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चीफ जस्टिस, जस्टिस सीकरी के बाद जस्टिस रमना ने नागेश्वर राव मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया

जस्टिस एनवी रमना ने ये कहते हुए सुनवाई करने से मना कर दिया कि वे नागेश्वर राव के बेटी की शादी में गए थे. राव को सीबीआई का अंतरिम निदेशक नियुक्त करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है.

एम. नागेश्वर राव. (फोटो साभार: फेसबुक)

एम. नागेश्वर राव. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस एके सीकरी के बाद अब एक अन्य जज जस्टिस एनवी रमना ने भी सीबीआई के अंतरिम निदेशक के रूप में एम. नागेश्वर राव की नियुक्ति के खिलाफ कॉमन कॉज द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस रमना ने ये कहते हुए सुनवाई करने से मना कर दिया कि वे राव के बेटी की शादी में गए थे. इस तरह जस्टिस रमना तीसरे जज हैं जिन्होंने नागेश्वर राव की नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया है.

इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील दुष्यंत दवे से जस्टिस एके सीकरी ने कहा था, ‘कृपया मेरी स्थिति को समझें. मैं ये मामला नहीं सुन सकता हूं.’

मालूम हो कि एके सीकरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उस उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति का हिस्सा थे जिसने अलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक की पद से हटाने का फैसला किया था. इस फैसले को लेकर काफी आलोचना हुई थी और जस्टिस एके सीकरी पर भी सवाल उठे थे.

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो के प्रमुख के रूप में पूर्व सीबीआई विशेष निदेशक राकेश अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया है. 

गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) कॉमन कॉज ने एम. नागेश्वर राव को सीबीआई का अंतरिम निदेशक नियुक्त करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है.

पहले ये मामला मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ के पास गया था. लेकिन उन्होंने बीते 21 जनवरी को हुई सुनवाई के दौरान ये कहते हुए खुद को इस मामले से अलग कर लिया कि वह नए सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए 24 जनवरी 2019 को उच्च स्तरीय समिति की बैठक में भाग ले रहे हैं, इसलिए वे इस मामले में सुनवाई के लिए पीठ का हिस्सा नहीं हो सकते हैं.

इसके बाद इस मामले को जस्टिस एके सीकरी के पास भेजा गया लेकिन उन्होंने भी इसकी सुनवाई करने से मना कर दिया है.

इस मामले में आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज सह-याचिकाकर्ता हैं, जिसमें ये आरोप लगाया गया है कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में सरकार पारदर्शिता का पालन नहीं कर रही है.

याचिका में कहा गया है कि नागेश्वर राव की नियुक्ति उच्च स्तरीय चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर नहीं की गई थी, जैसा कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (डीएसपीई) के तहत अनिवार्य है.

10 जनवरी, 2019 के आदेश में कहा गया है कि मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने नागेश्वर राव को ‘पहले की व्यवस्था के अनुसार’ नियुक्त करने की मंजूरी दी है.
हालांकि पहले की व्यवस्था यानी 23 अक्टूबर, 2018 के आदेश ने उन्हें अंतरिम सीबीआई निदेशक बनाया था और 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा मामले में इस आदेश को रद्द कर दिया था.

हालांकि, सरकार ने खारिज किए गए आदेश पर सीबीआई के नागेश्वर राव को एक बार फिर अंतरिम निदेशक नियुक्त कर दिया.

याचिका में कहा गया है कि सरकार उच्चाधिकार प्राप्त समिति की सिफारिशों के बिना सीबीआई निदेशक का प्रभार नहीं दे सकती. इसलिए, सरकार द्वारा उन्हें सीबीआई निदेशक का पदभार देने का आदेश गैरकानूनी है और डीएसपीई की धारा 4 ए के तहत नियुक्ति प्रक्रिया के खिलाफ है.

याचिका में राव की नियुक्ति को रद्द करने की मांग के अलावा सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विशिष्ट तंत्र बनाने के लिए भी निर्देश देने की मांग की गई है.

याचिका में कहा गया है कि दिसंबर 2018 में, सरकार ने सीबीआई निदेशक के नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की थी क्योंकि आलोक वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी, 2019 को समाप्त होने वाला था.

दिसंबर 2018 में, अंजलि भारद्वाज ने आरटीआई अधिनियम के तहत विभिन्न आवेदन दायर किए और नियुक्ति प्रक्रिया की जानकारी मांगी. हालांकि सरकार ने गोपनीयता बरकरार रखते हुए कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया.

याचिका में कहा गया, ‘नियुक्ति प्रक्रिया के बारे में जानकारी रोकने के प्रयास में, सरकार ने इनमें से प्रत्येक आरटीआई आवेदनों का एक ही प्रकार से जवाब दिया.’