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आपराधिक मानहानि क़ानून ख़त्म होना चाहिए, राजद्रोह क़ानून की हो समीक्षा: जस्टिस लोकुर

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी. लोकुर ने एक कार्यक्रम में कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद जजों की नियुक्तियों को लेकर एक सीमा तय होनी चाहिए.

जस्टिस मदन बी. लोकुर. (फोटो साभार: फेसबुक/National Commission for Protection of Child Rights)

जस्टिस मदन बी. लोकुर. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट से 30 दिसंबर को सेवानिवृत्त हुए जस्टिस मदन बी लोकुर ने बुधवार को कहा कि आपराधिक मानहानि को अपराध के रूप में परिभाषित करने वाले कानून को खत्म किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि राजद्रोह से जुड़ी धारा 124-ए की समीक्षा की आवश्यकता है.

क़ानून और न्यायपालिका पर आधारित न्यूज़ पोर्टल ‘द लीफलेट’ की ओर से ‘भारतीय न्यायपालिका की दशा’ विषय पर हुए एक कार्यक्रम के दौरान सेवानिवृत्त जस्टिस लोकुर ने सुप्रीम कोर्ट से जुड़े कई विषयों पर अपनी राय जाहिर की.

जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस राजेंद्र मेनन को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त नहीं किए जाने पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उन्होंने कहा कि कॉलेजियम द्वारा अपने 12 दिसंबर के फैसले को रद्द करने वह निराश हैं.

30 दिसंबर को जस्टिस लोकुर के सेवानिवृत्त होने के बाद कॉलेजियम ने अपने फैसले को बदलते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी और दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना के नामों की सुप्रीम कोर्ट के लिए सिफारिश कर दी.

जस्टिस लोकुर ने कहा, ‘एक बार हम कोई फैसला लेते हैं तो उसे सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डालते हैं. मैं निराश हूं कि इस मामले में ऐसा नहीं किया गया. उन्होंने कहा, मैं न तो किसी की मंशा पर सवाल उठा रहा हूं और न तो किसी से सफाई मांग रहा हूं, यह मेरा काम नहीं है.’

उन्होंने दावा किया कि जिस ‘अतिरिक्त जानकारी’ के चलते इस निर्णय को बदला गया, उन्हें उसकी जानकारी नहीं थी. उन्होंने कहा, ‘हमें नहीं पता कि 10 जनवरी को कॉलेजियम के सामने किस तरह की अतिरिक्त जानकारी आयी. मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि यह किसी ऐसे विषय के बारे में थी, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता.’

उन्होंने इस संभावना से भी इनकार नहीं किया कि यह जानकारी ‘मानहानिकारक’ हो सकती है. उन्होंने यह जताते हुए कि हाईकोर्ट के हर मुख्य न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया जा सकता, कहा, ‘कॉलेजियम में जो भी होता है, सभी को विश्वास में लेकर होता है. मैं उस विश्वास को नहीं तोड़ने वाला हूं.’

मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था में फेरबदल की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि यह व्यवस्था विफल हुई है. हम इंसानों के साथ काम कर रहे हैं न कि मशीनों के साथ. व्यवस्था में कुछ चीजों में फेरबदल की जरूरत हो सकती है.’

वहीं न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद के आरोपों पर जस्टिस लोकुर ने कहा कि कॉलेजियम बैठकों में स्वस्थ्य बहसें होती हैं जिसमें सभी की सहमतियां और असहमतियां शामिल होती हैं.

यह पूछे जाने पर कि 12 जनवरी, 2018 को देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ की गई ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस से क्या हासिल हुआ, तो जस्टिस लोकुर ने कहा कि इससे सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा प्रणाली में कुछ पारदर्शिता आई है.

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के सवाल पर जस्टिस लोकुर में अपनी अनभिज्ञता जताई. इस पर वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शुक्ला का मामला याद दिलाया जिन्हें हटाए जाने के लिए पिछले साल जनवरी में मुख्य न्यायाधीश ने सिफारिश की थी.

वहीं वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि हाईकोर्ट के एक ऐसे  जज की पदोन्नति पर विचार किया जा रहा था जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे.

हाल में सेवानिवृत्त हुए जजों द्वारा सेवानिवृत्ति के बाद पद स्वीकारने के सवाल पर जवाब देते हुए जस्टिस लोकुर ने ध्यान दिलाया कि कई कानूनों के तहत न्यायाधिकरणों और संवैधानिक संस्थाओं की अध्यक्षता करने के लिए सेवानिवृत्त जजों की आवश्यकता होती है.

उन्होंने कहा कि सभी जजों द्वारा सेवानिवृत्ति के बाद वाली नियुक्तियों को ठुकराने से ऐसी व्यवस्थाएं ठप्प पड़ जाएंगी. अन्यथा कानूनों में बदलाव करने पड़ेंगे. हालांकि इस पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद जजों की नियुक्तियों को लेकर एक सीमा तय होनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि वह सरकार द्वारा दिए गए किसी पद या राज्यसभा के नामांकन को स्वीकार नहीं करेंगे.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चलाए जाने के सवाल पर जस्टिस लोकुर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र बाहर जाने का काम किया है.

उन्होंने कहा, ‘मैं किसी विशेष मामले पर टिप्पणी नहीं करुंगा लेकिन हां, ऐसे मामले में सामने आए हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर गया है. कार्यपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाती है, विधायिका भी जाती है और अब न्यायपालिका भी ऐसा कर रही है. अब समय आ गया है कि हम एक कदम पीछे जाएं.’

जस्टिस केएम जोसेफ की नियुक्त को लेकर हुए विवाद का जिक्र करते हुए जस्टिस लोकुर ने पूछा, ‘आप क्या करेंगे जब सरकार महीनों तक किसी फाइल को दबाकर बैठ जाए. ऐसी संभावना है कि सरकार इसलिए उस फाइल को दबाकर बैठी है क्योंकि वह किसी खास जज को नहीं चाहती है. उन्होंने कहा कि ऐसी प्रणाली होनी चाहिए जिसमें समयसीमा का सख्ती से पालन हो.’

जस्टिस लोकुर से सवाल पूछा गया कि राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों से जजों को मिलना-जुलना चाहिए या दूरी बनाकर रखना चाहिए. इस पर उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता है कि इस तरह की धारणा सही है. इस तरह की अलगाव की स्थिति में आप जान ही नहीं पाएंगे कि आखिर चल क्या रहा है. कोई जज एकांतवासी नहीं हो सकता है.’

पिछले आठ सालों में सुप्रीम कोर्ट में दलित या आदिवासी जजों की नियुक्ति न किए जाने के सवाल पर जस्टिस लोकुर ने दावा किया कि उनमें से कोई भी जज इतना वरिष्ठ नहीं है जिसकी नियुक्ति हो सके.