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राजस्थान: समायोजन के नाम पर प्राथमिक स्कूल बंद, दो साल से बिना शिक्षा घर बैठे हैं बच्चे

राजस्थान में पिछली वसुंधरा राजे सरकार ने क़रीब 20,000 प्राथमिक सरकारी स्कूलों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में मर्ज कर दिया था. इस फैसले का लगभग 10 लाख बच्चों पर असर हुआ.

राजस्थान के बाड़मेर ज़िले के दूधियाकलां गांव में दो साल पहले स्कूल बंद हो जाने से अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

राजस्थान में बाड़मेर ज़िले के दूधियाकलां गांव में दो साल पहले स्कूल बंद हो जाने से अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

जयपुर: सरकारें चुनकर आती हैं ताकि देश की अवाम को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और एक बेहतरीन मुस्तकबिल दे सकें, लेकिन राजस्थान में बाड़मेर जिले के दूधियाकलां गांव में अल्पसंख्यक समुदाय के तकरीबन 45 बच्चे अपनी ही सरकार से छले गए हैं.

राजस्थान में पिछली वसुंधरा राजे सरकार में इस गांव के प्राथमिक स्कूल को कम नामांकन और समायोजन का हवाला देकर बंद कर दिया गया. इन बच्चों की किताबें 2016 से बस्तों में बंद हैं.

किताबों के बंद होने के साथ-साथ इनका भविष्य भी उसी बस्ते में बंद हो गया है. गांव के करीब 70 मुस्लिम परिवार स्कूल फिर से खोलने के लिए अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अब तक स्कूल फिर से नहीं खोला जा सका है.

इस मुस्लिम बाहुल्य गांव में रहने वाले लोगों का कहना है कि नई बनी कांग्रेस सरकार ने बंद हुए स्कूलों को फिर से खोलने की बात की है, लेकिन इस लिस्ट में हमारे स्कूल का नंबर आएगा या नहीं ये नहीं जानते. गांव में एक मदरसा भी है लेकिन उसमें न तो कोई पढ़ाने वाला है और न ही कोई सुविधा. राजस्थान मदरसा बोर्ड से भी इस मदरसे को कोई मदद नहीं मिलती.

बच्चे अपना दिन बकरियां चराने या खेलने में ख़र्च कर रहे हैं

मोशन ख़ान की तीन बेटियां करामत (7), मदीना (6) और जमला (8) रोज़ाना स्कूल जाती थीं, लेकिन एक दिन अचानक स्कूल बंद हो गया. स्कूल में पढ़ाने वाले इकलौते शिक्षक ने भी आना बंद कर दिया मोशन ने तीनों बेटियों को घर बिठा लिया.

करामत तीसरी, मदीना दूसरी और जमला चौथी कक्षा में पढ़ती थीं, लेकिन अब करामत, मदीना और जमला जैसे गांव में 55-60 बच्चे हैं, जो पढ़ना चाहते हैं, लेकिन स्कूल नहीं होने की वजह से नहीं पढ़ पा रहे.

ग्रामीणों का कहना है कि जब स्कूल बंद हुआ था तब क़रीब 45 बच्चे थे जो अब 2 साल में बढ़कर क़रीब 60 हो गए हैं. ये बच्चे अपना दिन बकरियां चराने या खेलने में ख़र्च कर रहे हैं.

गांव के शाबू ख़ान ख़ुद भले किसान हों लेकिन शिक्षा के महत्व को जानते हैं. इसीलिए सरकार को स्कूल चालू करवाने के लिए कई बार पत्र लिख चुके हैं, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला.

शाबू कहते हैं, ‘स्कूल में एक ही शिक्षक था जिसने बच्चों की कम संख्या दिखाकर बंद करवा दिया, लेकिन हमारे बच्चे पढ़ना चाहते हैं. कुछ बच्चे जो पैदल जा सकते हैं, वे पास के गांवों में पढ़ने चले जाते हैं, लेकिन जो छोटे हैं वो 3-4 किमी पैदल चलकर कैसे जाएं?’

स्थानीय पत्रकार भुवनेश राव कहते हैं, ‘इस स्कूल को फिर से खुलवाने के लिए हमने स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को कई बार लिखकर दिया, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिलता है. अल्पसंख्यक समुदाय के 45 बच्चों को भाजपा सरकार ने पढ़ाई से वंचित करवा दिया. हालांकि अब उम्मीद है कि स्कूल फिर से शुरू हो, लेकिन तय नहीं है.’

हालांकि कांग्रेस सरकार ने राजस्थान में सत्ता में आते ही बंद हुए स्कूलों को फिर से खोलने की बात कही है और इसके लिए सरकार ने हर ज़िले से बंद हुए स्कूलों के बारे में सूचनाएं भी मंगवानी शुरू कर दी है.

