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भोपाल गैस कांड और उसके लाखों पीड़ित मध्य प्रदेश में चुनावी मुद्दा क्यों नहीं हैं?

ग्राउंड रिपोर्ट: भोपाल में यूनियन कार्बाइड का कचरा भूजल के रास्ते शहर की ज़मीन में ज़हर घोल रहा है. लाखों लोगों की ज़िंदगी दांव पर लगी है लेकिन प्रदेश की राजनीति में मुख्य मुक़ाबले में रहने वाले दोनों दल- भाजपा और कांग्रेस ने गैस पीड़ितों को लेकर चुप्पी साध रखी है.

उचित मुआवज़े की मांग को लेकर भोपाल गैस कांड के पीड़ित मुहिम चला रहे हैं कि जो मुआवज़ा देने का आश्वासन शपथ पत्र देगा वही हमारा वोट लेगा.

उचित मुआवज़े की मांग को लेकर भोपाल गैस कांड के पीड़ित मुहिम चला रहे हैं कि जो मुआवज़ा देने का आश्वासन शपथ पत्र देगा वही हमारा वोट लेगा.

दिसंबर 2, 2018 को भोपाल गैस कांड को 34 वर्ष पूरे हो जाएंगे. यह विश्व की एक ऐसी औद्योगिक त्रासदी है जहां हजारों लोगों की जान गई है, लाखों लोग पीड़ित हुए हैं, पीड़ितों की पीढ़ियां उस गैस के अनुवांशिक प्रभावों को अब तक झेल रही हैं, जो उस त्रासदी में जीवित बचे या तो विकलांग होकर जी रहे हैं या फिर रोज नई बीमारियों से दर्द का घूंट पी रहे हैं, नई पीढ़ियां भी विकलांग पैदा हो रही हैं, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है.

जहां सरकारें आज किसी घटना में किसी नागरिक की मौत पर गाहे-बगाहे करोड़ों के मुआवजे की घोषणा कर देती हैं. वहीं, 34 सालों से मिथाइल आइसोसायनेट (एमआईसी) का प्रकोप झेल रही भोपाल गैस कांड की पीड़ित जनता को केवल 25 से 50 हजार रुपये तक का ही अब तक मुआवजा मिला है. उसमें भी मुआवजा राशि 25 हजार रुपये ही है, शेष 25 हजार रुपये मुआवजे के ब्याज के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पीड़ितों को मिले थे.

पीड़ितों के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल बनाए तो गए लेकिन वहां इलाज करने डॉक्टर ही नहीं हैं. गैस कांड की जिम्मेदार रसायन कंपनी यूनियन कार्बाइड (यूका) का रासायनिक कचरा फैक्ट्री परिसर में पड़ा है जो वातावरण को दूषित कर रहा है.

फैक्ट्री परिसर के समीप ही यूका द्वारा सोलर इवैपोरेशन पॉन्ड (सैप) में गाढ़ा गया रासायनिक कचरा भूजल में मिलकर जमीन के अंदर जहर घोल रहा है. 42 बस्तियां इसकी चपेट में आ गई हैं. लाखों जीवन खतरे में हैं और भूजल की वह नदी अंदर ही अंदर अपना दायरा बढ़ाती जा रही है.

पहले ऐसी 22 बस्तियां थीं जहां का भूजल जहरीला था, लेकिन पिछले दिनों आई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) की 20 अन्य बस्तियों पर रिपोर्ट में 15 बस्तियां और जहरीले भूजल की चपेट में पाई गईं जबकि अन्य पांच बस्तियों का पानी भी उपयोग योग्य नहीं माना गया.

अगर ऐसा ही रही तो आगे यह संख्या और बढ़ेगी, 50 होगी, फिर 100 भी होगी. इस सबके बावजूद लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर लगी है फिर भी यह कांग्रेस, भाजपा और अन्य सभी राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मुद्दा नहीं है.

इसकी बानगी इससे भी मिलती है कि प्रदेश की राजनीति में मुख्य मुकाबले में रहने वाले दोनों राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस ने गैस पीड़ितों के संबंध में कोई खास घोषणा नहीं की है.

वैसे कांग्रेस ने अपने ‘वचन पत्र’ में दो बिंदुओं का जिक्र किया है. लेकिन भाजपा के दृष्टि पत्र में तो कहीं कोई भी जिक्र नहीं है. ऐसा तब है जब गैस राहत मंत्री विश्वास सारंग स्वयं उस नरेला क्षेत्र से आते हैं जहां कि एक बड़ी आबादी गैस पीड़ित मानी जाती है.

