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सीएनएन ट्रंप के सामने खड़ा हो सकता है, तो भारतीय मीडिया सत्ता से सवाल क्यों नहीं कर सकता?

भारत के ज़्यादातर पत्रकार आज़ाद नहीं हैं बल्कि मालिक के अंगूठे के नीचे दबे हैं. वह मालिक, जो राजनेताओं के सामने दंडवत रहता है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीएनएन संवाददाता जिम अकोस्टा को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश में ह्वाइट हाउस की इंटर्न. (फोटो: रॉयटर्स)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीएनएन संवाददाता जिम अकोस्टा को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश में ह्वाइट हाउस की इंटर्न. (फोटो: रॉयटर्स)

अपने वरिष्ठ संवाददाता जिम अकोस्टा के प्रेस पास निलंबित करने के फैसले को लेकर सीएनएन द्वारा व्हाइट हाउस के खिलाफ मुकदमा दायर करने के फैसले ने अमेरिका में भूचाल ला दिया है- और ज्यादातर अमेरिकी सीएनएन के समर्थन में निकल आए हैं.

भारत में ऐसा होने की संभावना कितनी है? 1975-77 के आपातकाल के दौरान जब इंदिरा गांधी ने सबके साथ प्रेस की भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया था, तब देश का मीडिया, लालकृष्ण आडवाणी के प्रसिद्ध शब्दों में रेंगने लगा, जबकि उसे सिर्फ झुकने के लिए कहा गया था.

2014 में वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और सागरिका घोष ने सीएनएन-आईबीएन (अब सीएनएन न्यूज 18) को तब अलविदा कह दिया जब प्रधानमंत्री के चहेते मुकेश अंबानी ने चैनल का अधिग्रहण कर लिया था.

मोदी कथित तौर पर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर उनसे पूछे गए असहज करनेवाले सवालों को लेकर नाखुश थे. उस समय प्रेस में किसी ने एक कतरा आंसू नहीं बहाया.

इंडिया टुडे टीवी पर करन थापर के शो को चैनल के प्रबंधन ने आगे नहीं बढ़ाया और यह बात सबको पता है कि करन थापर ने मोदी का इंटरव्यू लेते वक्त उन्हें नाराज़ कर दिया था.

कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य को सरकार पर सवाल खड़े करने वाले कार्टूनों को लेकर अनेक असहमतियों के बाद मेल टुडे द्वारा कह दिया गया कि अब उनकी जरूरत नहीं है. एक बार फिर किसी ने चूं तक नहीं कहा.

पुण्य प्रसून वाजपेयी और मिलिंद खांडेकर को राजनीतिक दबाव के कारण एबीपी द्वारा बर्खास्त कर दिया गया और क्षणिक हंगामे के बाद इसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया गया.

कई लोगों ने यह सवाल पूछा है कि आखिर भारतीय मीडिया सीएनएन की तरह साहस का परिचय क्यों नहीं देता है. इस पर मैं अपनी राय प्रकट करने का जोखिम उठा रहा हूं.

  1. भारत में जनमत अमेरिका या दूसरे विकसित देशों की तरह मजबूत नहीं है. यहां ज्यादातर लोग सत्ताधारियों के साथ टकराव मोल नहीं लेना चाहते हैं.

उदारहण के तौर पर जब इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल की घोषणा की थी (अपनी कुर्सी को बचाने के लिए, न कि इसलिए कि भारत में वास्तव में कोई आपातकालीन स्थिति थी) और सारे मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया था और मीडिया पर सख्त पहरेदारी बिछा दी थी, तब इसको लेकर शायद ही कोई विरोध हुआ था.

कई लोगों ने इसे किस्मत मानकर स्वीकार कर लिया और इसका एकमात्र अपवाद रामनाथ गोयनका और उनका इंडियन एक्सप्रेस समूह थे, जिन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी. अगर अमेरिका या यूरोप में ऐसी कोई चीज हुई होती, तो वहां बड़े पैमाने के आंदोलन हुए होते और इसका विरोध किया जाता.