इसके बाद आई जानकारियों की समीक्षा की जाएगी और जिन स्कूलों का फिर से शुरू होना जरूरी होगा वही स्कूल खोली जाएंगे। इस संबंध में कुछ दिन पहले राजस्थान के शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा था कि ‘स्कूलों को फिर से खोलने के संदर्भ में अभी समीक्षा की जा रही है. कितने स्कूल खोले जाएंगे यह अभी तय नहीं हुआ है’.

मालूम हो कि, राजस्थान में पिछली वसुंधरा सरकार ने क़रीब 20,000 प्राथमिक सरकारी स्कूलों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में मर्ज कर दिया था. भाजपा सरकार के इस निर्णय का काफी विरोध भी हुआ, लेकिन सरकार ने किसी की नहीं सुनी.

भाजपा सरकार के इस फैसले का लगभग 10 लाख बच्चों पर असर हुआ. बाड़मेर ज़िले के 651 प्राथमिक स्कूल भी इस व्यवस्था में बंद हो गए थे. इन बंद हुए स्कूलों में दूधियाकलां विद्यालय भी एक था.

प्रारंभिक शिक्षा रिपोर्ट कार्ड 2016-17 के मुताबिक राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी प्राथमिक स्कूलों में 2015-16 की तुलना में नामांकन एक लाख से कम हुए. 2015-16 में ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में 13,65,927 नामांकन हुए और यह 2016-17 में घटकर 12,64,574 ही रह गया.

दूधियाकलां स्कूल के बारे में बाड़मेर ज़िले के ज़िला शिक्षा अधिकारी (प्रारंभिक) कन्हैया लाल ने बताया, ‘सरकार ने स्कूलों को फिर से खोलने के लिए अभी सिर्फ़ सुझाव और सूचनाएं मांगी हैं. हमने शिक्षा निदेशालय, बीकानेर को बाड़मेर ज़िले में बंद हुए सभी 651 प्राथमिक स्कूलों की जानकारी भेज दी है. दूधियाकलां गांव के स्कूल का नाम भी उस लिस्ट में शामिल है.’

उन्होंने कहा, ‘सरकार के लिए यह महत्व नहीं रखता कि बच्चे हिंदू हैं या मुसलमान. अगर नियम विरुद्ध स्कूल बंद हुआ है तो उसे फिर से खोला जाएगा.’

वहीं, प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय, बीकानेर के असिस्टेंट डायरेक्टर किशनदान चारण का कहना है, ‘अभी सरकार ने समीक्षा के लिए सिर्फ सूचना मांगी हैं, समीक्षा के बाद ही कुछ बता पाएंगे कि कितने स्कूल खोले जाएंगे.’

स्कूल खोलने के नाम पर बीजेपी-कांग्रेस में राजनीति शुरू

बंद हुए सरकारी प्राथमिक स्कूलों को फिर से शुरू करने के लिए हालांकि कांग्रेस ने अभी भले सूचनाएं मंगानी ही शुरू की है लेकिन इस मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई है.

भाजपा प्रवक्ता जीतेन्द्र श्रीमाली का कहना है, ‘कांग्रेस ने चुनावी बातों को ध्यान में रख कर कई ऐसी जगह स्कूल खोल दिए जहां ज़रूरत ही नहीं थी, लेकिन उन स्कूलों में भारी असमानता थी. भाजपा सरकार ने समायोजन की नीति अपनाई ताकि बच्चों को ज़्यादा से ज्यादा सुविधाएं और फैकल्टी मिल सकें. पास-पास के स्कूलों को मर्ज किया गया था. जब स्कूलों को मर्ज किया गया था तब स्थानीय जन प्रतिनिधियों और लोगों से राय ली गई थी.’

उन्होंने कहा, ‘दूधियाकलां जैसे एक-दो उदाहरण हो सकते हैं लेकिन भाजपा ने जनता के पैसे की बचत की जो सही जगह उपयोग में नहीं आ रहा था. अब कांग्रेस लोकसभा चुनावों के लिए यह सब कर रही है. ज़रूरी यह है कि इसका फायदा जनता को मिल सके.’

वहीं, कांग्रेस प्रवक्ता सत्येन्द्र राघव कहते हैं, ‘भाजपा ने राजस्थान में शिक्षा को बर्बाद कर दिया था. स्कूलों को फिर से खोलने को कांग्रेस ने घोषणा पत्र में वादा किया था और कैबिनेट की पहली ही मीटिंग में बंद हुए स्कूलों को फिर से खोलने की बात रखी गई. अब संबंधित विभाग में प्रक्रिया चल रही है. भले वक्त लगे लेकिन कांग्रेस सरकार बंद हुए स्कूलों को फिर से खोलेगी.’

हालांकि सरकारों और पार्टियों की इस राजनीति के बीच सच तो यही है कि दूधियाकलां गांव के 45 से ज़्यादा मुस्लिम बच्चों के हाथ में जहां पढ़ने के लिए किताब और लिखने के लिए कलम होनी चाहिए थी, उनके हाथों में बकरियां चराने के लिए छड़ी है और दिनभर खेलते रहने के लिए साइकिल का पहिया.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)