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‘पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में काम कर रहीं महिलाएं समाज की रूढ़िवादी सोच को तोड़ती हैं’

दिल्ली में हुए एक कॉन्फ्रेंस में निर्माण कार्य, इलेक्ट्रिशियन, मोटर मैकेनिक, पशु चिकित्सक और कैब ड्राइवर जैसे पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए.

(फोटो साभार: आज़ाद फ़ाउंडेशन)

(फोटो साभार: आज़ाद फ़ाउंडेशन)

नई दिल्ली: बीते कुछ सालों में महिलाएं गैर-पारंपरिक आजीविका के क्षेत्रों में भी जुड़ने लगी हैं. बहुत बड़ी संख्या में तो नहीं लेकिन फिर भी महिलाओं का निर्माण कार्य, इलेक्ट्रिशियन, मोटर मैकेनिक, पशु चिकित्सक और कैब ड्राइवर जैसे पुरुष वर्चस्व वाले व्यवसायों में आना ही श्रम को जेंडर के आधार पर बांटने की सोच को तोड़ता है.

गरीब और हाशिये पर रहने वाली महिलाओं को गैर-पारंपरिक रोज़गार की दिशा में जोड़ने की आवश्यकता और उसमें शामिल चुनौतियों के बारे में चर्चा करने के लिए नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में गैर सरकारी संस्था आज़ाद फाउंडेशन द्वारा तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था.

सम्मेलन में नेपाल, अफ्रीका के अलावा भारत में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, हरियाणा से कुछ महिलाओं ने गैर-पारंपरिक आजीविका से जुड़ने के खुद के अनुभवों को साझा किया.

आज़ाद फाउंडेशन और गैर सरकारी संस्था सखा के फ्लैगशिप कार्यक्रम ‘वूमेन ऑन व्हील्स’ के तहत 1600 से ज्यादा गरीब महिलाओं को परिवहन उद्योग में सफलतापूर्वक बतौर चालक रोजगार देकर सशक्त बनाया गया है. आज़ाद फाउंडेशन के दिल्ली में चार प्रशिक्षण केंद्र हैं.

सम्मेलन में गैर-पारंपरिक आजीविका के क्षेत्रों से जुड़ी महिलाओं ने बताया कि उनके जीवन में आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ क्या बदलाव आए हैं.

इस सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर जयती घोष, आंबेडकर विश्वविद्यालय के जेंडर स्टडीज विभाग की प्रो. कृष्णा मेनन व शैली पांडे, नेपाल की संयुक्त राष्ट्र (यूएन) महिला प्रतिनिधि वेनी कुसुमा, अमेरिका के विन विन स्ट्रेटजीज की सीईओ मारिसा वेसले, अफ्रीकन वूमेन फंड की सीईओ थियो सोवा, जिम्बाब्वे के वीमेंस रिसोर्स सेंटर एंड नेटवर्क की सह संस्थापक हॉप चिगुदु, फिलीपींस से जलमीनारनी हिज़ाज़ी असर्याद समेत अन्य कई शोधकर्ता शामिल रहे.

सम्मेलन में कामकाजी महिलाओं की भागीदारी, गैर-पारंपरिक आजीविका में क्षेत्रों का अनौपचारिकरण, महिलाओं के समक्ष चुनौतियां सहित गैर-पारंपरिक आजीविका में श्रम के जेंडर विभाजन को तोड़ना जैसे विषयों पर चर्चा हुई.

सम्मेलन में यह बात भी सामने आई कि बढ़ती असमानता, संरचनात्मक बाधाओं व शिक्षा और श्रम में लैंगिक असमानताओं के कारण महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है.

महिलाओं के लिए नौकरियों का विकल्प भी बहुत संकीर्ण है जिसमें बहुत अधिक कुशलता की आवश्यकता नहीं होती. इसी कारण से महिलाएं कम कुशल नौकरियों में सीमित हैं और उनकी किसी भी प्रकार से प्रशिक्षित होने की मांगों को पूरा करने के अवसर बहुत कम रह जाते हैं.

