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मध्य प्रदेश: क्यों राहुल गांधी चुनाव में पैराशूट उम्मीदवार न उतारने के अपने वादे से पलट गए?

विशेष रिपोर्ट: कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भोपाल में आयोजित कार्यकर्ता संवाद के दौरान कहा था कि विधानसभा चुनाव के ऐन समय पर दल बदलकर कांग्रेस में आने वाले नेताओं को पार्टी टिकट नहीं देगी लेकिन अब पार्टी ने दर्जनभर दलबदलुओं को अपना प्रत्याशी बनाया है.

एक रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया व अन्य (फोटो: पीटीआई)

एक रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया व अन्य (फोटो: पीटीआई)

दिल्ली के प्लेनरी सत्र में आपसे किए वादे को मैं फिर से दोहराना चाहता हूं  कि चुनाव के पहले एक नये मॉडल का कांग्रेसमैन पार्टी में आता है. विपक्ष का काम कांग्रेस कार्यकर्ता करता है. मीटिंग कांग्रेस का कार्यकर्ता करता है. लाठी कांग्रेस का कार्यकर्ता खाता है. पिटाई होती है तो कांग्रेस के कार्यकर्ता की होती है और फिर चुनाव के कुछ महीने पहले पार्टी में ऊपर से पैराशूट उतरते दिखाई देते हैं.

एक भाजपा से टपकता है, एक इधर से, एक उधर से. एक कहता है कि मैं पहले कांग्रेस में हुआ करता था, मैं 15 साल पहले कांग्रेस में था तो मैं 25 साल पहले कांग्रेस में था…. नहीं भैया नहीं. आज जो कांग्रेस में है, वो कांग्रेस में है और जो पैराशूट से टपकेगा, वो कांग्रेस पार्टी में खुशी से आ सकता है मगर चुनाव में टिकट टपकने वाले को नहीं मिलने वाला. आप आइये पांच-छह साल साथ काम कीजिए, लड़ाई लड़िए और फिर टिकट की बात होगी.

यह राहुल गांधी के 17 सितंबर को भोपाल के बीएचईल (भेल) दशहरा मैदान में कांग्रेस के कार्यकर्ता संवाद के दौरान दिए भाषण की अंश हैं.

अपने उस भाषण में राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया था कि कोई भी पार्टी के बाहर का नेता या कार्यकर्ता विधानसभा चुनावों के ऐन पहले कांग्रेस में शामिल होकर चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं पा सकेगा. उसे सालों तक पार्टी के साथ जमीन पर काम करना होगा, तभी वह पार्टी का टिकट पाने का हकदार होगा.

राहुल ने यह बात उस दिन पहली बार नहीं कही थी. वे लंबे समय से लगभग हर मंच से यह दोहराते आ रहे थे और इसके बाद भी वे ऐसा दोहराते रहे. राहुल के इन शब्दों ने न सिर्फ प्रदेश के पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरा था बल्कि दिन-ब-दिन दूषित होती राजनीति में उच्च मापदंड बनाए रखने की एक उम्मीद की किरण भी जगाई थी.

लेकिन, करीब डेढ़ महीने बाद जारी हुई मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावो की कांग्रेसी उम्मीदवारों की पहली ही सूची में राहुल की यह प्रतिबद्धता हवा हो गई.

सूची में कुछ नाम ऐसे थे जो कि चुनावों से ऐन वक्त पहले पार्टी में आये थे और चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट भी पा गये थे. मतलब कि कांग्रेस और कांग्रेस अध्यक्ष अपने वादे से मुकर गये.

राहुल की ही भाषा में कहें तो पैराशूट उम्मीदवारों के सहारे स्वयं वे और उनकी पार्टी मध्य प्रदेश में अपना सियासी वनवास खत्म करने की तैयारी कर चुकी है. कांग्रेस की पहली सूची से लेकर अंतिम सूची तक ऐसे पैराशूट उम्मीदवारों के नामों की भरमार रही.

