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आनंद तेलतुम्बड़े को गिरफ़्तार करने की कोशिश इस राजतंत्र के बढ़ते अहंकार का सबूत है

राजतंत्र हम सबको इतना मूर्ख समझ रहा है कि हम विश्वास कर लेंगे कि सामाजिक कार्यकर्ता इस देश में हिंसा की साज़िश कर रहे हैं. यह कहने वाले वे हैं जो दिन-रात मुसलमानों, ईसाईयों और सताए जा रहे लोगों के हक़ में काम करने वालों को शहरी माओवादी कहकर नफ़रत और हिंसा भड़काते रहते हैं.

आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: ट्विटर)

आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: ट्विटर)

हम एक दलदल में फंस गए हैं और नीचे धंसते ही जा रहे हैं. बचाने को कोई हाथ आगे बढ़ता नहीं दिखता. आनंद तेलतुम्बड़े की खुद को गिरफ़्तारी से बचाने के लिए समाज को मदद की पुकार सुनकर हम सब का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए.

एक सभ्य समाज के लिए लिए इससे अधिक पतन और कोई नहीं हो सकता कि एक लेखक और अध्यापक को खुद ही अपनी आज़ादी के लिए चिल्लाना पड़  रहा हो. दो दिन पहले ही फ़िक्र जाहिर होनी चाहिए थी, जो नहीं हुई जब उच्चतम न्यायालय ने आनंद तेलतुम्बड़े की वह अर्जी खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ महाराष्ट्र पुलिस की एफआईआर को रद्द करने की गुजारिश की थी.

गोवा के उनके मकान पर उनकी गैर-मौजूदगी में छापा मारा गया था और उसके बाद यह दावा किया गया था कि वे शहरी माओवादी जाल का एक अहम हिस्सा हैं. राज्य की ओर यह इल्जाम है कि पिछले साल पुणे के करीब भीमा कोरेगांव में एल्गार परिषद के कार्यक्रम के बाद लौटते हुए दलितों पर जो हिंसा हुई थी, वह दरअसल एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी.

पुलिस चाहती है कि अदालत और हम उसके इस दावे पर यकीन करें कि आनंद तेलतुम्बड़े जैसे लोग दलितों को बहका रहे हैं और उन्हें हिंसा के लिए उकसा रहे हैं. राज्य यह चाहता है कि उसके शहरी माओवादी जाल के मज़ाक को गंभीरता से सुनें.

वह यह चाहती है कि हम उसके इस दावे पर भी यकीन करें कि आनंद के ऐसे षड्यंत्र का हिस्सा हैं जिसमें प्रधानमंत्री की हत्या तक की योजना थी. फिक्र यह है कि पुलिस जो जाल बुन रही है उसे कुछ विश्वसनीयता अदालतों की टिप्पणियों से मिलती जान पड़ती है.

उच्चतम न्यायालय ने उनका आवेदन रद्द करते हुए कहा कि जांच का दायरा बड़ा, और बड़ा होता जा रहा है और इसलिए उसे इस मुकाम पर आनंद के खिलाफ एफआईआर रद्द करने की वजह नज़र नहीं आती. आनंद को और मोहलत दी गई है कि वे निचली अदालत में जमानत की अर्जी दें.

इस पर काफी लिखा जा चुका है कि भीमा कोरेगांव के कार्यक्रम के बाद की हिंसा की जांच बिल्कुल उलट  दी गई है. जिन पर हिंसा भड़काने का आरोप था, वे अब खुले घूम रहे हैं.

और तो और स्थानीय अदालत ने उन्हें और भी सभाएं करने की छूट दे दी है. अदालत ने उदारता दिखलाते हुए यह भी कहा है कि उन्हें उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे में हर पेशी में हाजिर होने की ज़रूरत भी नहीं है.

हिंसा के बाद आरोप दलितों की ओर से यह आरोप था कि इसमें संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे नाम के दो व्यक्तियों की साजिश थी जो संघ परिवार से जुड़े हुए हैं. मुंबई मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक़ भीमा कोरेगांव में हिंसा का उकसावा करने में इनका हाथ था.

माओवादियों से संबंध और प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश के आरोप में गिरफ्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन महेश राउत और रोना विल्सन (बाएं से दाएं)

माओवादियों से कथित संबंध और प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश के आरोप में गिरफ्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत और रोना विल्सन (बाएं से दाएं)

पुलिस को इस हिंसा की और इसकी साजिश की जांच करनी थी. उसके बदले उसने पूरे देश में राजनीतिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मार कर दावा किया कि उनमें से एक के कम्प्यूटर पर उन्हें एक ईमेल मिला है जिसमें प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश की बात की जा रही है.

