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बिहार: चंपारण सत्याग्रह के आयोजनों के बीच छात्र भूख हड़ताल पर

एक तरफ प्रदेश में चंपारण सत्याग्रह पर आयोजन हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के छात्र भूख हड़ताल पर हैं जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

भूख हड़ताल पर बैठे छात्र

भूख हड़ताल पर बैठे छात्र

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के बीएबीएड-बीएससीबीएड पाठ्यक्रम के विद्यार्थी 18 अप्रैल 2017 से भूख हड़ताल पर हैं. इनमें से कुछ का दाखिला 2013 में और कुछ का नामांकन 2014 में हुआ था. यह चार वर्षीय पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश पर आरंभ किया गया था. पर इन दोनों वर्षों के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) से मान्यता नहीं मिली है.

जिन विद्यार्थियों का नामांकन 2013 में बीएबीएड-बीएससीबीएड में हुआ था उनका यह आख़िरी साल है. मई में सत्रांत परीक्षा होगी. 2014 में दाखिल विद्यार्थियों का भी यह तीसरा साल है. विद्यार्थियों ने अपनी तरफ से भी भरपूर प्रयास किया. विश्वविद्यालय से लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक लिखा-पढ़ी की. विश्वविद्यालय की ओर से यही जवाब हमेशा मिला कि धीरज रखिए, परिणाम सुखद होंगे.

विश्वविद्यालय प्रशासन अब यह कह रहा है कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है. हमने अपना काम कर दिया है. मान्यता देने की प्रक्रिया में मानव संसाधन विकास मंत्रालय, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ही भूमिका है. विद्यार्थियों ने कोई चारा न देख भूख हड़ताल शुरू कर दी है.

उनकी यह मांग है कि अगर विश्वविद्यालय के हाथ में कुछ नहीं है तो विश्वविद्यालय उनकी बात सीधे मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक पहुंचा दे. या तो उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक ले जाए या फिर मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कोई प्रतिनिधि उनसे बात करने के लिए आए.

चूंकि विद्यार्थियों ने भूख हड़ताल शुरू की है इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्थानीय पुलिस को सूचित कर दिया और परिसर में पुलिस का आवागमन तेज हो गया है. हालांकि भूख हड़ताल की सूचना के लगभग चौबीस घंटे बाद ही मेडिकल टीम आ पाई. अब आयुक्त से विद्यार्थियों के प्रतिनिधि-मंडल की बात की जा रही है.

पूर्व में ‘बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय’ और वर्तमान में ‘दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय’ में 2013 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश पर चार वर्षीय बीएबीएड-बीएससीबीएड पाठ्यक्रम की शुरुआत की गई. बीएड से संबद्ध पाठ्यक्रम को मान्यता देने का काम राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) करती है. उपर्युक्त पाठ्यक्रम की मान्यता के लिए एनसीटीई में आवेदन करते-करते तकनीकी वजहों से देर हो गई और आवेदन 2014 में दिया जा सका.

भूख हड़ताल कर रहे छात्रों की तबियत बिगड़ने लगी है.

भूख हड़ताल कर रहे छात्रों की तबियत बिगड़ने लगी है.

इसी बीच 2014 में भी उपर्युक्त पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों का दाखिला लिया गया. ज़ाहिर है कि एनसीटीई से यह मान्यता विश्वविद्यालय की ओर से पिछले प्रभाव से मांगी गई थी. पिछ्ले प्रभाव से मान्यता देने में अनेक तरह की कठिनाइयां हैं. अनेक प्रकार की तकनीकी कार्यवाही की ज़रूरत है. मान्यता संबंधी अधिनियम, परिनियम और अध्यादेशों में संशोधन की आवश्यकता है. यह काम अपनी गति से हो भी रहा है.

विश्वविद्यालय की ओर से भी प्रयास किए गए पर अभी तक मान्यता नहीं मिल सकी है. पिछले साल विश्वविद्यालय में इसी मुद्दे को लेकर विद्यार्थियों ने हड़ताल की तो विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से दिसंबर तक का समय मांगा गया. लेकिन तय समय तक कोई भी नतीजा नहीं आया.

दरअसल 2009 में भारत सरकार की एक योजना के तहत बिहार में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गई. विश्वविद्यालय स्थापित हो गया, पढ़ाई भी शुरू हो गई पर बाद में विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर की जगह को लेकर तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकार में विवाद हो गया. तत्कालीन राज्य सरकार मोतिहारी में विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर के लिए ज़मीन देने के लिए तैयार थी पर केंद्र सरकार को यह स्वीकार न था.