सिंगरौली से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की उन रेणु शाह को टिकट दिया गया जो चुनावों से महज महीना भर पहले ही 22 अक्टूबर को कांग्रेस में शामिल हुई हैं. पिछला चुनाव वे बसपा के टिकट पर लड़ी थीं और बसपा के टिकट पर ही वह सिंगरौली की महापौर भी रह चुकी हैं.

इसी तरह सिहोरा सीट पर भाजपा से 15 अक्टूबर को कांग्रेस में आये खिलाड़ी सिंह आर्मो पर पार्टी ने दांव खेल लिया. 51 वर्षीय खिलाड़ी सिंह लंबे समय तक भाजपा से जुड़े रहे और विभिन्न पदों पर रहे लेकिन जब इस बार टिकट नहीं मिला तो कांग्रेस में आ गये.

घोषणा पत्र जारी करते कांग्रेस नेता (फोटो: पीटीआई)

घोषणा पत्र जारी करते कांग्रेस नेता (फोटो: पीटीआई)

विद्यावती पटेल 31 अक्टूबर को बसपा छोड़कर कांग्रेस में आईं और दो दिन बाद ही कांग्रेस ने उन्हें देवतालाब सीट से प्रत्याशी बना दिया.

विजयराघवगढ़ से कांग्रेस ने पद्मा शुक्ला को टिकट दे दिया जो कि 24 सितंबर तक भाजपा की शिवराज सरकार में दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री थीं. विजयराघवगढ़ से उन्हें टिकट न मिलता देख उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और टिकट भी पा लिया.

यही कहानी तेंदूखेड़ा विधायक संजय शर्मा के मामले में कांग्रेस ने दोहराई. भाजपा से अपना टिकट कटता देख संजय शर्मा 31 अक्टूबर को कांग्रेस में शामिल हुए और तेंदूखेड़ा से पार्टी प्रत्याशी बना दिए गए.

खास बात यह रही कि संजय शर्मा उन राहुल गांधी की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुए जो दो रोज पहले तक छाती ठोककर हर मंच से पार्टी में पैराशूट उम्मीदवारों का विरोध करते दिख रहे थे.

इसी साल 22 मार्च को पूर्व भाजपा विधायक अभय मिश्रा भी कांग्रेस में शामिल हुए थे. उनकी पत्नी नीलम मिश्रा सेमरिया से भाजपा विधायक हैं. कांग्रेस ने अभय मिश्रा को भी रीवा विधानसभा से चुनाव लड़ाने का फैसला किया है.

इसी तरह रहली सीट से भी छह माह पहले भाजपा से निष्काषित कमलेश साहू को कांग्रेस ने मैदान में उतारा है.

मनगवां सीट से बसपा से कांग्रेस में 28 सितंबर को आईं बबीता साकेत को टिकट दिया है. तो वहीं, मानपुर से तिलकराज सिंह को मैदान में उतारा है. भाजपा में कई पदों पर रहने वाले तिलकराज कुछ ही समय पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे.

जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) के हीरालाल अलावा को भी कांग्रेस ने मनावर से टिकट थमा दिया जबकि हीरालाल ने उस समय तक कांग्रेस की सदस्यता तक नहीं ली थी.

ऐसा ही एक नाम संजय सिंह मसानी का है. वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साले है. वे वारासिवनी से भाजपा से टिकट चाहते थे जो मिला नहीं तो कांग्रेस की उम्मीदवारों की सूची जारी होने के ठीक एक दिन पहले 2 नवंबर को कांग्रेस का दामन थाम लिया और टिकट भी पा लिया.

सरताज सिंह जो चार दशक तक भाजपा से जुड़े रहे, विधायक भी रहे, सांसद भी रहे और राज्य व केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे, उन्हें भाजपा ने विधानसभा टिकट देने से इनकार किया तो 8 नवंबर को वे दोपहर में कांग्रेस में शामिल हुए और शाम को होशंगाबाद से टिकट भी मिल गया.

इनके अतिरिक्त कुछ और भी नाम रहे जो कि पैराशूट उम्मीदवार की श्रेणी में आते हैं. हालांकि ये उम्मीदवार साल-दो साल पहले ही कांग्रेस में आ गये थे लेकिन इनको टिकट मिलने पर क्षेत्र में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच विरोध भी देखा गया है और राहुल ने जो अपने भाषण में पांच-छह साल तक पार्टी के लिए काम करने के बाद टिकट पाने का क्राइटेरिया बताया था, ये उस पर भी खरे नहीं उतरते हैं.

