रचार जिस तरह से आगे बढ़ा है उसे और छत्तीसगढ़ के सियासी इतिहास को देखते हुए त्रिशंकु विधानसभा या 90 सदस्यों वाली विधानसभा में तीसरे मोर्चे को ठीक-ठाक सीटें मिलने की संभावना कम ही हैं.

जोगी की पकड़ पुख़्ता तौर पर सतनामी हरिजनों के बीच ही है, जो चार या पांच विधानसभा सीटों में सियासी महत्व रखते हैं.

बसपा और सीपीआई के साथ वे 10 सीटों की आस लगाए बैठे हैं, जिसकी संभावना कम है. छत्तीसगढ़ ही क्या जिस मध्य प्रदेश से टूटकर इसका निर्माण हुआ है, वहां भी गठबंधन की राजनीति का कोई इतिहास नहीं मिलता है.

फोटो साभार: फेसबुक/अजीत जोगी

फोटो साभार: फेसबुक/अजीत जोगी

2013 में कांग्रेस का मत प्रतिशत भाजपा से महज़ सात फीसदी कम था, जबकि यूपीए सरकार की हालत एकदम ख़स्ता थी और नरेंद्र मोदी उम्मीद का दूसरा नाम बनकर उभर रहे थे.

एक हालिया घटना अजीत जोगी की शख़्यियत की झलक देती है. कुछ महीने पहले जोगी ने ललकारते हुए राजनांदगांव से मुख्यमंत्री रमन सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने की घोषणा की थी.

लेकिन, उम्मीदवारी का पर्चा भरने का वक़्त नज़दीक आने पर जोगी ने सुर बदल लिया और यह घोषणा की कि वे विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे.

लेकिन यह बयान अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि उनके वफ़ादारों का एक हुजूम बस में भरकर मरवाही (कोरबा ज़िले की एक विधानसभा सीट) पहुंच गया. उन्होंने टीवी न्यूज़ चैनलों के सामने जोगी से हाथ जोड़कर मरवाही से नामांकन भरने का अनुरोध किया और उनसे उनका प्रचार करने देने की गुज़ारिश की.

एक तरह से लाचार होकर जोगी को लोकतांत्रिक भावनाओं का ख़्याल रखते हुए ‘लोगों की इच्छा’ को स्वीकार करते देखा गया. मुख्यमंत्री रमन सिंह से लोहा लेने का साहस कपूर की तरह उड़ गया.

राजनांदगांव से चुनाव लड़ने को लेकर जोगी ने जिस तरह से पलटी मारी है, उससे यह बात सामने आती है कि जोगी में राजनीतिक समझदारी नहीं आई है. वे जल्दबाज़ी में हैं और किसी भी तरह से सत्ता पाने की ललक रखते हैं, भले इसके लिए उन्हें भाजपा से ही हाथ क्यों न मिलाना पड़े.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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