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क्यों राजस्थान में सिलिकोसिस के मरीज़ राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में नहीं हैं

ग्राउंड रिपोर्ट: राजस्थान के खदानों में काम करने वाले मज़दूर मुख्य रूप से सिलिकोसिस की चपेट में आते हैं, हर साल इससे होने वाली मौतों की संख्या बढ़ रही है लेकिन इसके मरीज़ों को लेकर भाजपा और कांग्रेस चिंतित नहीं दिखतीं.

राजस्थान में पत्थर तराशने वाले कारखाने में काम करते मज़दूर. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

राजस्थान में पत्थर तराशने वाले कारखाने में काम करते मज़दूर. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

जयपुर: 25 साल पहले जब शंकर सिंह अजमेर के ब्यावर की एक पाउडर फैक्ट्री में पहली बार काम करने गए थे तब नहीं जानते थे कि ये पाउडर उनकी मौत की वजह बनेगा. 25 साल लगातार पाउडर के बारीक कण शंकर सांस के रास्ते निगलते रहे, छह महीने पहले पता चला कि उन्हें सिलिकोसिस है.

50 साल के शंकर अब काम नहीं कर सकते. घर में 16 साल का एक विकलांग बेटा है. रिश्तेदार मदद करते हैं तो शंकर का घर चलता है. सरकार ने सिर्फ़ इतना किया कि शंकर को जीते जी उनकी ‘मौत का सर्टिफिकेट’ हाथों में थमा दिया.

सिलिकोसिस मरीज होने का प्रमाण पत्र मिलते ही शंकर को एक लाख रुपये मिल जाने चाहिए थे, लेकिन शंकर छह महीने से इन पैसों का इंतज़ार कर रहे हैं.

मालूम हो कि सिलिकोसिस की चपेट में आने के बाद पीड़ित शारीरिक रूप से कोई भी काम करने अक्षम हो जाता है. राजस्थान में सिलिकोसिस से मौत के बाद परिजनों को तीन लाख रुपये की सहायता राशि दी जाती है. इसके लिए उन्हें एक प्रमाण पत्र दिया जाता है. इस प्रमाण पत्र के पीड़ित मौत का प्रमाण पत्र कहते हैं. प्रमाण पत्र मिलने के साथ ही उन्हें एक लाख रुपये दिए जाने का प्रावधान है.

शंकर कहते हैं, ‘जीते जी तो पैसे मिल नहीं रहे क्या पता मरने के बाद एक साथ चार लाख रुपये दे दें. मदद के नाम पर सरकार ने मुझे मेरी ‘मौत’ का प्रमाण पत्र पकड़ा दिया है.’

शंकर का बेटा 16 साल का पप्पू कहता है, ‘हम बेहद बुरी स्थिति में जी रहे हैं, मैं एक पैर से विकलांग हूं और पापा अब काम नहीं कर सकते. पता नहीं अगली साल 9वीं में सरकारी स्कूल की फीस भी भर पाऊंगा या नहीं.’

राजस्थान सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों ने अनुसार, चार दिसंबर तक पूरे राजस्थान में सिलिकोसिस के 5,927 रजिस्टर्ड मरीज़ हैं और 12,452 खान श्रमिक अभी अपनी स्क्रीनिंग या चेकअप के इंतज़ार में हैं.

खदान में काम करने वाले अधिकांश मज़दूरों को पता ही नहीं चल पाता कि वे सिलिकोसिस की चपेट में आ चुके हैं.

सूत्रों के मुताबिक, 5,927 रजिस्टर्ड मरीज़ों में से सिर्फ़ 679 लोगों को ही एक लाख रुपये की सहायता राशि मिली है बाकी 5,248 सिलिकोसिस मरीज़ों को यह राशि अब तक नहीं मिल सकी है.

मालूम हो कि एक लाख रुपये प्रति पीड़ित के हिसाब से यह राशि करीब 52 करोड़ 48 लाख रुपये बैठती है. भुगतान रुकने का कारण सरकारी मुलाज़िम आचार संहिता का लगना बता रहे हैं. हालांकि चुनाव आयोग की अनुमति के बाद पैसा दिया जा सकता है. इस साल आई कैग की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 से 2017 तक राजस्थान में सिलिकोसिस से 448 लोगों की मौत हो चुकी है.

अपने प्रमाण पत्र के साथ सिलिकोसिस बीमारी से ग्रसित राधेश्याम (बाएं) और शंकर सिंह (दाएं). इस प्रमाण पत्र के बाद ही उन्हें एक लाख रुपये की सहायता राशि दी जाती है. (फोटो: माधव शर्मा)

अपने प्रमाण पत्र के साथ सिलिकोसिस बीमारी से ग्रसित राधेश्याम (बाएं) और शंकर सिंह (दाएं). इस प्रमाण पत्र के बाद ही उन्हें एक लाख रुपये की सहायता राशि दी जाती है. (फोटो: माधव शर्मा)

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के पांच ज़िलों में 2013-14 में 304 मरीज़ पाएं गए थे और एक मौत दर्ज की गई थी. 2014-15 में मरीज़ों की संख्या बढ़कर 905 हो गई और 60 लोगों की जान गई.