खींचतान चलती रही और  2012 में बिहार में दो केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की गई. 2009 से जारी ‘बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय’ जिसके स्थायी परिसर की जगह गया तय की गई, उसका नाम ‘दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय’ और मोतिहारी में स्थापित होने वाले विश्वविद्यालय का नाम ‘महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय’ हो गया. यह सब होते-होते 2014-15 आ गया. अभी दोनों विश्वविद्यालय क्रमशः किराये के भवनों में गया और मोतिहारी में चल रहे हैं.

मान्यता को लेकर दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में और दूसरे पाठ्यक्रमों में भी समस्याएं रही हैं. 2016 ई. में एमएड में विद्यार्थियों का नामांकन किया गया. पहली कक्षा शुरू होने के दिन ही विद्यार्थियों को यह कहा गया कि आप के पाठ्यक्रम को मान्यता नहीं है इसलिए आप का कोर्स बंद किया जा रहा है. उन्हें एक लिखित पत्र भी दिया गया जिस का आशय यह था कि जब कभी भविष्य में यह कोर्स शुरू होगा तो आप को प्राथमिकता दी जाएगी. गनीमत यही कि उनसे ली गई फीस भी उन्हें वापस कर दी गई!

यही हाल 2015 में आरंभ हुए बीवॉक (कला एवं शिल्प ) कोर्स में हुआ. 2016 में गर्मी की छुट्टियों के बाद विद्यार्थी आए तो यह मौखिक तौर पर कह दिया गया कि आप के पाठ्यक्रम के ढांचे में गड़बड़ी है इसलिए यह कोर्स बंद किया जा रहा है. विडंबना की हद तो तब हो गई जब बीवॉक (कला एवं शिल्प) के विद्यार्थियों को केवल मौखिक तौर पर यह कहा गया कि आप चाहें तो विश्वविद्यालय में जारी किसी दूसरे कोर्स में नाम लिखा सकते हैं. कोई दिक्कत नहीं होगी. सात में से दो विद्यार्थी ने बीएड के उपर्युक्त चार वर्षीय पाठ्यक्रम में अपना नामांकन कराया और बाकी विश्वविद्यालय छोड़ कर चले गए .

भूख हड़ताल कर रहे विद्यार्थियों की हालत लगातार ख़राब हो रही है. उनमें से कुछ का तो बीपी और शुगर लेवल नीचे जा रहा है. इन विद्यार्थियों को सब से अलग-थलग करने की भरपूर कोशिश है. डर का आलम यह है कि हड़ताल की जगह पर यदि दूसरे विषय के विद्यार्थी नज़र आते हैं तो उन के अध्यापक यह कह रहे कि जब क्लास नहीं चल रहा तो आप यहां क्या कर रहे हैं? आप जाकर पढ़ाई कीजिए.

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यहां तक कि हड़ताल कर रहे विद्यार्थियों के जूनियर विद्यार्थी भी हड़ताल की जगह पर पहुंच रहे तो एकाध बार उन्हें भी टोक दिया गया. छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय आने से मना किया जा रहा है. फिर भी छात्रावास और दूसरे विभागों के विद्यार्थी सहयोग कर रहे हैं.

विश्वविद्यालय में कोई छात्र-संघ भी नहीं है. विश्वविद्यालय का शिक्षक समुदाय सदा की तरह चुप है. कुछ का विचार है कि “सब का समय विद्यार्थी क्यों बरबाद कर रहे हैं? वे हड़ताल करें पर हमें अपना काम करने दें.” मानव संसाधन विकास मंत्रालय से खुली बातचीत की एक साधारण मांग के साथ भी शिक्षक विद्यार्थियों के पक्ष में खड़े नहीं हो पा रहे हैं.

सामान्य बातचीत में विद्यार्थियों के प्रति सहानुभूति ज़रूर है पर खुलकर साथ देने की बात सामने नहीं है. अभी सबका ध्यान इस बात पर लगा है कि किसी तरह यह हड़ताल समाप्त हो. फिर देखा जाएगा. विश्वविद्यालय के हाथ में कुछ नहीं है पर उसके पास इतना बड़ा दिल और दृढ़ दिमाग तो होना ही चाहिए कि वह अपने विद्यार्थियों की जायज़ मांग के साथ रहे. यह ‘खेल लड़के-लड़कियों का नहीं है’ इतनी दृष्टि तो विश्वविद्यालय और शिक्षकों के पास होने की हम उम्मीद कर सकते हैं.

(लेखक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं)