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1984 सिख विरोधी दंगे: कांग्रेस नेता सज्जन कुमार दोषी क़रार, उम्रक़ैद की सज़ा

मामला दक्षिण पश्चिम दिल्ली की पालम कॉलोनी में एक सिख परिवार के पांच सदस्यों की हत्या और एक गुरुद्वारे में आगे लगाने से जुड़ा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पीड़ित को यह एहसास कराना ज़रूरी है कि कितनी भी चुनौती आए, लेकिन सत्य की जीत होगी.

सज्जन कुमार (फोटो: पीटीआई)

सज्जन कुमार (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को 1984 सिख विरोधी दंगों से संबंधित एक मामले में दोषी ठहराते हुए उसे ताउम्र क़ैद की सज़ा सुनाते हुए कहा कि ये दंगे राजनीतिक संरक्षण का आनंद लेने वाले लोगों द्वारा मानवता के ख़िलाफ़ अपराध थे.

उच्च न्यायालय ने कहा कि इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आरोपियों को सज़ा देने में तीन दशक लग गए लेकिन पीड़ितों को यह आश्वासन देना आवश्यक है कि अदालत के समक्ष पेश होने वाली चुनौतियों के बावजूद सत्य की जीत होगी और न्याय होगा.

जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की पीठ ने सोमवार को सज्जन कुमार को दंगा भड़काने और साजिश रचने का दोषी करार दिया और इसके लिए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई.

कुमार को जिस मामले में दोषी ठहराया गया है वह दक्षिण पश्चिम दिल्ली के पालम कॉलोनी में राजनगर पार्ट-एक इलाके में पांच सिखों की एक-दो नवंबर 1984 को हुई हत्या से जुड़ा हुआ है. इस दौरान राष्ट्रीय राजधानी और देश के अन्य हिस्से में दंगे फैले हुए थे.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा 31 अक्टूबर को हत्या किए जाने के बाद एक नवंबर और चार नवंबर 1984 के बीच 2733 सिख मारे गए थे.

उच्च न्यायालय ने 73 वर्षीय कुमार और अन्य पांच को दोषी करार देते हुए 31 दिसंबर तक आत्मसमर्पण करने और तक तब दिल्ली ना छोड़ने का निर्देश दिया है.

पूर्व संसद सज्जन कुमार सहित छह आरोपियों के ख़िलाफ़ वर्ष 2010 में सुनवाई शुरू हुई थी और तीन वर्ष बाद निचली अदालत ने कांग्रेस नेता को बरी करते हुए पांच अन्य को दोषी ठहराया था. सिख विरोधी दंगों के समय सज्जन कुमार संसद सदस्य थे.

जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की एक पीठ ने कांग्रेस नेता को आपराधिक साज़िश रचने तथा हत्या के लिए उकसाने, धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने और सांप्रदायिक सद्भाव तथा गुरुद्वारे को अपवित्र करने और उसको क्षतिग्रस्त करने के लिए प्रतिकूल कृत्य करने का दोषी ठहराया.

पीठ ने कहा कि मुख्य रूप से तीन प्रत्यक्षदर्शियों- जगदीश कौर, उनके रिश्तेदार जगशेर सिंह और निरप्रीत कौर के साहस एवं दृढ़ता के कारण आरोपियों को न्याय के दायरे में लाया जा सका.

जगदीश कौर के पति और पुत्र के अलावा तीन अन्य रिश्तेदार केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुवेन्दर सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह इस घटना में मारे गए थे.

पीठ ने मामले में निचली अदालत के कांग्रेस के पूर्व पार्षद बलवान खोखर, नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल, पूर्व विधायक महेंद्र यादव और कृष्ण खोखर को दोषी ठहराने के साथ ही उन्हें मिली सज़ा को भी बरक़रार रखा.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर, 1984 को उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे.

एनडीटीवी की ख़बर के अनुसार, अदालत ने सज्जन कुमार के ख़िलाफ़ लड़ने वाली जगदीश कौर की हिम्मत की तारीफ़ करते हुए कहा, ‘पीड़ित को यह एहसास कराना जरूरी है कि कितनी भी चुनौती आए, लेकिन सत्य की जीत होगी.’