रिपोर्ट के अनुसार, 2015-16 में मरीज़ों की संख्या बढ़कर 2,186 हो गई और मरने वालों की संख्या 153 पहुंच गई. वहीं साल 2016-17 मरीज़ों की संख्या घटकर 1536 हुई लेकिन मरने वालों की संख्या बढ़कर 235 हो गई.

मालूम हो कि 22,202 खान श्रमिकों ने चेकअप के लिए रजिस्ट्रेशन कराया, लेकिन इनमें से आधे से ज़्यादा यानी 12,452 श्रमिक अभी अपनी बीमारी की जानकारी पाने का इंतज़ार कर रहे हैं.

सिलिकोसिस स्क्रीनिंग में हो रही देरी पर स्वास्थ्य विभाग में सिलिकोसिस के नोडल ऑफिसर देवेन्द्र कहते हैं, ‘ये रूटीन वर्क है जो चलता रहता है. अच्छी तरह स्क्रीनिंग के लिए तीन डॉक्टरों की टीम एक दिन में मुश्किल से 20-30 लोगों का चेकअप ही कर पाती है क्योंकि पूरी डिटेल देखनी पड़ती है. ज़्यादा केस इसीलिए आ रहे हैं क्योंकि जब पैसा बंटना शुरू होता है तो लोग सोचते हैं कि मुझे भी मिल जाए. हालांकि अब सॉफ्टवेयर डेवलप हो गया है तो इसमें तेज़ी आ रही है.’

पत्थर गढ़ाई मज़दूर सुरक्षा संघ चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सरफ़राज़ शेख़ कहते हैं, ‘सहायता राशि कोई स्थाई समाधान नहीं है. सिलिकोसिस मरीज़ों की कोई एक नीति बननी चाहिए. कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में सिलिकोसिस मरीज़ों को विकलांगता की श्रेणी में रखने की बात कही है, लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसी बात है. मज़दूरों की सुरक्षा के साथ-साथ अब खान मालिकों, पत्थर गढ़ाई कारखानों के मालिकों की ज़िम्मेदारी भी सरकार को तय करनी चाहिए.’

मज़दूर किसान शक्ति संगठन के निखिल डे कहते हैं, ‘ये हमारा विकास, उनका विनाश वाली स्थिति है. सिलिकोसिस मरीज़ों को उनकी उम्रभर की कमाई के आधार पर मुआवज़ा मिले और सिलिकोसिस का सर्टिफिकेट मिलते ही मरीज़ की पेंशन शुरू हो. इसके लिए जवाबदेही तय की जाए ताकि समय पर स्क्रीनिंग न होने, सहायता राशि न मिलने पर सरकारी अफसरों पर कार्रवाई हो सके. दूसरी मांग, सिलिकोसिस के लिए राजस्थान में अलग से बोर्ड बनाने की है ताकि भयावह हो चुकी इस बीमारी के पीड़ितों को तुरंत मदद मिल सके.’

पार्टियों का वही राग, इस बार सरकार आने दो…

राजस्थान बीजेपी प्रवक्ता जीतेंद्र श्रीमाली कहते हैं, ‘सिलिकोसिस जैसी अनेक बीमारियां हैं. हमने श्रमिक कल्याण बोर्ड बनाने की बात कही है, ताकि ऐसी बीमारियों के बारे में विस्तृत अध्ययन किया जा सके. इस बार सरकार आएगी तो ये काम हो जाएगा, देरी होने का कारण ये होता है कि सरकार में कई बार और भी ज़रूरी चीज़ें आ जाती हैं.’

राजस्थान कांग्रेस प्रवक्ता सत्येन्द्र सिंह राघव कहते हैं, ‘इस समस्या पर कोर्ट में पीआईएल भी लगी हुई है. कांग्रेस सरकार में आते ही जो भी चीज़ें की जा सकती हैं, वो की जाएंगी. सहायता राशि में देरी इसीलिए हो रही है क्योंकि भाजपा सरकार ने पांच साल में इन पर कोई ध्यान ही नहीं दिया. सरकार आएगी तो इनके लिए नीति बनाई जाएगी.’

सिरोही के पिंडवाड़ा में स्थिति बेकाबू, चार भाई सिलिकोसिस की चपेट में, एक की मौत

पत्थर गढ़ाई के लिए प्रसिद्ध राजस्थान के सिरोही ज़िले के पिंडवाड़ा कस्बे की दूसरा चेहरा बहुत भयावह है. यह कस्बा हर साल सैकड़ों लोगों को सिलिकोसिस बीमारी बांट रहा है.

पिंडवाड़ा तहसील की आमली ग्राम पंचायत के खारी फली गांव के चार सगे भाई पोसराम (37), सुरेश (30), कालूराम (23) और कमलेश (33) को सिलिकोसिस बीमारी पिंडवाड़ा से ही मिली है. दूसरे नंबर के भाई कमलेश की मौत हो चुकी है.