Pictures of residents who died in the 1984 disaster are seen at the forensic department of a hospital in Bhopal Danish Siddiqui/Reuters

भोपाल के एक अस्पताल में गैस त्रासदी से मारे गए लोगों की तस्वीर. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

इसलिए लगता है कि भाजपा की नजर में पूरी तरह से गैस पीड़ितों का पुनर्वास हो चुका है, उनकी समस्याओं का समाधान हो चुका है. उन्हें सही इलाज मिल रहा है.

लेकिन फिर सवाल उठता है कि अगर ऐसा है तो प्रदेश सरकार का गैस राहत विभाग किनके लिए चल रहा है? गैस राहत मंत्रालय किन्हें राहत पहुंचा रहा है? गैस राहत अस्पतालों में किनका इलाज हो रहा है? गैस राहत मंत्री किसके लिए काम कर रहे हैं?

भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल तो ऐसा ही मानते हैं कि गैस पीड़ितों से संबंधित सभी समस्याओं का समाधान हो चुका है. जब उनसे पूछा गया कि भाजपा ने क्यों अपने ‘दृष्टि-पत्र’ में गैस पीड़ितों की जगह नहीं दी है तो वे कहते हैं, ‘गैस पीड़ितों के लिए मुआवजा, बुनियादी सुविधाएं और रोजगार की व्यवस्था हम कर चुके हैं.’

ऐसा कहकर वे फोन काट देते हैं.

लेकिन आंकड़े और तथ्य तो कुछ और ही कहते हैं. हादसे की जिम्मेदार यूनियन कार्बाइन 16 दिसंबर 1974 को तैयार सेफ्टी रिपोर्ट में उल्लेख है, ‘मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) एक ऐसा जहर है जिसका पूरी तरह से इलाज भी करा लिया जाए तब भी यह बड़ी अवशिष्ट चोटें शरीर में छोड़ देता है.’

अत: एमआईसी के जख्म उन अवशिष्ट चोटों के रूप में अब तक ज़िंदा हैं और पीड़ितों की आखिरी सांस तक रहेंगे. हादसे के बाद पैदा हुई उनकी नई पीढ़ी भी इसकी चपेट में है और कोई नहीं जानता कि आगे और कितनी पीढ़ियां उस हादसे की भेंट चढ़ेंगी?


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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ सोशल वर्क के छात्र रहे प्रतीक शर्मा लामिचन्ने द्वारा वर्ष 2014 में तैयार रिसर्च रिपोर्ट ‘परसीव्ड नीड्स ऑफ द गैस अफेक्टेड पर्सन्स विद रिफरेंस टू पीपल लिविंग इन जय प्रकाश नगर’ बताती है कि सर्वे में शामिल जेपी नगर के सभी लोगों में किसी न किसी प्रकार की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या पाई गई.

वहीं महिलाओं में असमय माहवारी और अत्यधिक रक्तस्राव की समस्या भी व्याप्त है. नवजातों और हादसे के बाद जन्म लेने वालों में शारीरिक और मानसिक वृद्धि में रुकावट की बात सामने आई है.

रिसर्च में यह भी सामने आया था कि इन बीमारियों ने पीड़ितों की रोज़गार क्षमता को भी प्रभावित किया है. नियमित अस्पताल जाने के चलते वे काम पर ध्यान नहीं दे पाते इसलिए उन्हें कंपनी/कारखानों में काम पर नहीं रखा जाता.

जेपी नगर में रहने वाले गैस पीड़ित विजय बताते हैं, ‘जो गैस कांड के प्रत्यक्ष भोगी रहे, यहां वो खांस-खांसकर जी रहे हैं. खांसी, सीने में दर्द, आंखों में जलन, हाथ-पैर में दर्द, हमारे लिए आम हो गए हैं. सांस लेने में भी सबको दिक्कत होती है. चलने पर सांस फूलती है. ज़्यादा मेहनत का काम नहीं कर सकते, थकान हो जाती है. इसलिए रोजगार एक चुनौती है.’

रिसर्च यह भी बताती है कि सांस फूलने के चलते 85 प्रतिशत पीड़ित एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में भी दिक्कत महसूस करते हैं. इसलिए अधिकांश गैस पीड़ित आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. वे या तो भूख से मर रहे हैं या फिर क़र्ज़ में डूब रहे हैं. अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं.

