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सीआईसी के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए पांच में से चार उम्मीदवारों ने नहीं किया था आवेदन

सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों से यह खुलासा हुआ है कि इस पद के लिए आवेदन करने वाले दो वरिष्ठ सूचना आयुक्तों को भी शॉर्टलिस्ट नहीं किया गया था. हालांकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि आवेदन करने वालों में से ही सर्च कमेटी द्वारा शॉर्टलिस्ट किया जाएगा.

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केंद्रीय सूचना आयोग मुख्यालय. (फोटो साभार: cic.gov.in)

नई दिल्ली: मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) का चयन करने के लिए सर्च कमेटी ने जो पांच नाम शॉर्टलिस्ट किए थे उसमें से चार उम्मीदवार ऐसे थे जिन्होंने इस पद के लिए आवेदन ही नहीं किया था. इस पद के लिए आवेदन करने वाले दो वरिष्ठ सूचना आयुक्तों को भी शॉर्टलिस्ट नहीं किया गया था. सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ है.

आरटीआई एक्ट के तहत केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) सर्वोच्च अपीलीय संस्था है. कैबिनेट सचिव के नेतृत्व वाली सर्च कमेटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली तथा वित्त मंत्री अरुण जेटली और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की सदस्यता वाली चयन समिति के समक्ष रखने के लिए पांच नामों को अंतिम रूप दिया था.

सर्च कमेटी में कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा, प्रधानमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव पीके मिश्रा, डीओपीटी के सचिव सी. चंद्रमौली, व्यय विभाग के सचिव अजय नारायण झा, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव अमित खरे और दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के निदेश मनोज पांडा शामिल थे.

रिकॉर्ड के अनुसार दिलचस्प बात यह है कि व्यय विभाग के सचिव ने घोषणा की थी कि उन्होंने सूचना आयुक्त के पद के लिए आवेदन किया था और पीएमओ के साथ विचार-विमर्श के बाद उन्हें खोज समिति में रखा गया था.

सरकार ने मुख्य सूचना आयुक्त के पद के लिए आवेदन आमंत्रित करने के लिए 23 अक्टूबर 2018 को डीओपीटी की वेबसाइट पर विज्ञापन जारी किया था. केंद्रीय सूचना आयोग में सभी तीन आयुक्तों–सुधीर भार्गव, बिमल जुल्का और दिव्य प्रकाश सिन्हा उन 68 आवेदकों में शामिल थे जिन्होंने पद के लिए आवेदन किया था.

दस्तावेज दर्शाते हैं कि कैबिनेट सचिव की अगुवाई वाली समिति ने शॉर्ट लिस्ट करने के लिए पांच उम्मीदवारों में जुल्का और सिन्हा के नाम पर विचार ही नहीं किया था.

उसने पांच सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों–सुधीर भार्गव, पूर्व एमएसएमई सचिव माधव लाल, गुजरात के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव एसके नंदा, प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग के पूर्व सचिव आलोक रावत और पूर्व व्यय सचिव आरपी वातल को शॉर्टलिस्ट किया था, जिनके नाम प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति के पास रखे गए थे.

रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि लाल, नंदा, रावत और वातल ने पद के लिए आवेदन नहीं किया था, लेकिन सर्च कमेटी ने उनके नामों की सिफारिश की.

हालांकि 27 अगस्त, 2018 को सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में डीओपीटी ने खुद कहा था कि जिन लोगों ने पद के लिए आवेदन दायर किया है, उनमें से ही सर्च कमेटी द्वारा लोगों को शॉर्टलिस्ट किया जाएगा.

पारदर्शिता और आरटीआई की दिशा में काम कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि सर्च कमेटी के पास ऐसा कोई भी अधिकार नहीं है कि वो अपनी तरफ से नामों का सुझाव दें.

आरटीआई को लेकर काम करने वाले सतर्क नागरिक संगठन और सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) की सदस्य अंजलि भारद्वाज ने द वायर से कहा, ‘अगर इन्हें अपनी तरफ से ही नियुक्ति करने का मन है तो फिर आवेदन किसलिए मंगाए जाते हैं. आवेदन की आखिरी तारीख क्यों तय की जाती है. कानून में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है. हमें नहीं पता कि अपनी तरफ से नामोंं का सुझाव देने की शक्तियां ये कहां से ले रहे हैं.’

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति ने हालांकि सभी आवेदकों के साथ-साथ सर्च कमेटी द्वारा शॉर्ट लिस्ट किये गए नामों पर विचार किया और भार्गव को पद के लिये चुना. भार्गव को इस महीने की शुरुआत में मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया था.

वहीं केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने पूर्व विधि सचिव सुरेश चंद्रा को आवेदन किए बगैर ही सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किया है. कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा इसकी वेबसाइट पर अपलोड की गई फाइलों का अध्ययन करने से ये खुलासा हुआ है. आरटीआई कार्यकर्ताओं ने सुरेश चंद्रा को केंद्रीय सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्ति को एक ‘मनमानी प्रक्रिया’ करार दिया है क्योंकि उन्होंने इस पद के लिए आवेदन नहीं किया था.

अंजलि भारद्वाज ने बताया कि वो केंद्रीय सूचना आयोग में नियुक्ति के लिए अपनाई गई मनमानी प्रक्रिया और गोपनीयता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली हैं.

भारद्वाज ने कहा, ‘पारदर्शिता की मांग सिर्फ सूचना आयोग तक ही सीमित नहीं है. सरकार सीबीआई, लोकपाल, सीवीसी जैसी बड़ी भ्रष्टाचार निरोधी संस्थाओं में गोपनीय तरीके से नियुक्ति कर रही है. अगर आवेदकों के नाम पहले ही सार्वजनिक किए गए होते तो ये सवाल उठता कि आखिर सुरेश चंद्रा की नियुक्ति कैसे की गई, जब उन्होंने आवेदन ही नहीं किया था. लोकपाल और सीबीआई निदेशक की नियुक्ति को लेकर भी घोर गोपनीयता बरती जा रही है. अपने चहेतों को इन पदों पर बिठाने की सरकार की ये कोशिश है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)