कई गवाहों और बचे हुए लोगों ने कांग्रेस नेताओं को सिखों को निशाना बनाने वाली भीड़ का नेतृत्व करते देखा था. सज्जन कुमार कांग्रेस पार्टी के पहले शीर्ष नेता हैं, जिन्हें इस मामले में दोषी करार दिया गया है.

अदालत ने कहा, ‘अपराधियों ने राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठाया. पुलिस की विफलता थी क्योंकि पुलिस पीड़ितों की शिकायतों को दर्ज करने में असमर्थ रही. अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रही थी.’

निचली अदालत द्वारा एक पूर्व कांग्रेस काउंसिलर बलवान खोखर, सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी कप्तान भागमल और तीन अन्य को राज नगर मामले में दोषी ठहराया गया था लेकिन अदालत ने सज्जन कुमार को उस समय बरी कर दिया था. उस समय दोषी ठहराये गए दोषियों ने सजा के फैसले के खिलाफ चुनौती दी है.

निरप्रीत कौर के पिता को भीड़ द्वारा जिंदा जला दिया था. उन्होंने रोते हुए 34 साल बाद न्याय के लिए कानून का धन्यवाद किया.

जगदीश कौर और निरप्रीत कौर ने कहा कि भले ही 34 वर्ष लंबा वक्त होता है लेकिन वे आरोपी का पर्दाफाश करने के लिए प्रतिबद्ध थे और न्याय के लिए उनकी लड़ाई जारी रहेगी.

जगदीश कौर ने कहा, ‘इस फैसले से कुछ राहत मिली है. इन वर्षों में हमने जितना अन्याय झेला है उतना किसी को न झेलना पड़े.’

1984 के दंगों में सज्जन कुमार से जुड़े मामले का घटनाक्रम

31 अक्टूबर, 1984: तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके निवास पर उनके दो अंगरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी.

01-02 नवंबर, 1984: दिल्ली छावनी के राजनगर में भीड़ ने पांच सिखों की हत्या की.

मई, 2000: दंगे से जुड़े मामलों की जांच के लिए जीटी नानावटी आयोग गठित किया गया.

दिसंबर, 2002: सत्र अदालत ने एक मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को बरी कर दिया.

24 अक्टूबर, 2005: सीबीआई ने जीटी नानावटी आयोग की सिफारिश पर एक अन्य मामला दर्ज किया.

01 फरवरी, 2010: निचली अदालत ने आरोपी के तौर पर नामज़द किए गए सज्जन कुमार, बलवान खोखर, महेंद्र यादव, कैप्टन भागमल, गिरिधर लाल, कृष्ण खोखर, दिवंगत महासिंह और संतोष रानी के ख़िलाफ़ समन जारी किया.

24 मई, 2010: निचली अदालत ने छह आरोपियों के ख़िलाफ़ हत्या, डकैती, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, दो समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने, आपराधिक साज़िश एवं भादसं की अन्य धाराओं के तहत आरोप तय किया.

30 मई, 2013: अदालत ने सज्जन कुमार को बरी किया तथा बलवान खोखर, लाल, भागमल को हत्या के अपराध एवं यादव, कृष्ण खोखर को दंगा फैलाने के अपराध में दोषी ठहराया.

09 मई, 2013: अदालत ने खोखर, भागमल और लाल को उम्रक़ैद तथा यादव एवं कृष्ण खोखर को तीन साल की क़ैद की सज़ा सुनायी.

19 जुलाई, 2013: सीबीआई ने सज्जन कुमार को बरी किए जाने के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय में अपील दायर की.

22 जुलाई, 2013: उच्च न्यायालय ने सीबीआई की अर्जी पर कुमार को नोटिस जारी किया.

29 अक्टूबर, 2018: उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा.

17 दिसंबर 2018: उच्च न्यायालय ने कुमार को दोषी ठहराया और ताउम्र क़ैद की सज़ा सुनाई. उसने खोखर, भागमल और लाल को सुनाई गई उम्रक़ैद की सज़ा भी सही ठहरायी तथा यादव एवं कृष्ण खोखर की क़ैद की सज़ा बढ़ाकर दस साल कर दी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)