तो वहीं, 1984 में हुए उस हादसे से पहले तक यूनियन कार्बाइड द्वारा संयंत्र में निकलने वाले ज़हरीले रासायनिक कचरे को संयंत्र परिसर के समीप ही बनाए गए सैप में डंप कर दिया जाता था. इस तरह 10 हज़ार मीट्रिक टन कचरा इन तालाबों में डाल दिया गया.

भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड का कारखाना (फोटो: रॉयटर्स)

भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड का कारखाना (फोटो: रॉयटर्स)

लेकिन ये तालाब तकनीकी रूप से असुरक्षित थे. रसायन वहां से लीक होते थे. उसी कचरे के चलते यूनियन कार्बाइड के आसपास का कुछ किलोमीटर क्षेत्र का भूजल प्रदूषित हो गया है. इसमें डायक्लोरोबेंजीन, पॉलीन्यूक्लियर एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन्स, मरकरी जैसे लगभग 20 रसायन हैं जो फेफड़े, लीवर, किडनी के लिए बहुत ही घातक होते हैं और कैंसर के कारक रसायन माने जाते हैं.’

इस संदर्भ में 1989 से अब तक 16 परीक्षण विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा किए जा चुके हैं.

वहीं, यूनियन कार्बाइड में पड़े जहरीले कचरे का भी अभी तक निस्तारण नहीं हुआ है. इसका नतीजा यह है कि 22 बस्तियां का भूजल तो पहले से ही दूषित हो गया था. पिछले दिनों आईआईटीआर ने नई 20 बस्तियों से पानी के नमूनों की जांच की तो 15 और बस्तियां इसमें शामिल हो गईं.

इस तरह कुल 37 बस्तियों का भूजल उपयोग योग्य नहीं रहा है.

इससे पहले तक प्रभावित रहीं 22 बस्तियों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नगर निगम द्वारा पाइपलाइन से पानी की सप्लाई की जाती है.

लेकिन, सतीनाथ के अनुसार, जब पिछले दिनों प्रभावित 42 बस्तियों के पानी की भी जांच की गई तो 70 फीसद नमूने सीवेज वाटर युक्त पाये गये जिनमें फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया तय मानकों से 2400 गुना अधिक पाया गया.

इसलिए प्रश्न उठता है कि किस रोजगार, पुनर्वास और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात भाजपा कर रही है? जिनकी आगे की पीढ़ियां तक इस गैस का प्रभाव भोगने जा रही हैं, उन्हें 50 हजार का मुआवजा पर्याप्त है? बिना डॉक्टरों के अस्पताल में संभव है? क्या यह हैं बुनियादी सुविधाएं?

एक 55 वर्षीय गैस पीड़िता कुसुम जो कार्बाइड फैक्ट्री के पास ही रहती हैं, बताती हैं कि उनकी किडनी खराब हुई है और सरकार ने घोषणा के मुताबिक अब तक कोई अनुग्रह या सहायता राशि नहीं दी है.

फैक्ट्री के सामने स्थिति जेपी नगर, जो गैस कांड की उस भयावह रात का सबसे बड़ा गवाह बना है, वहां रहने वाली 45 वर्षीय शहजादी बताती हैं कि हमें 25-25 हजार रुपये की दो किश्तों में अब तक महज कुल 50 हजार रुपये का ही मुआवजा मिला है जबकि सरकार ने 5 लाख रुपये देने का वादा किया था.

हालांकि, कांग्रेस ने अपने ‘वचन पत्र’ में बिंदु 19.43 और 19.44 पर जरूर गैस पीड़ितों का जिक्र किया है. उसने यह बिंदु लोक स्वास्थ्य संबंधी अपनी घोषणाओं में लिखे हैं.

बिंदु 19.43 कहता है, ‘गैस राहत अस्पतालों को लोक स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत जिला चिकित्सालय/सामुदायिक चिकित्सालय स्तर का दर्जा देने के लिए उनका उन्नयन करेंगे.’

वहीं, बिंदु 19.44 में दर्ज है, ‘गैस पीड़ित परिवारों के पुनर्वास की समीक्षा करेंगे.’