इस सम्मेलन में आज़ाद फाउंडेशन की संस्थापक व कार्यकारी निदेशक मीनू वडेरा ने कहा, ‘भारत में कामकाजी महिलाओं की सहभागिता की स्थिति चिंताजनक है, जो केवल 27 फीसदी है. भारत में गरीब महिलाओं के रहन-सहन और घर पर उनके कामकाज के माहौल के साथ इस बात को लेकर धारणा बनी हुई है कि महिलाएं किस तरह का काम कर सकती हैं. इन कारणों से महिलाएं बाहर निकल कर गैर-पारंपरिक रोजगार में नहीं जा पातीं.’

अफ्रीकन वूमेन फंड की सीईओ थियो सोवा ने कहा, ‘महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा के साथ सभी कार्यों में बढ़ावा देने में मदद करने के लिए फंड देने वालों को शिक्षित करने की आवश्यकता है.’

आजीविका ब्यूरो से राजीव खंडेलवाल ने कहा, ‘गैर-पारंपरिक आजीविका के क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं के आंदोलन को मजदूर आंदोलन के साथ आना चाहिए, इससे यह और मजबूत होगा.’

नेपाल की यूएन वूमेन प्रतिनिधि वेनी कुसुमा ने कहा, ‘बढ़ती असमानताएं खराब शासन का संकेत हैं. हमें महिलाओं की स्थिति और भागीदारी में असमानता के विषय पर ध्यान देने की जरूरत है.’

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) से क्लेमेंट चौवेट ने कहा, ‘हमें उन लोगों  की जरूरत है जो महिलाओं को अपने उद्यम विकसित करने में सक्षम बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समर्थन प्रदान करते हैं.’

एक कैब चालक सबिता ने कहा, ‘लड़कियों को लिंग आधारित व्यवसायों द्वारा सीमित किया जाता है क्योंकि हमारा समाज पितृसत्तात्मक है.’

महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा और शोषण पर भी चर्चा की गई. इस सम्मेलन में एक अन्य महत्वपूर्ण बात सामने आयी कि आजाद फाउंडेशन द्वारा की गए सर्वेक्षण में 39% पुरुषों ने माना कि कभी-कभार पत्नी को मारना सामान्य बात है.

आंबेडकर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक सत्र में जेंडर स्टडीज विभाग के छात्र-छात्राओं ने इस बात पर चर्चा की कि विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग व्यवसाय और आजीविका को कक्षा में पढ़ाए जाने वाले सिद्धांतों से कैसे जोड़ कर देखा जा सकता है.

इस सत्र में आंगनबाड़ी महिलाओं की स्थिति व उनके संघर्ष, सुलभ इंटरनेशनल में बतौर सफाई कर्मचारी काम करने वाली महिलाओं की चुनौतियां, महिला कैब ड्राइवरों के अनुभव, सेल्स क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति व महिला नर्सों के जीवन के बारे में चर्चा की गई.

इस सत्र में प्रस्तुत किए गए शोधपत्रों में सामने आया कि समाज में श्रम और कार्यस्थल को जेंडर के आधार पर कुछ इस तरह विभाजित किया गया है कि अगर महिलाएं गैर-पारंपरिक आजीविका क्षेत्रों में आती हैं तो उन्हें बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

महिला कैब ड्राइवर और ई-रिक्शा ड्राइवर को खराब नजर से देखा जाता है क्योंकि समाज में यह सोच गढ़ी हुई है कि महिलाएं गाड़ी नहीं चला सकती हैं. आंगनबाड़ी में महिलाओं को न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता और बहुत काम कराया जाता है. इतना ही नहीं इन महिलाओं को कर्मचारी की श्रेणी में नहीं रखा जाता है. महिलाओं को तरह-तरह की परेशानियों और शोषण का सामना करना पड़ता है.

दिल्ली जनपथ पर काम करने वाली सेल्स विमन ने बताया उनको ख़राब मौसम में किसी शेड की व्यवस्था और शौचालय की व्यवस्था नहीं दी जाती है. इसी तरह से महिला कैब ड्राइवर को भी रात के समय अलग-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

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