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‘शिवराज सरकार उन पुलिसवालों को बचा रही है, जिनकी गोली से किसानों की जान गई’

साक्षात्कार: मध्य प्रदेश में किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं. बीते साल हुआ मंदसौर गोलीकांड इसका गवाह है. राज्य में किसान आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, बावजूद इसके प्रदेश में किसानों के मुद्दों पर राजनीतिक दलों ने कोई ख़ास बात नहीं की. किसानों और कृषि के मुद्दों पर राज्य में लंबे समय से काम कर रहे किसान नेता और राष्ट्रीय किसान मज़दूर महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा (कक्का जी) से दीपक गोस्वामी की बातचीत.

Shiv Kumar Sharma Kakka Ji FB

किसान नेता शिवकुमार शर्मा उर्फ़ कक्काजी (फोटो साभार: फेसबुक/राष्ट्रीय किसान मज़दूर महासंघ)

आपके अनुसार विधानसभा चुनाव से पहले कृषि मुद्दों को जैसी तवज्जो मिलनी चाहिए थी, क्या वैसी तवज्जो मिली?

जिस हिसाब से ये मुद्दे उछलने चाहिए थे, उस हिसाब से नहीं उछले हैं क्योंकि अब जो मीडिया का जमाना है उसमें उनका मैनेजमेंट बहुत तगड़ा है.

जो पार्टी सत्ता में होती है वो मीडिया को इस प्रकार से मैनेज करती है कि राजनीतिक लोगों का किसानों के मुद्दों से ध्यान भटकता जाता है और वे आपस की तू-तू, मैं-मैं लग जाते हैं. व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में खो जाते हैं. तो ऐसे में जो मूल मुद्दे हैं वो छूट जाते हैं.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के घोषणा-पत्र में खेती-किसानी से संबंधित काफी घोषणाएं की गई हैं, क्या वे किसानों को फायदा पहुंचाती दिखती हैं?

देखिए भाजपा ने तो किसानों के लिए जो बातें कही हैं उनमें कोई ऐसी बात नहीं कही है जो किसानों को फायदा पहुंचाने वाली बात हो. बस कोशिश करेंगे, देखेंगे, करेंगे और क़र्ज़ मुक्ति की बात भाजपा ने बिल्कुल भी नहीं कही है और साल भर से मना कर रह हैं कि हम कर्ज मुक्ति नहीं करेंगे.

खेती की लागत के सी2+50 फॉर्मूले पर भी भाजपा ने कुछ नहीं कहा है. कांग्रेस ने काफी कुछ किसानों को आकर्षित करने के लिए कहा है कि हम दो लाख तक का कर्ज 10 दिन में माफ कर देंगे. कुछ निश्चित पांच-सात फसलों पर हम बोनस देंगे और इस प्रकार से कि बिजली का बिल आधा कर देंगे.

कांग्रेस ने किसान क़र्ज़ माफी की बात की है. क्या कर्ज माफी वास्तव में किसानों की समस्या का एक स्थायी समाधान है?

किसानों की समस्या का स्थायी समाधान कर्ज माफी नहीं है. स्थायी समाधान है सी2+50 जो भाजपा ने 2013 के घोषणा-पत्र में संसद में कहा था कि किसानों को उनकी फसलों की लागत का डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य हम देंगे.

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करेंगे जिसे उन्होंने विदा ही कर दिया, सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दिया है कि हम नहीं दे सकते. हमारी दो मुख्य समस्याएं है कि नीति ये हो कि किसान दोबारा कर्जदार ही न हो. वो दोबारा कर्जदार तब नहीं होगा जब उसको उसकी फसल का वाजिब दाम मिलेगा.

तो चूंकि केंद्र में सरकार भाजपा की है और ये लोकसभा चुनाव भी नहीं है और केंद्र सरकार ही समर्थन मूल्य पर दाम तय करती है, इसलिए भाजपा के घोषणा-पत्र में तो ये है नहीं और कांग्रेस राज्य के चुनावों के हिसाब से अपना घोषणा-पत्र जारी कर रही है.