पूर्व बसपा विधायक मदन कुशवाह ग्वालियर ग्रामीण सीट से टिकट पाने में सफल रहे. जिसने क्षेत्र में बगावत को जन्म दिया और वर्षों से जमीन पर पार्टी की सेवा में लगे अन्य दावेदार बागी हो गये. नतीजतन कांग्रेस के एक दावेदार साहब सिंह गुर्जर ने बसपा का दामन थामकर चुनाव मैदान में कांग्रेस के खिलाफ ही ताल ठोक दी.

बैजनाथ कुशवाह भी समाजवादी पार्टी (सपा) और बसपा से होते हुए कांग्रेस में पहुंचे हैं और सबलगढ़ से प्रत्याशी बना दिए गए हैं.

बाबू जंडेल श्योपुर से प्रत्याशी हैं और वे तीन बार बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं, इस बार कांग्रेस ने उन्हें पूर्व विधायक बृजराज सिंह को किनारे करके टिकट थमा दिया. जिसका विरोध भी हुआ.

ये कुछ नाम रहे जो अलग-अलग दलों से ऐन वक्त पर कांग्रेस में शामिल होकर टिकट पाने में कामयाब रहे.

Rahul Gandhi in MP photo twitter INC

मध्य प्रदेश के बासोदा में राहुल गांधी (फोटो साभार: ट्विटर/@MahilaCongress)

हालांकि, पैराशूट उम्मीदवारों को चुनावों में उतारना कोई नई बात नहीं है. लगभग हर दल, हर चुनावों में ऐसा करता ही है.

भाजपा ने भी मध्य प्रदेश में कई पैराशूट उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. फिर चाहे बात विजयराघवगढ़ के संजय पाठक की हो या फिर पिछले चुनावों में निर्दलीय जीते तीनों विधायकों को टिकट देने की हो. लेकिन, जब किसी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वयं विभिन्न मंचों से घोषणा करे कि पार्टी पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट न देने के लिए प्रतिबद्ध है, तो इसके बड़े मायने होते हैं और कई सवाल भी उठते हैं.

जैसे कि कांग्रेस अध्यक्ष जिन पर अक्सर अपरिपक्व होने के आरोप लगते हैं, क्या वे वास्तव में वर्तमान राजनीति के लिहाज से अपरिपक्व हैं? क्या उनकी पैराशूट उम्मीदवार न उतारने की घोषणा महज एक जुमलेबाजी थी? क्या मोदी को जुमलेबाज कहते-कहते राहुल भी सत्ता की चाह में जुमलेबाजी पर उतर आये हैं?

सवाल राहुल गांधी की प्रतिबद्धता पर भी उठता है. जब वे मंच से कहते हैं कि उनके लिए पहले पायदान पर जनता, दूसरे पर कार्यकर्ता और तीसरे पर पार्टी नेता हैं तो जब वे अपने कार्यकर्ता को छल चुके हैं तो कैसे यकीन किया जाये कि वे जनता के मामले में ईमानदारी बरतेंगे?

या फिर अपनी ही पार्टी में उनके निर्णयों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है? या पार्टी के राज्य नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व में कोई आपसी तालमेल नहीं है?

अंतिम सवालों पर बात करें तो जब राहुल गांधी पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट न देने की प्रतिबद्धता जता रहे थे, उसी दौरान मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ मीडिया में कहते नजर आ रहे थे कि भाजपा के 30 विधायक कांग्रेस से टिकट पाने के लिए मेरे साथ संपर्क में हैं.

जब राहुल गांधी पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट देने से इनकार कर ही चुके थे तो कमलनाथ को तब यह कहने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए थी. इससे स्पष्ट था कि कांग्रेस अध्यक्ष कुछ सोचते हैं जबकि प्रदेश अध्यक्ष कुछ और.

