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बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर होने का दावा करने वाले पुरातत्वविद केके मुहम्मद को पद्मश्री सम्मान

डॉ. केके मुहम्मद ने मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ में दावा किया है कि अयोध्या में 1976-77 में हुई खुदाई के दौरान मंदिर होने के प्रमाण मिले थे.

डॉ. केके मोहम्मद (फोटो: फेसबुक)

डॉ. केके मुहम्मद (फोटो: फेसबुक)

नई दिल्ली: हाल ही में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा 112 लोगों को पद्म पुरस्कार देने का ऐलान किया गया. इसमें से एक नाम पुरातत्वविद डॉ. केके मुहम्मद का भी है.

केके मुहम्मद दरअसल वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने दावा किया था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष मिले हैं.

न्यूज़ 18 के अनुसार, डॉ. केके मुहम्मद ने मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ में दावा किया था कि अयोध्या में 1976-77 में हुई खुदाई के दौरान मंदिर के अवशेष होने प्रमाण मिले थे. ये खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक प्रोफेसर बीबी लाल के नेतृत्व में की गई थी. उस टीम में मुहम्मद भी एक सदस्‍य थे.

मुहम्मद ने अपनी किताब में लिखा था, ‘जो कुछ मैंने जाना और कहा है, वो ऐतिहासिक सच है. हमें विवादित स्थल से 14 स्तंभ मिले थे. सभी स्तंभों में गुंबद खुदे हुए थे. ये 11वीं और 12वीं शताब्दी के मंदिरों में मिलने वाले गुंबद जैसे थे. गुंबद में ऐसे 9 प्रतीक मिले हैं, जो मंदिर में मिलते हैं.’

मुहम्मद ने ये भी कहा था, ‘खुदाई से साफ हो गया है कि मस्जिद एक मंदिर के मलबे पर खड़ी की गई थी. उन दिनों मैंने इस बारे में कई अंग्रेजी अखबारों में भी लिखा था, लेकिन मुझे ‘लेटर टू एडिटर वाले कॉलम’ (अखबार में बहुत छोटी जगह) जगह दी गई थी.’

मुहम्मद मानते हैं कि अयोध्या मामले को उन लोगों से बचाए जाने की जरूरत है, जिन्हें लगता है ताजमहल शिव मंदिर हैं. उनका ये भी मानना है कि मुसलमानों को अयोध्या को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए, क्योंकि उनके पास मक्का और मदीना है.

मुहम्मद 2012 में रिटायर होने के बाद हैदराबाद स्थित आगा खान ट्रस्ट में बतौर प्रोजेक्ट निदेशक काम कर रहे हैं.

वामपंथ से जुड़े चिंतकों की आलोचना करते हुए मुहम्मद ने अपनी किताब में लिखा था कि इन लोगों ने इस मामले को इतना उलझा दिया, वरना से मामला कब का सुलझ गया होता.

इसके अलावा उन्होंने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तत्कालीन सदस्य प्रोफेसर इरफान हबीब, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा, एस. गोपाल जैसे इतिहासकारों की आलोचना करते हुए कहा कि इन सभी ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट को भी गुमराह करने की कोशिश की.

उन्होंने अपनी किताब में नफरत फैलाने की बात पर कहा था कि हिंदू धर्म में सांप्रदायिकता मौलिक नहीं बल्कि एक प्रतिक्रिया है. गोधरा ऐसी प्रतिक्रिया का एक उदाहरण था.