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तंदूर हत्याकांड: अदालत ने सुशील शर्मा को फौरन रिहा करने का आदेश दिया

साल 1995 में युवा कांग्रेस के पूर्व नेता सुशील शर्मा ने एक पुरुष मित्र से कथित संबंध के शक में अपनी पत्नी नैना साहनी की गोली मारकर हत्या करने के बाद शव के टुकड़े-टुकड़े कर नई दिल्ली के एक रेस्तरां के तंदूर में उन्हें जलाने की कोशिश की थी.

सुशील शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

सुशील शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपनी पत्नी की हत्या के मामले में उम्रक़ैद की सज़ा काट रहे युवा कांग्रेस के पूर्व नेता सुशील शर्मा को जेल से फौरन रिहा करने का शुक्रवार को आदेश दे दिया.

सुशील शर्मा अपनी पत्नी नैना सहानी की हत्या के मामले में उम्रक़ैद की सज़ा काट रहा था. यह घटना 1995 की है.

शर्मा इस मामले में दो दशक से भी ज़्यादा समय क़ैद की सज़ा काट चुका है. जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल की पीठ ने यह आदेश दिया.

शर्मा अब 56 वर्ष का हो चुका है. युवा कांग्रेस के पूर्व नेता सुशील शर्मा ने एक पुरुष मित्र से कथित संबंध पर ऐतराज़ जताते हुए दो जुलाई 1995 को अपनी पत्नी नैना सहानी की गोली मारकर हत्या कर दी थी और फिर उनके शव के टुकड़े-टुकड़े कर नई दिल्ली के एक रेस्तरां की छत पर बने तंदूर में उन्हें जलाने की कोशिश की थी.

उस वक़्त पेट्रोलिंग कर रही पुलिस तंदूर से उठते धुएं के आधार पर वहां पहुंची थी तो पाया कि नैना साहनी के शव के टुकड़े और अधजला शव बरामद किया. सुशील उस वक़्त फ़रार हो गया था, हालांकि पुलिस ने उसे एक हफ़्ते के अंदर गिरफ़्तार कर लिया था.

उस समय ट्रायल कोर्ट के बाद हाईकोर्ट ने सुशील शर्मा को फांसी की सज़ा सुनाई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे उम्रक़ैद में बदल दिया.

यह मामला ‘तंदूर हत्याकांड’ के नाम से जाना जाता है. यह भारत के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मामला है क्योंकि इसमें आरोपी का दोष साबित करने के लिए सबूत के तौर पर डीएनए का इस्तेमाल किया गया और शव के अवशेषों का दूसरी बार पोस्टमॉर्टम किया गया था.

शर्मा ने अपनी रिहाई के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी. अपनी याचिका में उसने कहा था जेल में और पेरोल पर रहने के दौरान उसका व्यवहार अच्छा था और उसने स्वतंत्रता की कभी दुरुपयोग नहीं किया.

बीते 18 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने सवाल किया था कि क्या किसी व्यक्ति को हत्या के अपराध में अनिश्चितकाल तक के लिए जेल में रखा जा सकता है.

उच्च न्यायालय ने सज़ा समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) की सिफ़ारिशों को ख़ारिज और रद्द कर दिया. दरअसल, बोर्ड ने शर्मा की समय से पहले रिहाई के लिए दिए गए अनुरोध को ख़ारिज कर दिया था.

इसके अलावा अदालत ने एसआरबी की सिफ़ारिशों का उप राज्यपाल द्वारा ‘नॉन-स्पीकिंग एफर्मेशन’ भी खारिज कर दिया. हालांकि, उप राज्यपाल सक्षम प्राधिकार हैं.

पीठ ने कहा, ‘इस तरह, हम सरकार को सुशील शर्मा को फौरन रिहा करने का आदेश देते हैं.’

इससे पहले अदालत ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया था और सज़ा में कमी की अवधि सहित दो दशक से अधिक समय तक जेल में काटने के आधार पर हिरासत से रिहाई की मांग करने वाली शर्मा की याचिका पर उसका (दिल्ली सरकार का) रुख़ जानना चाहा था.

शर्मा की ओर से पेश होते हुए वकील अमित सहानी ने कहा कि समय से पूर्व रिहा करने वाले दिशानिर्देश के मुताबिक सिर्फ एक अपराध के लिए उम्रक़ैद की सज़ा काट रहे क़ैदी को 20 साल जेल में रहने के बाद रिहा करना होगा और जघन्य अपराधों के मामले में सज़ा काट रहे दोषियों को 25 साल के बाद राहत दी जाती है.

दिल्ली सरकार के वकील (अपराध) राहुल मेहरा ने कहा कि उप राज्यपाल ने शर्मा को रिहा नहीं करने की एसआरबी की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)