कांग्रेस द्वारा की गई घोषणाओं से भी स्पष्ट नहीं होता कि वे वास्तव में गैस राहत पीड़ितों के लिए क्या करना चाहते हैं? वे गैस पीड़ित परिवारों के पुनर्वास की समीक्षा करेंगे तो किन बिंदुओं पर करेंगे, किस पद्धति पर करेंगे? क्या उसमें मुआवजे, दूषित जल क्षेत्र में स्वच्छ पानी की सप्लाई, रोजगार आदि बिंदुओं पर भी बात होगी या नहीं?

पुनर्वास की समीक्षा की बात कांग्रेस ने लोक स्वास्थ्य नामक बिंदु में की है, इसलिए संशय की स्थिति है कि समीक्षा होगी भी तो बस शायद स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की हो. लेकिन, वर्तमान में गैस पीड़ितों के सामने स्वास्थ्य के इतर भी अनेक समस्याएं हैं.

गैस पीड़ितों के मुताबिक उस गैस कांड का शिकार बने वे और उनकी नई नस्लें भी फेफड़े संबंधी बीमारियों से जूझ रही हैं. वे अधिक मेहनत का काम नहीं कर सकते हैं. जिसके चलते उनके सामने रोजगार का भी संकट है. इसलिए अमूमन हर परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ी हुई है.

भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया स्मारक. फाइल (फोटो साभार: विकिपीडिया कॉमन्स)

भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया स्मारक. फाइल (फोटो साभार: विकिपीडिया कॉमन्स)

पर्याप्त मुआवजा पाने के लिए भी वो लंबे समय से संघर्षरत हैं और वर्तमान विधानसभा चुनावों में एक कैंपेन भी वे चला रहे हैं कि जो भी उम्मीदवार उनसे वोट मांगने जाता है वे उससे लिखित में आश्वासन मांग रहे हैं कि पार्टी के सरकार बनाने बाद उनकी उचित मुआवजे की मांग पूरी की जायेगी.

तो पुनर्वास की समीक्षा का क्या प्रारूप होगा? इस पर कांग्रेस प्रवक्ता रवि सक्सेना से जब हमने बात की तो उनका कहना था, ‘पुनर्वास की समीक्षा केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं रहेगी. उनके लिए एक कॉलोनी बनाने की बात थी. उनको सैनिटेशन की बहुत दिक्कत है, सांस की बड़ी बीमारियां हैं. उनके पूर्ण पुनर्वास की एक योजना थी जो आज भी भाजपा की सरकार आने के बाद अधूरी है. अधूरी क्या कहें, वास्तव में उसमें कुछ हुआ ही नहीं है.’

वे आगे कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कई बार वहां जाकर घोषणा की कि हम मकान दे देंगे, यह दे देंगे, लेकिन कुछ हुआ नहीं है. इसलिए हम उसकी फिर से समीक्षा करेंगे और जहां-जहां इन्होंने जो वादे किए थे या नये सिरे से जो हम कर सकते हैं, उनके पुनर्वास के लिए वो करेंगे.’

पुनर्वास के तहत रोजगार प्रदान करने के मसले पर वे कहते हैं, ‘रोजगार के लिए तो हमने पहले से ही जब हमारी सरकार थी, तो काफी सेंटर हमने खोले थे. सिलाई सेंटर खोले थे, बुनाई सेंटर खोले थे, इस तरह के काफी हमने काम किए थे. ताकि ऐसे महिला-पुरुष जो ज्यादा मेहनत का काम नहीं कर सकते, वे वहां पर काम कर सकें. लेकिन शिवराज सरकार ने वो सारे बंद कर दिए. वे उजाड़ पड़े हैं, वहां पर कोई काम हो नहीं रहा है. पीड़ितों को कोई काम मिल नहीं रहा है, उन सेंटर को हम फिर से चालू करेंगे, रोजगार पैदा करेंगे और वहां पर उनके लिए रोजगार के साधन उपलब्ध कराएंगे.’


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संभावना ट्रस्ट से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सतीनाथ षड़ंगी जो इलाके में गैस पीड़ितों के नि:शुल्क इलाज के लिए संभावना क्लीनिक भी चलाते हैं और बीते तीन दशक से गैस पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, वे रवि की इस बात की पुष्टि करते हैं कि कांग्रेस द्वारा रोजगार के ऐसे सेंटर खोले गये थे.

वे कहते हैं, ‘कांग्रेस के कार्यकाल में ऐसे कई सेंटर खुले थे जो पीड़ितों को रोजगार दिला रहे थे लेकिन भाजपा की सरकार ने उन पर ताला जड़ दिया और करीब 2400 महिलाओं को बेरोजगार कर दिया था.’

