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इस्लामिक आतंकवाद के बारे में ये तीन दलीलें देना बंद कीजिए

सभी मुस्लिम ऐसे नहीं हैं, वहाबियों का दोष है और हिंसा की बात करने वाली आयतों के जवाब में शांति को बढ़ावा देने वाली आयतों का जिक्र करना सुविधाजनक तर्क गढ़ने जैसा है.

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इराक के रक्का में आईएसआईएस आतंकी. (फाइल फोटो : रॉयटर्स)

9/11 की घटना के बाद से आतंकवाद से जुड़े शोध और संबद्ध गतिविधियों में काफी बढ़ोतरी हुई है. मुख्यधारा तथा अकादममिक मीडिया, सेमिनारों और सम्मेलनों में इससे संबंधित सामग्री का भी खूब उत्पादन हुआ है.

इन सबका मकसद एक ऐसे विमर्श का विकास करना है, जो इस समस्या की समझ विकसित करे और फिर इसका समाधान करे. लेकिन, करीब चार साल से आतंकवाद और प्रति-आतंकवाद (काउंटर टेररिज्म) का अध्येता होने के नाते मैंने यह महसूस किया है कि यह विमर्श कुछ गलत धारणाओं का शिकार बना हुआ है.

मैं पहला व्यक्ति नहीं हूं, जिसे इस बात से शिकायत है. आतंकवाद और/या प्रति आतंकवाद के विद्वानों ने आलोचनात्मक तरीके से इस क्षेत्र में हो रहे अध्ययन की प्रकृति को लेकर आत्मचिंतन किया है और इसके कई बिंदुओं से अपनी नाखुशी प्रकट की है.

खासतौर पर मेरी समस्या इस्लाम और इस्लामिक आतंकवाद के आपसी रिश्ते को लेकर कुछ विद्वानों (जिनमें ज्यादातर मुस्लिम हैं) के बहस के तरीके से है.

2016 के ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स के मुताबिक, आतंकवाद से होने वाली 74 फीसदी मौतों के पीछे आईएसआईएस, बोको हरम, तालिबान और अल-कायदा का हाथ था.

ये सारे संगठन धार्मिक चरमपंथी विचारों के पोषक हैं. वर्तमान दौर के आतंकवाद के धार्मिक आयाम के कारण विद्वानों का एक बड़ा तबका यह समझने की कोशिश कर रहा है कि कैसे इस्लामी आतंकी संगठन धर्म का इस्तेमाल एक ऐसे नैरेटिव का निर्माण करने के लिए करते हैं, जो कमजोर व्यक्तियों को आकर्षित कर लेता है.

यही कारण है कि धर्म के विद्वान, महत्वपूर्ण धार्मिक शख्सियत और मौलवी आदि इस अनुशासन का हिस्सा बन गये हैं.

एक भारतीय थिंक टैंक द्वारा हाल ही में धार्मिक चरमपंथ की चुनौती से निपटने के तरीके खोजने के मकसद से आयोजित सम्मेलन में बड़ी संख्या में मुस्लिम शोधकर्ता, मौलवी और इस्लाम तथा प्रति-आतंकवाद के विद्वानों का जमावड़ा लगा.

निश्चित तौर पर ऐसी कोशिशों के पीछे की मंशा क़ाबिलेतारीफ़ है, लेकिन अक्सर ऐसा भी लगता है जैसे इनमें भाग लेने वाले विद्वान इस्लामी आतंकवाद के लिए बहाने ढूंढ रहे हैं.

ऐसे ज्यादातर आयोजन चैटमैन हाउस नियम के तहत होते हैं, इसलिए मैं इसमें शामिल लोगों की पहचान नहीं उजागर करूंगा. लेकिन पाठकों की सुविधा के लिए मैं यह जरूर नोट करना चाहूंगा कि जो विचार मुख्यधारा के मीडिया में दिखाए जाते हैं, वे कई बार थिंक टैंकों के बंद दरवाजों के पीछे दी गयी दलीलों को प्रदर्शित करते हैं.

इसका सबसे हालिया उदाहरण द अटलांटिक में आया एक लेख है, जो आईएसआईएस की धार्मिक जड़ों की तलाश करता है. इस लेख पर काफी बहस भी हो चुकी है.

इसके लेखक ने पीटर बर्गेन (जिनकी ओसामा बिन लादेन पर लिखी गयी किताब में लादेन को ‘आधुनिक धर्मनिरपेक्ष जगत की पैदाइश बताया गया था.) और बर्नार्ड हेकल (जिन्होंने लेखक से कहा कि वैसे मुस्लिम जो आईएसआईएस की धार्मिक जड़ों से इनकार करते हैं वे शर्मिंदा और सही राजनीतिक बयान देने वाले लोग हैं, जिनका अपने धर्म को लेकर नजरिया हवा मिठाई की तरह यानी मीठा मगर खोखला है’.) के साक्षात्कारों के आधार पर अपने तर्क तैयार किये हैं.