पुलिस द्वारा बरामद यह खत अपने आप में एक मज़ाक है. पुलिस चाहती है कि हम मान लें कि ऐसी बड़ी साजिश करने वाले इतने मूर्ख हैं कि वे इस तरह की ईमेल को पुलिस के हाथ पड़ने के लिए असुरक्षित छोड़ दें.

वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा ने इस खत के झूठ का विस्तार से पर्दाफाश कर दिया था. उनके लेख को पढ़ने से साफ़ हो जाता है कि यह भारतीय पुलिस की उसी पुरानी आदत का हिस्सा है जिसमें वह खुद सबूत पैदा करती है.

इस पर पर्याप्त हैरानी और नाराज़गी जाहिर नहीं की गई है कि अगर मामला प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश जितना बड़ा और गंभीर है तो इसकी जांच सिर्फ महाराष्ट्र पुलिस क्यों कर रही है! देश की बड़ी जांच एजेंसियां कब काम आएंगी?

या षड्यंत्र की यह कहानी भी वैसे ही कपोल कल्पना सिद्ध होगी जैसी वे कहानियां हुई थीं जिन्हें इन प्रधानमंत्री के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते गढ़ा गया था और उनकी आड़ में फर्जी मुठभेड़ों में मुसलमानों को मार डाला गया था. न्यायमूर्ति बेदी की रिपोर्ट पर भी हमने बात नहीं की जितनी करनी चाहिए थी.

तेलतुम्बड़े जैसे विद्वान और लेखक को गिरफ्तार करने की कोशिश इस राजतंत्र के बढ़ते अहंकार का एक सबूत है. वह हम सबको इतना मूर्ख समझ रहा है कि हम विश्वास कर लेंगे कि आनंद, सुधा भारद्वाज, स्टेन स्वामी, शोमा सेन जैसे लोग इस देश में हिंसा की साजिश कर रहे है.

यह वे लोग कह रहे हैं जो दिन रात मुसलमानों, ईसाईयों और सताए जा रहे लोगों के हक़ में काम करनेवालों को शहरी माओवादी कहकर नफरत और हिंसा भड़काते रहते हैं. वे सत्ता में हैं और मान कर चल रहे हैं कि उन्होंने भारत पर कब्जा कर लिया है.

माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर नज़रबंद किए गए कवि वरावरा राव, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील अरुण फरेरा, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वर्णन गोंसाल्विस. (बाएं से दाएं)

कवि वरावरा राव, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील अरुण फरेरा, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वर्णन गोंसाल्विस (बाएं से दाएं) पर माओवादियों से कथित संबंध का आरोप है.

आनंद को अपने लिए बोलना पड़ रहा है, यह हमारे लिए लज्जा का विषय है. वे लिखने और बोलने को आज़ाद रहें, इसके लिए यह बताने की ज़रूरत न होनी चाहिए कि वे कितने प्रबुद्ध हैं, कि उन्होंने कितनी किताबें लिखी हैं, कि लम्बे वक्त तक उन्होंने कॉरपोरेट दुनिया में काम किया है, कि उन्हें देश विदेश बुलाया जाता रहा है, कि वे इस देश के कुछ बड़े बुद्धिजीवियों में शुमार किए जाते हैं, अलावा इसके कि वे दलित बुद्धिजीवी हैं.

इतना काफी होना चाहिए कि आनंद तेलतुम्बड़े को आज़ादी से अपना काम करने का हक़ भारत के संविधान ने दिया है और उसे राज्य के द्वारा गढ़े जा रहे झूठ की आड़ में उनसे छीना नहीं जा सकता.

यह भारत के सभी लिखने पढ़ने वाले लोगों के इम्तेहान का वक्त है. और राजनीतिक दलों के लिए भी. क्या उनके लिए जनतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव लड़ने और उसमें जीतने की जुगत लगाना भर है?

इस घड़ी हमारे विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, अखबारों, पत्रिकाओं की नैतिकता की परीक्षा होगी. क्या वे आनंद तेलतुम्बड़े के लिए बोलेंगे या उनकी आवाज़ को डूब जाने देंगे? इससे साबित होगा कि हम ज़िंदा हैं या सांस लेते मुर्दों का समाज हैं!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)

Categories: भारत, राजनीति

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