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विशाल भारद्वाज ने कहा, सेंसर बोर्ड बहरा है

लेखक एवं निर्देशक विशाल भारद्वाज ने कहा कि समाज में जो कुछ भी गलत होता है उसका दोष मढ़ने के लिए फिल्में आसान लक्ष्य हैं. सेंसर बोर्ड फिल्म निर्माताओं की चिंताओं पर ध्यान नहीं देता है.

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार विशाल भारद्वाज. (फोटो साभार: फेसबुक/विशाल भारद्वाज)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार विशाल भारद्वाज. (फोटो साभार: फेसबुक/विशाल भारद्वाज)

पणजी: लेखक एवं निर्देशक विशाल भारद्वाज ने शनिवार को कहा कि सेंसर बोर्ड फिल्म निर्माताओं की चिंताओं पर ध्यान नहीं देता है. भारद्वाज ने कहा कि समाज में जो कुछ भी गलत होता है उसका दोष मढ़ने के लिए फिल्में आसान लक्ष्य हैं.

डिजिटल माध्यम में सेंसरशिप की संभावना के बारे में पूछे जाने पर भारद्वाज ने कहा, ‘क्या उन्होंने दृश्यों पर ‘नो स्मोकिंग’ टिकर लगाने से पहले हमारा पक्ष सुना था? क्या वे अब भी हमारी बात सुनते हैं? वे (सेंसर बोर्ड) हमारी बात नहीं सुनते. वे जो चाहते हैं वह करते हैं. पूरे विश्व में हम एकमात्र देश हैं जहां किसी दृश्य पर ‘नो स्मोकिंग’ टिकर चलते हैं. इससे अधिक हास्यास्पद क्या हो सकता है?’

उन्होंने कहा कि वेब माध्यम किसी भी निर्देशक को ऐसी चीजों में पड़ने की स्वतंत्रता देता है, जो कि फिल्मों में करना मुश्किल हो रहा है.

उन्होंने कहा, ‘आप सीरीज में कई चीजें कर सकते हैं और वहां कोई सेंसर नहीं होता. पशु कल्याण बोर्ड, ये गले की फांस है. जिस तरह की चीजें वे आप पर थोपते हैं. फिल्मों को आसानी से निशाना बनाया जाता है. यदि किसी को कुछ भी हो, फिल्म को निशाना बनाइए. जैसे समाज में जो कुछ भी बुरा है उसके लिए फिल्में जिम्मेदार हैं.’

भारद्वाज एनडीएफसी के ‘फिल्म बाजार नॉलेज सीरीज सेशन स्टोरीटेलर्स फर्स्ट.. डायरेक्टर्स एंड प्रोड्यूसर्स हू चेंज्ड द गेम’ में बोल रहे थे.

भारद्वाज ने कहा कि वे जल्द ही डिजिटल माध्यम के लिए कोई प्रोजेक्ट बनाएंगे. उन्होंने कहा कि वे ऐसी चीजें तलाश रहे हैं जिसे वेब सीरीज के फॉरमेट में दिखाया जा सके.

उन्होंने आगे कहा, ‘ये निर्देशकों के लिए रचनात्मक आजादी है. मुझे सिनेमा से प्यार है. ये वेब सीरीज कई सारी मौलिक चीजें दिखाती हैं. फिल्मों में संपादन के दौरान हमें कई सारी चीजें हटानी पड़ती है. फिल्मों में छोटे कैरेक्टर पर ध्यान नहीं दिया जाता. वेब सीरीज में ये सारी चीजें करने की आजादी होती है.’

कार्यक्रम में फिल्मकार रमेश सिप्पी और अभिषेक चौबे भी मौजूद थे. चौबे ने कहा कि देश की सत्ता में जो लोग हैं वो सिनेमा या कला को गंभीरता से नहीं लेते हैं. वे सोचते हैं कि हम नाचने-गाने वाले लोग हैं. वे हमारे काम को इसी तरह से देखते हैं. वे सिनेमा को एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में नहीं देखते हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)