  1. हालांकि तथ्य यह है कि पश्चिम की ही तरह भारत में भी मीडिया पर कारोबारियों का स्वामित्व है, लेकिन पश्चिमी कारोबारी सियासी नेताओं के सामने उतनी बार दंडवत नहीं होते हैं. बल्कि पश्चिम में नेतागण अक्सर कारोबारियों के सामने झुकते हैं.

इसके कई कारण हैं.

पहली बात, अगर भारत में कोई कारोबारी सत्ता में बैठे लोगों को नाराज कर देता है तो नेताओं द्वारा उन पर केंद्रीय जांच ब्यूरो, आयकर और कस्टम अधिकारियों या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को छोड़ दिया जाता है.

यह बात सर्वविदित है कि ये अधिकारी पिंजरे में बंद तोते हैं (जैसा तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था) और वे अपने राजनीतिक आकाओं का हुक्म बजाने के लिए तैयार रहते हैं भले ही इसके लिए उन्हें फर्जी सबूत ही क्यों न गढ़ने पड़ें.

दूसरी तरफ पश्चिमी देशों में, नौकरशाह कहीं ज्यादा पेशेवर हैं. मिसाल के लिए, अगर डोनाल्ड ट्रंप फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन या इंटरनल रिवेन्यू सर्विस को सीएनएन को परेशान करने का आदेश देते हैं, तो इस बात की संभावना काफी कम है कि वे उनके हुक्म का पालन करेंगे.

दूसरी बात, भारत में ज्यादातर मीडिया मालिक दूसरे कारोबारों में भी शामिल हैं और उनके अखबार या टीवी चैनल वास्तव में उनके दूसरे व्यवसायों को लाभ पहुंचाने या उनकी रक्षा करने का एक जरिया हो सकता है, जो ज्यादा मुनाफा देने वाले हैं.

तीसरी बात, ज्यादातर भारतीय पत्रकार अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता वाले हैं, भले भारत 1947 में आजाद हो गया हो. एक मंत्री या आईएएस अधिकारी के सामने वे एक हीनता ग्रंथि से भरे होते हैं, सिवाय उन स्थितियों के जब वे उसकी कमजोरी जानते हों. इसलिए उनमें शायद ही कभी विरोध करने का वैसा साहस होता है, जैसा सीएनएन ने दिखाया है.

  1. अमेरिका और यूरोप में, एंडरसन कूपर, बॉब वुडवार्ड, बार्बरा वाल्टर्स, क्रिस्टिएन एमेनपोअर, फरीद ज़करिया और अन्य, हालांकि हैं कर्मचारी ही, लेकिन वे आंख मूंदकर मीडिया घराने के मालिकों का हुक्म नहीं मानेंगे और मालिकों के साथ उनके साथ सम्मान के साथ पेश आना होता है.
  2. ऐसे पत्रकार मजबूत शख्सियत वाले हैं और उनके अपने नैतिक और पेशेवर मानक हैं, जिन्हें बनाए रखने के लिए वे अड़ जाते हैं.

इसलिए सीएनएन के मामले में, मेरा अनुमान है कि इसके मालिक टेड टर्नर ने जरूर ही ख्यातिनाम पत्रकारों से सलाह-मशविरा किया होगा, जिन्होंने उन्हें कहा होगा कि पूरे संगठन को जिम अकोस्टा के पीछे मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिए और फर्स्ट अमेंडमेंट (प्रेस की स्वतंत्रता) को बचाने के लिए लड़ना चाहिए.

भारत में कोई भी मीडिया मालिक, चाहे वह सबसे बड़ा ही क्यों न हो, ऐसा कुछ करने की हिम्मत नहीं करेगा. यहां ज्यादातर पत्रकार सच में आज़ाद नहीं हैं बल्कि मालिक के अंगूठे के नीचे हें वही मालिक, जो राजनीतिक नेताओं के सामने दंडवत रहता है.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं.)

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