सिलिकोसिस से पीड़ित पोसराम. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

सिलिकोसिस से पीड़ित पोसराम. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

पोसराम, सुरेश और कालूराम ज़िंदगी जीने की उम्र में मौत से लड़ रहे हैं. चारों भाई पिंडवाड़ा इंडस्ट्रीयल एरिया में पिछले 10 साल से पत्थर गढ़ाई का काम कर रहे थे. पिंडवाड़ा के अलावा ठेकेदार इन्हें कई जगहों पर पत्थर की मीनाकारी के लिए ले गए. एक साल पहले चारों एक साथ सिलिकोसिस से पीड़ित हुए.

मौत बांट रही हैं खदानें

राजस्थान में क़रीब 33 हज़ार खदानों में तक़रीबन 25 लाख से ज़्यादा मज़दूर काम कर रहे हैं. राजस्थान में 20 ज़िले सिलिकोसिस प्रभावित हैं. फेफड़ों में संक्रमण के कारण होने वाली इस बीमारी की अधिकांश मामलों में पहचान ही नहीं हो पाती है.

मेडिकल कॉलेजों में न्यूकोनियोसिस बोर्ड ही सिलिकोसिस की पुष्टि करता है. जागरूकता की कमी से ज़्यादातर मरीज़ों की इस बोर्ड तक पहुंचने से पहले ही मौत हो जाती है. कोई नीति नहीं होने के कारण जिन मरीज़ों की पुष्टि नहीं हो पाती है उनके परिजन सहायता राशि से भी वंचित रह जाते हैं.

खदानों और पत्थर के कारखानों में नई तकनीकी की मशीनों के आने के बाद सिलिकोसिस की बीमारी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. कारखानों में पत्थर की कटाई और छंटाई में काम आने वाली कटर और ग्राइंडर मशीनों के कारण पत्थरों पर जमा सिलिकॉन डाई ऑक्साइड और सिलिका क्रिस्टल बड़ी मात्रा में हवा में उड़ता है एवं सांस के ज़रिये सीधा मज़दूरों के फेफड़ों में चला जाता है. रेत के कण से भी 100 गुना छोटे सिलिका क्रिस्टल फेफड़ों में जमकर रक्त प्रवाह को बंद कर देते हैं और व्यक्ति धीरे-धीरे मौत की तरफ बढ़ने लगता है.

भाजपा-कांग्रेस के घोषणा पत्र में सिलिकोसिस के लिए क्या है

भाजपा ने असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए अलग से श्रम कल्याण बोर्ड बनाने की बात कही है लेकिन खनन से जुड़े या सिलिकोसिस मरीज़ों के लिए अलग से कोई वादा नहीं किया है.

कांग्रेस ने सिलिकोसिस मरीज़ों को विकलांगता की श्रेणी में रखने की बात कही है, लेकिन यह सिर्फ़ उन लोगों के लिए फायदेमंद साबित होगी जिन्हें सिलिकोसिस हो चुका है. हालांकि कांग्रेस ने असंगठित क्षेत्र के लिए मज़दूर एवं कामगार कल्याण बोर्ड बनाने की बात भी कही है.

दोनों पार्टियों ने लगभग एक जैसे ही वादे किए हैं, लेकिन कहीं नहीं लिखा कि सिलिकोसिस होने को रोका कैसे जाए? साफ है कि जो मज़दूर सालों से राज्य को सबसे ज़्यादा राजस्व देने वाले खनन क्षेत्र में अपनी सांसें खपा रहे हैं, सरकार बनाने वाली दोनों पार्टियों के घोषणा पत्रों से उनके मुद्दे ही गायब हैं.

खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास के लिए बने डीएमएफटी फंड का 12% ही उपयोग किया

राजस्थान में खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बने फंड डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) का पैसा भी काम में नहीं लिया जा रहा. 2015 से जुलाई 2018 तक राजस्थान में 2008 करोड़ रुपये इस फंड में जमा हुए लेकिन इसका सिर्फ 248 करोड़ रुपये यानी महज़ 12% ही उपयोग हो पाए हैं.

राजस्थान सरकार ने इस फंड में से जयपुर, जोधपुर, नागौर, अलवर, टोंक, पाली, भरतपुर, करौली, बूंदी, बारां और जैसलमेर में तो एक पैसा भी ख़र्च नहीं किया है.

डीएमएफटी का पैसा ख़र्च नहीं होने के सवाल पर राजस्थान खनन विभाग की प्रमुख शासन सचिव अपर्णा अरोड़ा कहती हैं, ‘डीएमएफटी का पैसा ख़र्च करने का पूरा अधिकार ज़िला कलेक्टरों का है. इसके लिए तो गवर्निंग काउंसिल की मीटिंग की भी ज़रूरत नहीं है. हम लोग समय-समय पर निर्देश जारी करते रहते हैं, लेकिन अभी राजस्थान में आदर्श आचार संहिता लगी है इसीलिए कुछ मरीज़ों को सहायता राशि नहीं मिल पा रही होगी.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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