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क्यों भारतीय विज्ञान कांग्रेस को भारतीय पुराण कांग्रेस में तब्दील कर दिया गया है?

इससे पहले कि ये छद्म आयोजन इतने बड़े हो जाएं कि देश के तौर पर हमारी भविष्य यात्राओं के मुंह भूत की ओर घुमा दिए जाएं और हमें वहां ले जाकर खड़ा कर दिया जाए, जब हमारे पुरखों ने लज्जा ढकने के लिए आगे-पीछे पत्ते लपेटना भी नहीं सीखा था, हमें होश संभालकर सचेत हो जाने की ज़रूरत है.

जालंधर में आयोजित साइंस कांग्रेस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: पीटीआई)

जालंधर में आयोजित साइंस कांग्रेस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: पीटीआई)

भारत के संविधान की एक धारा 51-ए कहती है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना देश के हर नागरिक का कर्तव्य है. संविधान ने इसके साथ ही वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी राज्य को सौंप रखी है.

इस राज्य के मुखिया के तौर पर हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पद पर आसीन होने के बाद से अब तक यह जिम्मेदारी कैसी ‘शिद्दत’ से निभाते रहे हैं, इसे ठीक से समझना हो तो याद करना चाहिए- अक्टूबर, 2014 में मुकेश अंबानी के बुलावे पर वे एचएन रिलायंस फाउंडेशन के सुपर स्पेशियलिटी हास्पिटल का उद्घाटन करने मुंबई गए तो न सिर्फ डाॅक्टरों बल्कि चिकित्सा विज्ञान के अन्य अनेक पेशेवरों को बेधड़क बता आए कि महाभारत के कर्ण का मां कुंती के उदर के बजाय दूसरी प्रक्रिया से जन्म लेना इसकी जिंदा मिसाल है कि उस वक्त देश में जेनेटिक साइंस चरमोत्कर्ष पर था.

इसी तरह उन्होंने कहा कि वह कोई प्लास्टिक सर्जन ही रहा होगा, जिसने गणेश के कटे हुए सिर की जगह सफलतापूर्वक हाथी का सिर प्रत्यारोपित कर दिया. आज की तारीख में देखें तो उनका यह ‘वैज्ञानिक’ दृष्टिकोण आम देशवासियों तक भले ही न पहुंच पाया हो, उनके मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और संघ परिवारियों को बेतरह प्रिय हो चुका है.

उन सबकी ‘कृपा’ से अब हम बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को सिर धुनने को मजबूर कर डालने वाली ऐसी ‘जानकारियों’ के मोहताज नहीं रहे हैं. अब हम जानते हैं कि मोर इसलिए पवित्र हैं कि वे सेक्स संबंध नहीं बनाते और उनके बच्चे उनके आंसुओं के मिलन से पैदा होते हैं, सौर ऊर्जा का ऐसा ही इस्तेमाल जारी रहा तो सूर्य जल्दी ही ठंडा पड़ जाएगा, जींस पहनने वाली युवतियां हिजड़ों को जन्म देती हैं.

हमारे समय के अप्रतिम भौतिक शास्त्री स्टीफन हॉकिंग वेदों के ज्ञान को आइंस्टाइन से आगे मानते थे, क्रमिक परिवर्तन द्वारा प्रकृति के विकास का चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत सिरे से गलत है, पांच सौ टन लकड़ी जलाकर ओजोन की परत बचाई जा सकती है, घी जलाने से ऑक्सीजन और हवन करने से हाइड्रोजन पैदा होती है, वेदों के कुछ श्लोकों से चंद्रमा पर पानी होने की बात स्पष्ट होती है, गाय का गोबर परमाणु हमले से कारगर ढंग से रक्षा कर सकता है और महाभारत के वक्त, जैसा कि प्रधानमंत्री कहते हैं, जेनेटिक साइंटिस्ट और प्लास्टिक सर्जन ही नहीं थे, इंटरनेट भी हुआ करता था!

केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह और जैव विज्ञानी चार्ल्स डार्विन. (फोटो साभार: फेसबुक/विकिपीडिया)

केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह और जैव विज्ञानी चार्ल्स डार्विन. (फोटो साभार: फेसबुक/विकिपीडिया)

चर्चित लेखक सुभाष गाताडे ने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘चार्वाक के वारिस’ में, जिसे वे समाज, संस्कृति और सियासत पर एक प्रश्नवाचक बताते हैं, प्रधानमंत्री की शुभचिंतक जमातों द्वारा दिन-रात प्रचारित किये जा रहे अज्ञान से भी भयंकर इस ‘ज्ञान’ का आरंभ भारतीय समाज की उस विडंबना में खोजा है, जिसमें वैज्ञानिक चिंतन और उसकी आंतरिक तर्क पद्धति को नहीं, विज्ञान की उपलब्धियों को ही स्वीकारा और अपनाया जाता है.

वैसे ही जैसे उसने लोकतंत्र को मूल्य के तौर पर नहीं बल्कि बहुमत-अल्पमत के तौर पर उसके सबसे भौंडे रूप में गले लगाया हुआ है.

गाताडे के अनुसार, ‘तभी तो देश के कर्णधार वैज्ञानिकों के सम्मेलनों तक में प्रकट तौर पर अवैज्ञानिक व मिथकीय बातों को विज्ञान के सबूत के तौर पर पेश कर वैज्ञानिक चिंतन के प्रसार की गुंजाइशों को, जो पहले से ही न्यून हैं, न्यूनतर करने में सफल हुए जा रहे हैं.’

उनकी यह बात हाल ही में जालंधर के एक निजी विश्वविद्यालय में संपन्न हुई भारतीय विज्ञान कांग्रेस में एक बार फिर सही सिद्ध हुई है. यह कांग्रेस 1914 में देश में विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए स्थापित की गई थी और हर साल जनवरी के प्रथम सप्ताह में इसका सम्मेलन देश का सबसे बड़ा वैज्ञानिक जमावड़ा हुआ करता है.

लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद से अवैज्ञानिक और पोगापंथी तत्वों की अन्य संवैधानिक व गैरसंवैधानिक संस्थानों की तरह इस पर भी कब्जा जमाने की कोशिशें ऐसे-ऐसे रंग दिखाने लगी हैं कि यह कांग्रेस वैज्ञानिक कारणों से कम, अवैज्ञानिक, आध्यात्मिक व पौराणिक आदि कारणों से ज्यादा चर्चित रहने लगी है.

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पाठकों को याद होगा, जनवरी 2015 में उसके मुंबई सम्मेलन में केरल के पायलट ट्रेनिंग स्कूल के प्रिंसिपल आनंद बोडस का दावा था कि प्राचीन काल में ही भारतीयों ने ऐसा एयरक्राफ्ट खोज लिया था, जो अलग-अलग दिशाओं में उड़ सकता था और अलग-अलग ग्रहों पर भी पहुंचा था.

लेकिन इस बार तो हद ही हो गई, जब तमिलनाडु के ‘भक्त’ वैज्ञानिक केजे कृष्णन ने कांग्रेस के मंच से न्यूटन और अल्बर्ट आइंस्टाइन की स्थापनाओं को पूरी तरह गलत ठहराते हुए गुरुत्वाकर्षण तरंगों का नाम बदलकर ‘नरेंद्र मोदी तरंगें’ रखे जाने का दावा कर डाला. यह भी कि अब फिजिक्स में ग्रैविटेशनल लेंसिंग इफेक्ट को ‘हर्षवर्धन इफेक्ट’ के नाम से जाना जाएगा.

इन दावों के आगे-पीछे कई अन्य ‘वैज्ञानिकों’ ने भी पौराणिक कल्पनाओं को आधुनिक विज्ञान के समकक्ष खड़ी करते हुए इस बात तक की परवाह नहीं की कि वे जो कुछ कह रहे हैं, उसका न कोई ठोस वैज्ञानिक आधार है और न ही किसी वैज्ञानिक परिकल्पना से उसे सही सिद्ध किया जा सकता है.

