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जलवायु परिवर्तन के दायरे में दुग्ध उत्पादन भी, नहीं संभले तो अगले साल तक दिखने लगेगा असर

भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 तक चावल के उत्पादन में चार से छह प्रतिशत, आलू में 11 प्रतिशत, मक्का में 18 प्रतिशत और सरसों के उत्पादन में दो प्रतिशत तक की कमी संभावित है. इसके अलावा एक डिग्री सेल्सियस तक तापमान वृद्धि के साथ गेंहू की उपज में 60 लाख टन तक कमी आ सकती है.

A worker prepares to package a milk from Holstein Friesian cows into retail sachets at the Som milk farm in the outskirts of Mogadishu, Somalia August 1, 2018. Picture taken August 1, 2018. REUTERS/Feisal Omar - RC16ABF2B6B0

(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लोबल वार्मिंग के भारत में असर और चुनौतियों के दायरे में फल और सब्जियों ही नहीं बल्कि दुग्ध भी हैं. जलवायु परिवर्तन के भारतीय कृषि पर प्रभाव संबंधी अध्ययन पर आधारित कृषि मंत्रालय की आंकलन रिपोर्ट के अनुसार अगर तुरंत नहीं संभले तो इसका असर 2020 तक 1.6 मीट्रिक टन दूध उत्पादन में कमी के रूप में दिखेगा.

रिपोर्ट में चावल समेत कई फसलों के उत्पादन में कमी और किसानों की आजीविका पर असर को लेकर भी आशंका जताई गई है.

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से संबद्ध संसद की प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट के हवाले से अनुमान व्यक्त किया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण दूध उत्पादन को लेकर नहीं संभले तो 2050 तक यह गिरावट दस गुना तक बढ़ कर 15 मीट्रिक टन हो जाएगा.

भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा संसद में पेश रिपोर्ट के अनुसार दुग्ध उत्पादन में सर्वाधिक गिरावट उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में देखने को मिलेगी. रिपोर्ट में दलील दी गयी है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण, ये राज्य दिन के समय तेज गर्मी के दायरे में होंगे और इस कारण पानी की उपलब्धता में गिरावट पशुधन की उत्पादकता पर सीधा असर डालेगी.

रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लोबल वार्मिंग से खेती पर पड़ने वाले असर से किसानों की आजीविका भी प्रभावित होना तय है. रिपोर्ट के मुताबिक चार हेक्टेयर से कम कृषि भूमि के काश्तकार महज खेती से अपने परिवार का भरण पोषण करने में सक्षम नहीं होंगे.

उल्लेखनीय है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में खेती पर आश्रित 85 प्रतिशत परिवारों के पास लगभग पांच एकड़ तक ही जमीन है. इनमें भी 67 फीसदी सीमांत किसान हैं जिनके पास सिर्फ 2.4 एकड़ जमीन है.

फसलों पर असर के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 तक चावल के उत्पादन में चार से छह प्रतिशत, आलू में 11 प्रतिशत, मक्का में 18 प्रतिशत और सरसों के उत्पादन में दो प्रतिशत तक की कमी संभावित है. इसके अलावा एक डिग्री सेल्सियस तक तापमान वृद्धि के साथ गेंहू की उपज में 60 लाख टन तक कमी आ सकती है.

फल उत्पादन पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव के बारे में रिपोर्ट के अनुसार सेब की फसल का स्थानांतरण हिमाचल प्रदेश में समुद्र तल से 2500 मीटर ऊंचाई तक हो जाएगा. अभी यह 1250 मीटर ऊंचाई पर होता है.

इसी प्रकार उत्तर भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण कपास उत्पादन थोड़ा कम होने, जबकि मध्य और दक्षिण भारत में बढ़ोतरी होने की संभावना है. वहीं पश्चिम तटीय क्षेत्र केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र तथा पूर्वोत्तर राज्यों, अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप में नारियल उत्पादन में इजाफा होने का अनुमान है.

भविष्य की इस चुनौती के मद्देनजर मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर समिति ने सिफारिश की है कि अनियंत्रित खाद के इस्तेमाल से बचते हुए भूमिगत जलदोहन रोक कर उचित जल प्रबंधन की मदद से सही सिंचाई साधन विकसित करना ही एकमात्र उपाय है. इसके लिए जैविक और जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने की सिफारिश की गयी है.