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, ‘ऐसे मामलों में फैसले की एक प्रक्रिया होती है. जिसमें सभी लोग शामिल होते हैं जैसे कि प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, केंद्रीय चुनाव समिति और बाकी समिति के लोग मिलकर फैसला करते हैं. यह एक आदमी का निर्णय नहीं होता है. अकेला कांग्रेस अध्यक्ष अपनी मनमानी नहीं कर सकता है.’

यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर मानते हैं, ‘राहुल गांधी चुनावी राजनीति की वास्तविकता नहीं जानते. जो सुधार वो करना चाहते हैं, अभी उनकी पार्टी उसके लिए तैयार नहीं दिखती है. अगर उन्हें पैराशूट को टिकट नहीं देना था तो उसके लिए जो सेफगार्ड अपनाने थे वो नहीं अपनाए. आप कुछ ऐसी नीति ला सकते थे कि चुनाव के छह महीने पहले हम किसी को पार्टी में नहीं लेंगे तो फिर पैराशूट जैसा कोई होता ही नहीं. ऐसा कुछ भी प्रयास उन्होंने नहीं किया.’

वे आगे कहते हैं, ‘राजनीतिक दलों का आलम यह हो गया है कि उम्मीदवार तय करने के पैमाने की बात पर वे खुलेआम बोलते हैं कि विनिंग फैक्टर चाहिए, फिर चाहे व्यक्ति चोर-उचक्का कोई भी हो, जीतने वाले को हम टिकट देंगे. इस तरह तमाम राजनीतिक मूल्यों को सारे दलों ने किनारे कर दिया है. साथ ही राजनीतिक दलों को दूसरे दलों द्वारा नकारा गया आदमी जीतने योग्य लगता है, लेकिन अपनी ही पार्टी का पुराना नेता या कार्यकर्ता जो जमीन से जुड़ा हुआ है, उसकी जीतने की क्षमता पर शक होता है. इस व्यवस्था या सोच को बदले बिना पैराशूट उम्मीदवार से बचना संभव नहीं है. इस वास्तविकता को या तो राहुल समझते नहीं थे या फिर उसको अमल में लाने का उनके पास तरीका नहीं है.’

MP congress rally jabalpur photo twitter

जबलपुर में राहुल गांधी की रैली में कांग्रेस समर्थक (फोटो साभार: ट्विटर/कांग्रेस)

बहरहाल, रशीद मानते हैं कि ऐसी तमाम बातें कार्यकर्ताओं का उत्साह और मनोबल बढ़ाने के लिए की जाती हैं. प्रैक्टिकल रूप में ये सब संभव नहीं है.

लेकिन, अगर वास्तव में राहुल गांधी ने केवल कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के टूल के तौर पर पैराशूट उम्मीदवारी का विरोध किया था तो क्या उन्होंने अपना वादा तोड़कर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भविष्य के लिए यह नकारात्मक संदेश नहीं दे दिया कि उनकी कही बातों पर अमल हो ऐसा जरूरी नहीं.

भोपाल में रहने वाले राजनीतिक जानकार लोकेंद्र सिंह कहते हैं, ‘राजनीति में वैसे तो सब जायज है. लेकिन बड़े नेताओं को इस तरह की घोषणाओं से बचना चाहिए. वरना इससे कार्यकर्ता के मनोबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. आपने कार्यकर्ताओं के बीच कहा कि पैराशूट प्रत्याशी नहीं उतारेंगे, सिर्फ कार्यकर्ता को मौका मिलेगा तो कार्यकर्ता उत्साहित होता है. उसे लगता है कि अबकी बार हमें अवसर मिलेगा लेकिन जैसे ही उसे पता चलता है कि यह किसे मैदान में उतार दिया तो जो मनोबल आपके एक बयान से बढ़ा था, वह आप ही के निर्णय से बहुत नीचे चला जाता है और कहीं न कहीं पार्टी को ही नुकसान करता है.’