‘सभी मुस्लिम ऐसे नहीं हैं’, यह एक भटकाने वाली बात है

‘सभी मुस्लिम ऐसे नहीं हैं’- यह दलील पहली और सबसे अहम समस्या है. यह ‘सभी मर्द ऐसे नहीं हैं’ की तरह ही एक विषय से भटकानेवाली दलील है और किसी भी तरह से बहस को आगे नहीं बढ़ाती.

भले ही आंकड़े ये साबित करते हों कि सभी मुस्लिम चरमपंथी विचारधाराओं का समर्थन नहीं करते हैं, मगर इस क्षेत्र के विद्वानों और पर्यवेक्षकों को यह जानने के लिए कि ‘सभी मुस्लिम आतंकवादी नहीं हैं’, वास्तव में आंकड़ों की जरूरत नहीं है.

जो विद्वान इस दलील का इस्तेमाल करते हैं, वे दरअसल खासतौर पर अपनी धार्मिक पहचान के कारण खुद को आतंकवाद नामक शै से दूर दिखाने की कोशिश कर रहे होते हैं.

इस्लामी आतंकवाद की समस्या उन लोगों से जुड़ी नहीं है, जो आतंकवादी नहीं हैं. इसलिए यह सफाई देने की जगह कि सभी मुस्लिम चरमपंथी नहीं हैं, बेहतर यह है कि उन व्यक्तियों पर ध्यान केंद्रित किया जाए, जो इसका समर्थन करते हैं.

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(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

एक ऐसी दुनिया में जिसमें इस्लाम भय (इस्लाम फोबिया) जनता में सर्वत्र व्याप्त है, अध्येताओं को यह समझना होगा कि ‘सभी मुस्लिम नहीं’ अब एक स्थापित तथ्य है और जरूरत इससे आगे बढ़ने की है.

‘दोष वहाबियों पर मढ़ दो’

कई विद्वान और उदारवादी मुस्लिम पर्यवेक्षक एवं लेखक इस्लामी आतंकवाद का दोष इस्लाम के भीतर के कुछ पंथों, मुख्यतः वहाबीवाद और सलाफीवाद पर मढ़ देते हैं.

उदाहरण के लिए पॉलिटिको में आये एक लेख में कहा गया है, ‘वहाबियों ने अपने मदरसों की मदद से पूर्वी और पश्चिमी एशियाई लोगों को बरगलाने और उनके मत परिवर्तन की रफ्तार तेज कर दी है’.

यहां तक कि भारत में भी कई ऐसे उदारवादी मुसलमान हैं, जो यह विचार रखते हैं कि सलाफीवाद और वहाबीवाद जैसे धर्मशास्त्रों ने ऐसे माहौल का निर्माण किया है, जिसने निश्चित अंतराल पर जनसंहार को अंजाम देना मुमकिन बनाया है.

समस्या तब और विकट हो जाती है, जब सरकार द्वारा नियुक्त किये गये वरिष्ठ लोग भी ऐसे ही विचारों के साथ बहस में कूद पड़ते हैं.

उदाहरण के लिए, ब्रिटिश अमेरिकी सुरक्षा सूचना परिषद के सलाहकार और सांस्कृतिक आसूचना संस्थान (कल्चरल इंटेलीजेंस इंस्टीट्यूट) के निदेशक यूसफ बट ने वहाबीवाद को ‘इस्लामी आतंकवाद का स्रोत’ करार दिया है.

हां, ये सही है कि वहाबीवाद और सलाफीवाद इस्लामी पंथों में संभवतः सबसे ज्यादा पुरातनपंथी हैं. और खासतौर पर वहाबीवाद कुछ अरब देशों से मिलने वाली राजनीतिक और वित्तीय मदद के बल पर पूरे विश्व में फैल गया है.

यह भी एक तथ्य है कि आतंकी समूह, अक्सर अपने मकसद को जायज ठहराने के लिए वहाबी और सलाफी इतिहास के उदाहरणों का गलत संदर्भों में हवाला देते हैं.

लेकिन मैं यह समझने में नाकाम रहा हूं कि आखिर इन पंथों को बार-बार इस्लामी आतंकवाद का स्रोत बताकर अध्येता लोग क्या साबित करना चाहते हैं?

चलिए, बस मानने के लिए, हम इस तथ्य को नकार दें कि पुरातनपंथी मुस्लिमों के चरमपंथी विचारधारा का समर्थक होने संबंधी धारणा के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं है, और यह मान लें कि सभी वहाबी या सलाफी या तो आतंकवादी हैं या आतंकवादी बनने की राह पर हैं या उग्रवादी मकसदों के समर्थक हैं.

