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अयोध्या को महज़ राम मंदिर विवाद के चश्मे से देखना क्या इसके साथ न्याय करना होगा?

अपनी किताब ‘अयोध्या – सिटी ऑफ फेथ, सिटी ऑफ डिस्कॉर्ड’ में पत्रकार वलय सिंह ने बताया है कि अयोध्या को सिर्फ़ मंदिर-मस्जिद के विवाद के रूप में देखना इसके बहुपक्षीय एवं बहुधार्मिक इतिहास का अपमान करने जैसा है.

वलय सिंह (फोटो: अलेफ बुक कंप

पत्रकार वलय सिंह. (फोटो साभार: ट्विटर)

नई दिल्ली: अयोध्या पिछले तीन से भी अधिक दशक से भारतीय राजनीति के केंद्र में बना हुआ है किंतु क्या क़रीब 3300 वर्ष पुरानी इस आस्था की नगरी को महज़ राम मंदिर विवाद के चश्मे से देखना इसके साथ न्याय करना होगा?

पत्रकार एवं लेखक वलय सिंह इस सवाल का उत्तर नहीं मानते हैं. वह पुराने नगर को केवल राम मंदिर विवाद से परिभाषित करने और एक धर्म के आधार पर देखा जाने से सहमत नहीं हैं.

उनका कहना है कि इस पवित्र शहर को उन घटनाओं के माध्यम से देखे भर जाना जो 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस का कारण बनी, इसके बहुपक्षीय एवं बहुधार्मिक इतिहास का अपमान करने जैसा है.

सिंह की किताब ‘अयोध्या – सिटी ऑफ फेथ, सिटी ऑफ डिस्कॉर्ड’ का हाल ही में विमोचन हुआ है जिसमें उन्होंने कहा है कि मंदिर विवाद ने शहर की विशेषताओं को फीका कर दिया है.

सिंह ने बताया, ‘अयोध्या का विस्तृत इतिहास रहा है जो इस नगर को बौद्ध, इस्लाम एवं जैन धर्म से भी जोड़ता है. चीनी यात्रियों ने बौद्ध इतिहास का प्रमाण भी दिया है. यह एक बड़ा जैन तीर्थ स्थल भी रहा है. अमीर खुसरो अयोध्या आए थे और इसके बारे में लिखा था. इसके समृद्ध इतिहास एवं लोक साहित्य को नज़रअंदाज़ करना शहर को हानि पहुंचाने जैसा है.’

सिंह की इस पुस्तक में अयोध्या के समग्र इतिहास का वर्णन है.

सिंह आगे कहते हैं, ‘अयोध्या को केवल विवादित स्थल के इतिहास रूप में नहीं देखा जाना चाहिए वरना ये इस शहर का अपमान होगा. इस विवाद ने कई परतों को खुलने नहीं दिया है. यह बनाया गया और निर्मित इतिहास है.’

यह किताब सिर्फ़ राम मंदिर बनाने के विवाद के बारे में नहीं है, जहां माना जाता है कि भगवान राम का जन्म हुआ है और जहां 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस तक खड़ी रही, लेकिन अयोध्या के इतिहास का एक व्यापक विवरण है.

पत्रकार वलय सिंह की किताब. (फोटो साभार: ट्विटर/अलेफ बुक कंपनी)

पत्रकार वलय सिंह की किताब. (फोटो साभार: ट्विटर/अलेफ बुक कंपनी)

दिल्ली में रहने वाले पत्रकार वलय सिंह लगभग 3,300 साल पीछे जाते हैं, जब अयोध्या का पहली बार उल्लेख मिलता है. किताब में वे इस शहर के इतिहास की पड़ताल करते हैं. पिछले 1200 सालों में आए उस बदलाव की जानकारी देते हैं जब एक उपेक्षित जगह राजाओं, फकीरों, समाज सुधारकों के लिए महत्वपूर्ण स्थान बन जाती है.

इस किताब में पुराने लेखों और विभिन्न जातियों, समुदायों और धर्मों की प्रमुख हस्तियों के साक्षात्कारों को संकलित किया गया है. यह किताब बताती है कि बीती तीन हज़ार सालों में अयोध्या किस तरह से धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक कट्टरता के बीच का प्रमुख युद्धस्थल बन गया.

सिंह लिखते हैं, ‘एक अर्थ में अयोध्या का इतिहास उत्तर भारतीय हृदयभूमि के इतिहास की कहानी है. एक अन्य अर्थ में यह हिंदू चेतना में वैष्णववाद के विकास का इतिहास है. एक तीसरे अर्थ में यह एक आक्रामक हिंदू सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना की प्रसार का गठन की कहानी है, जिसे 18वीं शताब्दी में उत्तर भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के समय सैन्य शक्ति के रूप में देखा जा सकता है.’

किताब के दूसरे भाग में सिंह ने अयोध्या के हिंसक वर्षों में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके बाद के प्रभाव की चर्चा की है, जिसके माध्यम से दक्षिणपंथी दलों ने चुनावी राजनीति में ज़मीन हासिल की.

मालूम हो कि अयोध्या मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में हैं, जिसकी सुनवाई पिछले हफ्ते 29 जनवरी तक के लिए टाल दी गई, क्योंकि पीठ के सदस्य जस्टिस यूयू ललित ने ख़ुद को मामले की सुनवाई से अलग कर लिया.

आरएसएस, शिवसेना समेत हिंदूवादी संगठन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर अध्यादेश लाने का दबाव बना रहे हैं. इस संबध में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि क़ानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद सरकार की जो भी ज़िम्मेदारी होगी वह उसे पूरा करेगी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)