बात सही भी जान पड़ती है. इसका उदाहरण हमें ग्वालियर में देखने को मिला जहां पार्टी के एक 46 वर्ष पुराने कार्यकर्ता प्रेम सिंह कुशवाह, जिन्होंने संगठन में कई अहम पदों पर काम किया, ने टिकट न मिलने पर जहर खाकर जान देने की कोशिश की और कहा, ‘बसपा से आये मदन कुशवाह को पार्टी विधानसभा का टिकट दे देती है लेकिन मैंने अपनी सारी जिंदगी पार्टी के लिए जमीन पर लड़ते हुए बिता दी लेकिन मुझे उसका कोई ईनाम नहीं मिला.’

लोकेंद्र मामले में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘अमित शाह ने इस मामले में परिपक्वता दिखाई. उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से यह नहीं कहा कि किसको उतारेंगे और किसको नहीं. उन्होंने कहा कि इस बार पार्टी कार्यकर्ता ही भाजपा की ताकत है. हम कार्यकर्ताओं के दम पर चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि हम कार्यकर्ता को ही टिकट देंगे. तो इससे कार्यकर्ता को ताकत मिलती है कि हमारा महत्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बता रहे हैं. ये अंतर है राहुल और उनमें, राहुल को इसका ध्यान रखना चाहिए. मनोबल इस तरह न बढ़ाएं कि वह आगे जाकर भविष्य के लिए टूट जाये और उनका कार्यकर्ता ही उनकी बात को गंभीरता से न ले.’

हालांकि, मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता रवि सक्सेना बचाव में कहते हैं, ‘जीतना हमारा मकसद है. हमें लगता है कि ये जिताऊ उम्मीदवार है और कांग्रेस में आया है तो उसे हमने टिकट दिया है. अभय मिश्रा पहले कांग्रेस में रहे हैं, वापस अपने घर लौटे हैं. संजय शर्मा भी पहले कांग्रेस में एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के नेता थे. ये सब अपने घर वापस लौटे हैं. पैराशूट उम्मीदवारों की जो बात राहुल जी ने कही थी, उसमें कहा था कि ऐसे लोग जो नेताओं के आगे-पीछे चमचे बने घूमते हैं, उनको मैं टिकट नहीं दूंगा.’

जब उनसे पूछा गया कि एक कार्यकर्ता सालों पार्टी में खून-पसीना बहाता है और बाहर वाला जो पार्टी को गाली देता है अचानक से पार्टी में आकर टिकट ले जाता है तो इस पर उनका जबाव था, ‘कांग्रेस छोड़कर कई नेता गए, जैसे संजय पाठक की बात करें तो वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को चोर बोलते थे, उनके परिवार को चोर और खनन माफिया बताते थे. फिर उन्हीं की पार्टी में जाकर मंत्री बना लिए गए, चुनाव का टिकट दे दिया. तो ऐसा होता है कभी-कभी कि लोग जब दूसरे दल में होते हैं तो निश्चित रूप से आपके दल की बुराई करते हैं. लोकतंत्र क्या है, यही तो है.’

हालांकि, रवि का बचाव भी इस बात कि पुष्टि करता है कि पैराशूट उम्मीदवारों पर अपने यू टर्न का कांग्रेस के पास कोई जबाव नहीं है क्योंकि ‘घर वापसी’ की जो बात रवि ने की, राहुल गांधी अपने भाषण में पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि सालों बाद कांग्रेस में वापस आने का क्राइटेरिया भी किसी को टिकट नहीं दिला सकेगा.

बहरहाल, रशीद किदवई कहते हैं, ‘भाजपा की उत्तर प्रदेश सरकार में 100 से ऊपर लोग बसपा, सपा, कांग्रेस या अन्य तमाम राजनीतिक दलों से आये थे. वहां भाजपा का दांव चल गया और बड़ी कामयाबी मिली. तो अमित शाह या नरेंद्र मोदी के फैसले पर कोई प्रश्न नहीं उठा कि आपने बसपा या सपा वालों को मौका दे दिया और अब देखो कैसे सावित्री फुले भाजपा के खिलाफ अब बोल रही हैं. कहने का आशय है कि जीत सब छुपा लेती है और हार हर कमी उजागर कर देती है. कांग्रेस और राहुल के इस यू टर्न का फैसला भी जीत-हार के मायनों पर तय होगा. जीत हुई तो कोई कुछ नहीं कहेगा और हार होने पर आलोचना होनी ही है.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)