भाजपा तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से किनारा कर चुकी है लेकिन क्या कांग्रेस ने अपने वचन-पत्र या घोषणा-पत्र में इस ओर इशारा किया है कि वे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर ध्यान देंगे?

कांग्रेस ने इशारा तो किया है. हमने तो मांग की है कि सभी पार्टियां वचन-पत्र, दृष्टि-पत्र और घोषणा-पत्रों को अलग करें और शपथ-पत्र पर लिखकर दें. क्योंकि आज का सबसे बड़ा संकट अविश्वास का संकट है.  विश्वास किस पर करें ये हमारे सामने प्रश्न खड़ा है. ऐसा हमको कई बार पार्टियों ने घोषणा-पत्र में कहा है जिनका पालन नहीं किया.

1998 के विधानसभा चुनावों से ऐन पहले कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार में मुलताई गोलीकांड हुआ था. लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो कांग्रेस ने फिर से सरकार बना ली. इस बार भाजपा की शिवराज सरकार में मंदसौर गोलीकांड हुआ है. क्या इस बार मंदसौर गोलीकांड असरदार साबित होता दिखता है या फिर ये भी तब की तरह बेअसर साबित होगा?

मुलताई गोलीकांड जब हुआ था तब मीडिया का दायरा उतना बड़ा नहीं था और न ही किसान इतना जागरूक था. मीडिया में कुछ दिनों के बाद वह मुद्दा खो गया था. परंतु अब किसान जागरूक है. और मंदसौर गोलीकांड में जो सबसे बड़ी गड़बड़ हुई है वो ये कि किसानों को पीट-पीटकर मारा गया है. तो जिन पुलिसवालों ने पीट-पीटकर मारा है उन पर एफआईआर करने में सरकार को क्या परेशानी हो रही है?

इस बात को किसान गंभीरता से लेता है कि जिन्होंने उसे पीट-पीटकर मारा है तो शिवराज सिंह चौहान उन पुलिस वालों को क्यों बचाना चाहते हैं? ये एक विषय किसान के मन में आता है कि सरकार अपराधियों को बचा रही है. और फिर इनको एक्शन लेने में समय भी लगा गया. एसपी वगैरह को हटाने का काफी देर से निर्णय लिया गया था.

जस्टिस जैन आयोग का गठन किया गया. जस्टिस जैन आयोग की रिपोर्ट मुख्यमंत्री निवास में तैयार हुई है और दो किसानों को पीट-पीटकर मारा गया है इसकी जांच वो लोग कर रहे हैं जिन्होंने स्वयं ये किया है. अपराधी ही जांच कर रहे हैं, न्याय कहां से मिलेगा, ये किसान के बीच में तकलीफदायक प्रश्न खड़ा है.

अपनी सरकार की भावांतर योजना को शिवराज गेम चेंजर की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं. क्या वास्तव में यह किसानों को फायदा पहुंचाने वाली योजना है?

ऐसा लगता है कि इनके दिमाग में दिवालियापन आ गया है. भावांतर योजना का जितनी बार ये नाम लेंगे, उतना ही इनका मत प्रतिशत नीचे गिरेगा. भावांतर योजना में मंडी में किसानों की गंदी लूट मची हुई है. साथ ही भावांतर योजना अवैध है क्योंकि यह योजना 1972 मंडी एक्ट का विरोध करती है, जो संभव नहीं है.

भावांतर योजना केवल एक योजना है, यह एक्ट नहीं है. 1972 मंडी एक्ट है. मंडी एक्ट कहता है कि समर्थन मूल्य से नीचे माल मंडी में नहीं बिकेगा. भावांतर योजना कहती है कि समर्थन मूल्य से नीचे माल बिकेगा. इस योजना से किसान को बहुत ही ज्यादा नुकसान हुआ है.