सवाल है, इससे आगे का रास्ता क्या है? आखिर खास पंथों पर आरोप मढ़ देना आतंकवाद विरोधी नीति बनाने में हमारी मदद किस तरह कर सकता है? क्या हमें अब इन पंथों के पूरी तरह खात्मे की तैयारी शुरू करनी चाहिए?

ऐसी स्थितियों में एक जवाब जो अक्सर आता है, वो ये कि हमें निश्चित तौर पर सूफीवाद जैसे शांतिवादी पंथों को बढ़ावा देना चाहिए और तथाकथित ‘उग्रवादी’ पंथों में सुधार लाना चाहिए.

सम्मेलन कक्षों में अमनपसंद, उदारवादी मुस्लिमों से घिरे होकर सुधार की जरूरत का उपदेश देना बेहद आसान है.

इस बात की कल्पना कीजिए कि आप इन पंथों के अनुयाइयों के पास जाकर यह कहते हैं कि उनकी मान्यताएं खतरनाक हैं, और उन्हें इसमें बदलाव लाना चाहिए.

जब कमरे में कोई वहाबी या सलाफी धर्म गुरु आपकी बात काटने के लिए मौजूद न हो, तो इन विश्वासों को हिंसक या आदिमयुगीन बताना आसान है. वास्तविकता यह है कि ऐसी दलीलें सलाफी और वहावी मुस्लिमों की निंदा करने का एक तरीका मात्र है.

इससे आगे, कुछ पंथों को शांतिवादी और दूसरों को हिंसक बताना एक नुकसानदेह बंटवारा है, खासतौर पर तब जब तथाकथित हिंसक पंथ से वास्ता रखनेवाले लोगों का बहुमत हिंसक नहीं है. ऐसे कदम सिर्फ वैसे तबकों को थोड़ा और अलग-थलग में मददगार होते हैं, जिनमें चरमपंथी भावनाएं सबसे ज्यादा व्याप्त हैं.

‘आयतों की लड़ाई’

आखिरी बात, हिंसा की बात करने वाली आयतों के जवाब में शांति को बढ़ावा देने वाली आयतों को उद्धृत करना विद्वानों की सामान्य आदतों में शुमार हो गया है.

इससे इस धारणा को गलत ठहराने में कोई मदद नहीं मिलती कि हिंसा का विचार (भले ही वह तोड़ा-मरोड़ा, भ्रष्ट किया गया हो) धार्मिक ग्रंथों में मौजूद है.

किसी की दलील के पक्ष में आयतों का चुनाव करके, भले यह आयत हिंसा को बढ़ावा देती हो या शांति का पाठ पढ़ाती है- विद्वान लोग सिर्फ उन साक्ष्यों से संवाद कर रहे हैं जो कहानी के एक पक्ष को समर्थन देते हैं.

यह किसी भी तरह से इस्लामी आतंकवाद की समस्या को समझने या उसे सुलझाने की दिशा में हमारी मदद नहीं करता. इस बिंदु पर हमें इस बात की ओर ध्यान देना चाहिए कि इस्लाम दूसरे अब्राहमी धर्मों की तरह किताबों का धर्म है. इसलिए किताबों को कौन पढ़ रहा है और किस तरह से पढ़ रहा है, इससे आखिरकार यह तय होता है कि धर्म किस रूप में प्रकट होगा.

किसी किताब का उसके पाठकों के बगैर कोई अस्तित्व नहीं है. इसलिए शब्दों की ओर देखने की जगह उन लोगो की ओर देखना उपयोगी होगा, जो इन किताबों को पढ़ रहे हैं- न सिर्फ अपने लिए, बल्कि अपने अनुयाइयों के लिए भी.

क्या है रास्ता

आज जरूरत इस बात की है कि प्रति-आतंकवाद (काउंटर टेररिज्म) पर शोधरत समुदाय इस बात के लिए रजामंद हो कि धर्म भी बस एक और विचारधारा है- जैसे राष्ट्रवाद और मार्क्सवाद हैं- जिसका इस्तेमाल ऐसे नैरेटिव के निर्माण के लिए किया जाता है, जिसकी मदद से ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ा जा सके.

A militant Islamist fighter waving a flag, cheers as he takes part in a military parade along the streets of Syria's northern Raqqa province June 30, 2014. The fighters held the parade to celebrate their declaration of an Islamic "caliphate" after the group captured territory in neighbouring Iraq, a monitoring service said. The Islamic State, an al Qaeda offshoot previously known as Islamic State in Iraq and the Levant (ISIL), posted pictures online on Sunday of people waving black flags from cars and holding guns in the air, the SITE monitoring service said. Picture taken June 30, 2014. REUTERS/Stringer (SYRIA - Tags: POLITICS CIVIL UNREST CONFLICT) - RTR3WKMT

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

मार्था क्रेनशॉ, ब्रुस होफमैन, मार्क सेजमैन और जॉन होर्गन जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों ने शोध के सहारे चरमपंथीकरण और खास सांस्कृतिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक शक्तियों के बीच के रिश्तों को स्थापित किया है.