विशाखापटनम स्थित आंध्र यूनिवर्सिटी के कुलपति जी. नागेश्वर राव ने महाभारत के कौरवों का जन्म स्टेम सेल और टेस्ट ट्यूब की तकनीक से हुआ बता डाला तो यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि भगवान राम के पास ‘गाइडेड मिसाइलें’ हुआ करती थीं.

इस ‘द्रविड़ प्राणायाम’ के पीछे उनका मकसद यह जताना था कि स्टेम सेल, टेस्ट ट्यूब व मिसाइल जैसी तकनीकें अतीत के गौरवशाली भारत के लिए कोई नई बात नहीं है.

क्या आश्चर्य कि उनकी यह स्थापना प्रधानमंत्री के ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुसंधान’ के नारे को सार्थक करने से ज्यादा अतीत के उस गौरवगान से जुड़ी हुई है.

अंतर्विरोध देखिये कि जी. नागेश्वर राव अपने अतीतगान में रावण और उसकी लंका को अयोध्या से भी आगे बता गए. उन्होंने कहा कि रावण के पास 24 तरह के एयरक्राफ्ट थे और लंका में उन दिनों एयरपोर्ट भी हुआ करते थे.

सवाल है कि उन्होंने यह क्यों नहीं बताया कि अयोध्या में ऐसे कितने एयरपोर्ट थे? क्या इससे अयोध्या का ‘गौरव’ नहीं बढ़ता?

बहरहाल, उनके अजीबोगरीब वैज्ञानिक निष्कर्षों से गुजरने के बाद किसी के लिए भी यह समझना आसान है कि क्यों क्लैरिवेट एनालिटिक्स द्वारा बनाई गई दुनिया के 4000 वैज्ञानिकों की सूची में भारत के महज 10 वैज्ञानिक शामिल हो पाये हैं.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi addressing a public meeting, at Kedarnath, in Uttarakhand on October 20, 2017.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो: पीआईबी)

जिस देश का प्रधानमंत्री उस हार्वर्ड विश्वविद्यालय का खुल्लमखुल्ला मजाक उड़ायेगा और दकियानूसी भरे अहंकार से अपने कथित हार्ड वर्क को उसके बराबर खड़ा कर देगा, जिसके 186 वैज्ञानिक उक्त सूची में शामिल हैं, उस देश में इससे बेहतर स्थिति की कल्पना कैसे की जा सकती है?

नहीं की जा सकती, इसीलिए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के होमी जहांगीर भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन के रीडर अनिकेत सुले ने इसी विज्ञान कांग्रेस में अपनी प्रस्तुति में प्रतिवाद करते हुए कहा कि अगर किसी सभ्यता के पास स्टेम सेल, टेस्टट्यूब बेबी, गाइडेड मिसाइल और वैमानिकी जैसी उन्नत तकनीकें थीं, तो इससे संबंधित बिजली, धातु विज्ञान और यांत्रिकी के प्रमाण भी तो मिलने चाहिए, तो उसकी अनसुनी कर दी गई- न सिर्फ विज्ञान कांग्रेस में बल्कि संचार माध्यमों में भी.

इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कुमार चक्रवर्ती के ऐसे प्रेजेंटेशनों पर खेद जताने का नोटिस भी किसी ने नहीं लिया.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने ठीक ही ट्वीट किया है कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस का सम्मेलन पहले एक प्रतिष्ठित वार्षिक आयोजन हुआ करता था, लेकिन मोदी सरकार में इसकी प्रतिष्ठा बहुत धूमिल हुई है. अब यह विज्ञान का छद्म आयोजन बनकर रह गया है.

इससे पहले कि उसके छद्म इतने बड़े हो जायें कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस को भारतीय पुराण कांग्रेस में तब्दील करके देश के तौर हमारी भविष्य की यात्राओं के मुंह भूत की ओर घुमा दें, और हमें वहां ले जाकर खड़ा कर दें जब हमारे पुरखों ने लज्जा ढकने के लिए आगे पीछे पत्ते लपेटना भी नहीं सीखा था, हमें होश संभाल लेने और सचेत हो जाने की जरूरत है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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