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क्या आरबीआई के नए गवर्नर शक्तिकांत दास अपनी निष्ठा बदल पाएंगे?

पहले भी केंद्र सरकार के करीबी माने जाने वाले अधिकारी आरबीआई तक पहुंचे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी आवाज़ को आज़ाद रखा. क्या शक्तिकांत दास ऐसा कर पाएंगे?

Mumbai: Newly appointed Reserve Bank of India (RBI) governor Shaktikanta Das interacts with the media at the RBI headquarters in Mumbai, Wednesday, Dec. 12, 2018. (PTI Photo/Shashank Parade) (PTI12_12_2018_000178B)

नवनियुक्त आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली : मई, 2017 में जब वित्त मंत्रालय द्वारा एक रुपये का नया नोट जारी किया गया था, उस समय नॉर्थ ब्लॉक से एक मज़ाक चलता था कि वरिष्ठ नौकरशाह शक्तिकांत दास, एक बार पहले चूक जाने के बाद आखिरकार भारतीय रिज़र्व बैंक के अगले गवर्नर बनेंगे?

ऐसा इसलिए था क्योंकि एक रुपये के नोट पर उनके दस्तखत थे- परंपरा के मुताबिक नए छापे गए किसी नोट पर आरबीआई के मुखिया का दस्तखत होता है.

एक रुपये के (नए) नोट के अनोखे इतिहास के कारण- इसे केंद्रीय बैंक के बजाय वित्त मंत्रालय द्वारा छापा जाता है- उन सारे नोटों पर या तो राजीव महर्षि के दस्तखत हैं, जो 2015 की शुरुआत में इनकी छपाई के वक्त वित्त सचिव थे या दास के दस्तखत हैं, जो 2017 की शुरुआत में जब इन नोटों को आखिरकार जारी किया गया था, आर्थिक मामलों के सचिव थे.

एक साल बाद मोदी द्वारा नवंबर, 2016 में नोटबंदी की घोषणा के बाद नोटबंदी का सार्वजनिक चेहरा बन गए दास मिंट स्ट्रीट (आरबीआई) में पहुंच चुके हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली के काफी करीब माने जानेवाले इस 61 वर्षीय नौकरशाह की नियुक्ति का समय हालांकि खुशनुमा नहीं कहा जा सकता है.

मोदी सरकार और आरबीआई के बीच आपसी रिश्ते को काफी बिगाड़नेवाली तीन महीने लंबी सार्वजनिक तनातनी के बाद उर्जित पटेल ने आरबीआई के गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया है.

पटेल का यह इस्तीफा अचानक आया और सबको हैरान कर गया. पटेल 40 सालों में अपने कार्यकाल के समाप्त होने से पहले इस्तीफा देनेवाले पहले आरबीआई गवर्नर बन गए.

अब कमान शक्तिकांत दास के हाथों में होगी और उन्हें उस पद को संभालना होगा जिसमें पिछले 20 वर्षों में धीमी गति से सही लेकिन बदलाव जरूर आया है.

जैसा कि एक टिप्पणीकार ने कहा, भारत के केंद्रीय बैंकरों को उनकी अल्पभाषिता और संघर्षों का चुपचाप समाधान करने की क्षमता के लिए जाना जाता था. उन्हें अब उनकी सार्वजनिक छवि और सार्वजनिक तौर पर लक्ष्मणरेखा खींचने की उत्सुकता के कारण ज्यादा जाना जाता है.

निश्चित तौर पर दास की नियुक्ति हमें उस युग में वापस लेकर जानेवाली है, जब आईएएस अधिकारी केंद्रीय बैंक के गवर्नर हुआ करते थे.

और किसी गफलत में मत रहिए. वित्त मंत्रालय में उन्हें जानने वाले कई लोगों के मुताबिक दास नौकरशाहों के नौकरशाह का शुद्धतम रूप हैं. कठिन स्थितियों में स्वीकार्य परिणाम हासिल करके देने में वे माहिर हैं.

नोटबंदी के दौरान- जब दास सरकारी संवाददाता सम्मेलनों में फैसले का बचाव करते हुए और अनगिनत बदलावों और भ्रमों को समझानेवाले प्रमुख चेहरा बन गए- उनसे उर्जित पटेल की चुप्पी के बारे में पूछा गया था.

उन्होंने बिना समय गंवाए जवाब दिया, ‘इस बात की कोई अहमियत नहीं है कि कौन बोल रहा है. मैं सरकार की तरफ से बोल रहा हूं. मैं निजी क्षमता में आपको संबोधित नहीं कर रहा हूं. इसलिए यह बात अप्रसांगिक है कि मैं बोल रहा हूं या कोई अन्य बोल रहा है.’

‘ऐसी बातें मत कीजिए. आप तक बात पहुंचाने के मकसद से यह बात महत्वहीन है कि कौन संबोधित करता है. मंशा यह है कि सरकार को बात पहुंचानी चाहिए और सारी सूचनाएं साझा करनी चाहिए.’

तमिलनाडु से केंद्र तक

मूल रूप से ओडिशा के रहनेवाले दास सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में एमए हैं. वे 1980 में तमिलनाडु कैडर के अधिकारी के तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल हुए थे. जैसा कि ज्यादातर नए-नवेले आईएएस अधिकारी करते हैं, दास को तमिलनाडु के दो जिलों डिंडिगुल और कांचीपुरम की जिम्मेदारी सौंपी गई थी जहां उन्होंने जिलाधिकारी के तौर पर काम किया.

अपने सफर में उन्होंने राज्य सरकार के भीतर कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर काम किया, जिनमें प्रधान सचिव (उद्योग) स्पेशल कमिश्नर (राजस्व), सचिव (राजस्व) और सचिव (वाणिज्य कर) शामिल है.

राज्य के विशेष आर्थिक क्षेत्र (स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन) नीति के सफल क्रियान्वयन और निजी आईटी कंपनियों को सरकारी जमीन का त्वरित आवंटन करके टेक्नोलॉजी बूम में तमिलनाडु को कर्नाटक के समकक्ष ले आने को सामान्य तौर पर उनकी उपलब्धियों के तौर पर गिनाया जाता है.

हालांकि, तमिलनाडु में रहते हुए दास के हिस्से में सिर्फ तमिल का ज्ञान ही नहीं आया. उद्योग सचिव के तौर पर उनके कार्यकाल ने भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा लगाए गए कई अपुष्ट आरोपों को जन्म देने का काम भी किया.

जुलाई, 2016 में पीगुरुज नाम की एक वेबसाइट ने यह आरोप लगाया कि दास के कार्यकाल के दौरान अमेरिकी कंपनी सैनमिना एससीआई कॉरपोरेशन को सस्ते दर में 100 एकड़ सरकारी जमीन के आवंटन में गड़बड़ी हुई थी.

अतीत में कई नेताओं ने यह दावा किया है कि पीगुरूज दक्षिणपंथी चार्टर्ड अकाउंटेंट एस गुरुमूर्ति से जुड़ा हुआ है. गुरुमूर्ति वर्तमान में आरबीआई के बोर्ड में हैं और वे दास के साथ बोर्ड बैठकों में शिरकत करेंगे.

हालांकि, इन आरोपों की कोई विश्वसनीयता नहीं है, लेकिन स्वामी के हमलों के बाद जेटली की तरफ से निजी तौर पर और मंत्रालय के ट्विटर हैंडल से इन आरोपों का खंडन बिना कोई समय गंवाए किया गया.

मुश्किलों के बीच रास्ता खोजने का हुनर

यह सही है कि दास वर्तमान निजाम से अपनी नजदीकी के कारण जाने जाते हैं, लेकिन केंद्र सरकार से वे यूपीए-2 के समय 2008 में जुड़े जब उन्हें संयुक्त सचिव (व्यय) बनाया गया था. इसके बाद उन्हें रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में स्थानांतरित कर दिया गया.

2014 में एनडीए-2 की सरकार बनने के बाद उन्हें राजस्व सचिव बनाकर वापस नॉर्थ ब्लॉक लाया गया. यह मोदी सरकार द्वारा वित्त मंत्रालय में किए गए कुछ अहम शुरुआती बदलावों में से एक था.

उन्होंने जल्दी ही अपने लिए एक अहम स्थान बना लिया. वे कुछ चुनिंदा नौकरशाहों के उस छोटे से समूह का हिस्सा थे जिन्हें नोटबंदी की जानकारी थी और जो इसकी घोषणा के बाद के हफ्तों और महीनों में इसके क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार था.

मौजूदा निजाम के साथ दास की नजदीकी और एक सक्षम संकटमोचक के तौर पर सरकार के भीतर उनकी छवि का मतलब है कि जब भी किसी अहम स्थान के लिए मोदी सरकार को किसी की तलाश होती है, तब उनका नाम अक्सर सामने आता है.

2016 में जब आरबीआई गवर्नर के तौर पर रघुराम राजन का कार्यकाल समाप्त हुआ उस समय भी इस पद के लिए उनके नाम पर विचार किया गया था.

एक साल के बाद जब पूंजी बाजार के विनियामक सेबी का शीर्ष पद खाली हुआ, उस समय भी दास इस पद के दावेदार थे. हालांकि केंद्र ने आखिरकार अजय त्यागी के नाम को मंजूरी दी.

उन्हें जिस तरह से आरबीआई का गवर्नर बनाया गया, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए. पटेल के जाने के बाद भारतीय वित्तीय नीति निर्धारकों की मंडली में सबसे पहले यह विचार सामने आया कि मोदी सरकार फिलहाल कोई अंतरिम बहाली कर सकती है ताकि एक सर्च पैनल थोड़ा समय लेकर एक उचित और स्थायी व्यक्ति की तलाश कर सके.