जून 2017 में किसान आंदोलन के दौरान मंदसौर में भड़की हिंसा के बाद राज्य के कई हिस्सों में तनाव फैल गया था (फाइल फोटो: पीटीआई)

जून 2017 में किसान आंदोलन के दौरान मंदसौर में भड़की हिंसा के बाद राज्य के कई हिस्सों में तनाव फैल गया था (फाइल फोटो: पीटीआई)

ऐसा विरोधाभास क्यों है कि पांच कृषि कर्मण पुरस्कार जीतने वाले मध्य प्रदेश में किसान बदहाल है?

कृषि कर्मण पुरस्कार किसान की मेहनत पर मिलता है, लेने वाली एजेंसी सरकार होती है. मंहगा खाद, मंहगा पानी, मंहगी बिजली, भ्रष्टाचार इस सबको झेलकर किसान उत्पादन करता है. तो ये तो किसान का बड़प्पन हुआ, किसान की मेहनत हुई और फिर किसान कर्जदार होता है क्योंकि वह कैल्कुलेशन नहीं लगा पाता कि मैं एक फसल में इतना मंहगा सब लगा रहा हूं तो मेरे पर कितना कर्ज होगा?

शिवराज के कार्यकाल में 15 वर्षों में किसान 10 से 15 गुना अधिक कर्जदार हुआ है. किसान आत्महत्या के मामले में अब मध्य प्रदेश तीसरे नंबर पर आ चुका है. मध्य प्रदेश में आत्महत्या का प्रतिशत है 47 फीसदी बढ़ा है. यह प्रदेश में किसान की माली हालत जानने के लिए पर्याप्त है. आप कोई भी पुरस्कार ले लें, कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है, किसान घाटे की खेती कर रहा है.

अब रहा सवाल कि उत्पादन बढ़ने के जो आंकड़े आपके सामने आते हैं. इन आंकड़ों में भी विरोधाभास है. हमने इस संबंध में कई बार सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगी. जितनी बार आरटीआई लगाई, उतनी बार उत्पादन संबंधी अलग-अलग आंकड़े आरटीआई से मिले हैं.

दूसरी बात कि खेती का रकबा प्रदेश में बहुत ज्यादा बढ़ा है. पहले मान लीजिए कि खेती 25 लाख हेक्टेयर में होती थी तो अब 50 लाख हेक्टेयर में हो रही है. अब रकबा क्यों बढ़ा है? क्योंकि जमीन के लालच में लोगों ने जंगल नष्ट कर दिए. केंद्र सरकार का 5 लाख जंगल के पट्टे देने का वादा था. तो जंगलों में खेती हो रही है. जंगल ख़त्म किए जा रहे हैं, जंगल नष्ट हो रहे हैं.

मेरे पास 40 एकड़ जमीन ऐसी थी जिस पर कि हम बैलों के लिए घास पैदा करते थे. अब हमारे पास बैल हैं नहीं. तो हमने उस 40 एकड़ पर खेती शुरू कर दी. ऐसा सभी किसानों ने किया तो रकबा भी बढ़ा है. खेती का क्षेत्र बढ़ा है. ये भी एक बड़ा कारण है कि वे पुरस्कार पा गये.

आपने कहा कि जंगल काट-काटकर खेती का रकबा बढ़ गया लेकिन सरकार तो इसे अपनी उपलब्धि बताती है कि हमने खेती का रकबा बढ़ा दिया.

सरकार तो कुछ भी कर सकती है. अपनी उपलब्धि माने, पीठ थपथपाये, सरकार तो सरकार है. पर वास्तविकता तो ये है कि जंगल बहुत नष्ट हो गये हैं. राज्य सरकार को केंद्र सरकार के आदेश पर पांच लाख आदिवासी किसानों को पट्टे भी देना है. ढाई लाख के करीब पट्टे दिए हैं वो खेती कर रहे हैं. यह देखकर लोग और जंगल साफ करने लगे हैं कि हमको भी पट्टा मिल जायेगा आगे जाकर. तो रकबा बहुत बड़ा है तो उसका एक ये भी कारण है.

(दीपक गोस्वामी स्वतंत्र पत्रकार हैं.)