वहीं, बिंदु 19.43 में की गई घोषणा पर रवि का कहना है, ‘गैस पीड़ितों के लिए जितनी भी डिस्पेंसरी बनी थीं, तो उनमें सामग्री गैस राहत फंड के तहत ही आती थी. उसी से ही सभी सुविधाएं जुटाई जाती थीं और अब वो फंड कम हो गया है इसलिए न तो अब वहां पर दवाई हैं, न समुचित डॉक्टर हैं, न वहां पर जो सुपर स्पेशलिटीज होती हैं वो हैं. ये सारी सुविधाएं अस्पतालों में नहीं हैं और गैस पीड़ित अभी भी पीड़ित हैं. इसलिए हमने कहा कि जो हमारे जिला अस्पताल हैं या अन्य बड़े अस्पताल हैं, उनके साथ गैस राहत अस्पतालों को जोड़ देंगे तो उनकी हालत में सुधार होगा क्योंकि वहां से मरीजों को जिला अस्पतालों में रैफर किया जा सकेगा और साथ ही गैस राहत अस्पतालों में भी हम जिला चिकित्सालयों की तर्ज पर सुविधाएं बढ़ा देंगे.’

भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में गैस त्रासदी में मारे गए लोगों के लिए बना स्मारक. (फोटो: दीपक गोस्वामी)

भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में गैस त्रासदी में मारे गए लोगों के लिए बना स्मारक. (फोटो: दीपक गोस्वामी)

वे आगे कहते हैं, ‘अब तक भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) में ही गैस पीड़ितों को गंभीर बीमारी होने की स्थिति में रेफर किया जाता था, लेकिन उसकी स्थिति बहुत खराब है, तो उस अस्पताल का भी हमें स्तर सुधारना होगा.’

हालांकि, सतीनाथ कहते हैं कि फंड की कोई समस्या नहीं है. जितना फंड मांगा जाता है उतना पूरा का पूरा आता है.

साथ ही वे कहते हैं, ‘गैस राहत अस्पतालों को जिला अस्पतालों से जोड़ना वास्तव में गैस पीड़ितों को नुकसान ही पहुंचाएगा. क्योंकि अगर कोई अस्पताल गैस पीड़ितों को केंद्रित करके बनाया गया है, तो उसकी व्यवस्था खासतौर पर गैस पीड़ितों के शरीर के जो सिस्टम प्रभावित हुए हैं, उसी के आधार पर होगी. उसी के विशेषज्ञ डॉक्टर होंगे, संबंधित मशीनें होंगी और ऐसी व्यवस्था अभी भी मौजूद है. लेकिन अगर इन्हें सामान्य अस्पताल सो जोड़ेंगे तो सामान्य लोगों के डॉक्टर ही वहां होंगे. जिससे गैस पीड़ितों की तकलीफों पर से ध्यान पूरा हट जायेगा.’

वे आगे कहते हैं, ‘यह दिखाता है कि राजनीतिक दलों का इस समस्या पर जो अध्ययन होना चाहिए, वो है ही नहीं.’

बहरहाल, भले ही राजनीतिक दलों के लिए गैस राहत पीड़ितों को राहत पहुंचाना कोई मुद्दा न हो. लेकिन, अपने हक की मांग कर रहे पीड़ितों को वे आवाज भी नहीं उठाने देना चाहते हैं. पीड़ितों द्वारा चुनावों में जन प्रतिनिधियों से लिखित आश्वासन मांगने पर उनकी मुहिम को थामने के लिए उनके नेतृत्वकर्ता सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.

बकौल सतीनाथ नरेला विधानसभा क्षेत्र के रिटर्निंग ऑफिसर मुकुल गुप्ता ने पीड़ितों की इस मुहिम पर रोक लगा दी है.

वे बताते हैं, ‘जब इस बारे में पूछा गया कि ऐसा क्यों? तो बताया गया कि हमने गैस राहत मंत्री विश्वास सारंग के पीड़ितों के लिए आए 75 करोड़ रुपये के घोटाले पर जो प्रेस कांफ्रेंस की थी, उसके कारण 188 के तहत आप पर दर्ज हुई एफआईआर के चलते ऐसा निर्णय लिया गया है.’

वहीं, सतीनाथ के अनुसार, भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा उन पर इस मुहिम को बंद करवाने के लिए 23 नवंबर को हमला भी किया गया है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

Categories: भारत, राजनीति, विशेष

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