लेकिन जैसा कि ज्यादातर लोगों का कहना है, वित्तीय क्षेत्र विनियामक नियुक्ति खोज समिति (फाइनेंशियल सेक्टर रेगुलेटरी अपॉइंटमेंट सर्च कमेटी) को आनन-फानन में तीन संभव उम्मीदवारों शक्तिकांत दास, आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष गर्ग और सेबी प्रमुख अजय त्यागी में से किसी एक का चयन करने के लिए 10 दिसंबर की शाम और 11 दिसंबर की सुबह का बस कुछ घंटे का ही वक्त मिला.

यह अस्पष्ट है कि यह प्रतिभाशाली बाहरी उम्मीदवारों पर यकीन कर सकने और उनके साथ काम करने में मोदी सरकार की अक्षमता के बारे में ज्यादा बताता है या फिर यह बताता है कि मोदी सरकार वफादार कर्मठ नौकरशाह के ज्यादा व्यवहारिक विकल्पों को ज्यादा महत्व देती है.

2017 में सेवानिवृत्ति के बावजूद जेटली दास को अवकाश देने के खिलाफ रहे हैं. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक हालिया रिपोर्ट में जी-20 में उनके काम के बारे में और किसी लक्ष्य को कुशलतापूर्वक हासिल करने की उनकी क्षमता के बारे में बताया गया है.

विजय माल्या या नीरव मोदी जैसे भविष्य के अपराधियों पर नकेल कसने में मदद के लिए मोदी जी-20 की विज्ञप्ति में भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर एक पैराग्राफ जुड़वाना चाहते थे, और इसमें काफी मेहनत लगी.

इस रिपोर्ट में उनके हवाले से कहा गया है, ‘इसे (इस अनुच्छेद को) को शामिल कराने के लिए हमारी तरफ से काफी मेहनत की जरूरत थी. इस मसले पर यूरोपीय संघ का पक्ष अलग था और हमें यह समझाना पड़ा कि भले यह एक मामूली-सी चीज दिखाई दे, लेकिन यह वैश्विक वित्तीय ढांचे की बुनियाद को खोखला कर सकता है.’

कहां है उनकी निष्ठा?

आरबीआई के नए गवर्नर अतीत में मोदी सरकार द्वारा शुरू किए गए सुधारों में और विकास पर पड़नेवाले इसके प्रभावों में अपनी आस्था जताने से गुरेज नहीं किया है.

उनका बयान है, ‘काफी कम समय के भीतर अर्थव्यवस्था में किए गए बड़े संरचनात्मक बदलाव के कारण विकास में आई गिरावट अस्थायी है.’ इस सरकार के राष्ट्रवादी हृदय के ज्यादा करीब रहे दूसरे मुद्दों पर भी वे इसी तरह से मुखर रहे हैं.

जब भारतीय तिरंगे की तस्वीर वाले लेबल के साथ कई उत्पादों को बेचने के कारण अमेजन विवाद में घिर गई थी, उस समय उन्होंने परोक्ष रूप से ट्वीटों के एक सिलसिले के द्वारा ऑनलाइन ई-कॉमर्स महारथी को चेतावनी दी थी.

उस समय उनका ट्वीट था, ‘अमेजन अपनी हद में रहे और भारत के प्रतीकों और महापुरुषों के साथ ओछी हरकत करने से बाज आए. इस मामले में उदासीनता आपके लिए खतरनाक होगी.’

लेकिन इसके आगे उनकी निष्ठा की बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण है यह तथ्य कि आरबीआई के गवर्नर के पद के साथ वे क्या कर सकते हैं.

आर्थिक मामलों के सचिव के तौर पर वे राजकोषीय मजबूती के आग्रही रहे और यहां तक कहा जाता है कि उन्होंने जेटली को इस रास्ते पर बने रहने के लिए मजबूर किया, जबकि हो सकता है कि सरकार की इच्छा इससे छूट लेने की रही हो.

लेकिन केंद्र और आरबीआई के बीच के मौजूदा विवाद में वे किसका पक्ष लेंगे या उनकी निष्ठा किस चीज के प्रति है, यह स्पष्ट नहीं है.

अतीत में उन्होंने केंद्रीय बैंक से ज्यादा लाभांश की पैरोकारी की है, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि वे सरकार द्वारा आरबीआई की आकस्मिकता निधि पर डाका डालने का समर्थन करेंगे?

अतीत में उन्होंने यह भी कहा है कि बैंक खराब कर्जे का बहाना बनाकर ‘कर्ज देना बंद नहीं कर सकते हैं.’ लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के कमजोर कर्जदाताओं पर कर्ज देने की शर्तों में तत्काल ढील दे देंगे?

यही उनके कार्यकाल की सफलता या विफलता को तय करेगा. अतीत में भी केंद्र के नजदीक माने जानेवाले आईएएस और नौकरशाह मिंट स्ट्रीट पहुंचे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी वफादारी बदलने का फैसला किया और अपनी आवाज को आजाद रखा. क्या शक्तिकांत दास भी ऐसा कर पाएंगे?

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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