यह शोध यह बताने की कोशिश करता है कि चरमपंथीकरण के पीछे काम करने वाली असली समस्या समाज के कुछ तबकों में व्याप्त असंतोष है.

आतंकवादी समूह ऐसे असंतुष्ट लोगों को जमा करते हैं और विचारधारा के लिए मरने-मारने के लिए तैयार करते हैं. इसे वे नये रंगरूटों की समस्या के समाधान के तौर पर पेश करते हैं. धर्म का इस्तेमाल ऐसे सुविधाजनक तर्क गढ़ने के लिए किया जाता है, जो उनके हिंसक कार्यों को जायज ठहरा सकें.

अगर कोई सरकार वास्तव में कोई आतंक विरोधी नीति बनाना चाहती है, तो उसे अपने कुछ नागरिकों द्वारा अनुभव किये गये अन्यायों और शिकायतों को समझने की दिशा में संसाधन लगाना चाहिए, जिसका इस्तेमाल करके आतंकी समूह असंतुष्ट लोगों को हिंसक विचारधाराओं की ओर आकर्षित करते हें.

लेकिन ऐसा करने के लिए सरकार को यह कठोर तथ्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आतंकवाद का जन्म मौजूदा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असंतोष से होता है.

यह एक स्थापित तथ्य है कि आतंकी संगठन रंगरूटों की भर्ती करने के लिए धर्म को गलत तरीके से पेश करते हैं. अध्येताओं को आपस में इस मुद्दे पर झगड़ने की जरूरत नहीं है कि कौन गलत तरीके से इन ग्रंथों की व्याख्या कर रहा है.

वे आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली गलत व्याख्या के बारे में चाहे जो भी समझें, ये समूह धर्म का इस्तेमाल अपने मकसद के लिए करते रहेंगे.

अकादमिक जगत को यह समझने में ज्यादा ध्यान लगाना चाहिए कि आखिर इस्लाम के इन युद्धोन्मादी संस्करणों की सामाजिक रचना किस तरह से हो रही है?

जैसा कि ऑस्ट्रेलिया के डेविड राइट-नेविले, जो कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आतंकवाद के विशेषज्ञ हैं, कहते हैं,

‘मजहब के हिंसक संस्करण अनोखे/अद्वितीय नहीं हैं. बल्कि वे विश्वासों की श्रेणियों के तौर पर अस्तित्व में रहते हैं, जिसे बाद की आधुनिकता (लैटर मॉडर्निटी) की मूर्ति से काटकर निकाला गया है. दूसरे शब्दों में कहें, तो तार्किक व्यक्ति एक ऐसे अर्थवान तंत्र की तलाश में, जो लगातार पेचीदा होते जा रहे और लोगों को अलग-थलग करते संसार को समझने की शक्ति दे सके, सचेत तौर पर कट्टरतावाद का निर्माण करता है.’

मौजूदा दौर के अध्ययनों को देखते हुए ऐसा लगता है कि विद्वान लोग यह मानकर बैठे हैं, कि किसी धर्म के भीतर ऐसी भटकाने वाली व्याख्याएं आसानी से उपलब्ध हैं, जिनका हाशिये के वंचित लोगों के द्वारा इस्तेमाल हो सकता है.

विद्वानों के लिए ये बेहद जरूरी है कि वे इस मान्यता की जांच करें और इस बात का अध्ययन करें कि इन हिंसक संस्करणों का विकास कैसे होता है?

वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में धर्म और पहचान के किसी भी अन्य रूप को हिंसा से अलग करके देखना निहायत जरूरी है. चूंकि इसके बीच में शोधकर्ता भी आ जाते हैं, इसलिए ऐसा करना अक्सर एक चुनौतीपूर्ण होता है.

पहचान आधारित हिंसा का अध्ययन करते वक्त शोधकर्ता का निर्णय अक्सर खुद उसके/उसकी पहचान से प्रभावित होता है. आतंकवाद के कर्ता-केन्द्रित विचार से दूर रहकर इससे बचा जा सकता है.

दूसरे शब्दों में अध्येताओं को आतंकवाद को समाज के खास पंथों द्वारा असुरक्षित महसूस करने की प्रतिक्रिया में की गयी हिंसा के तौर पर नहीं देखना चाहिए. ऐसा करना ऐसी दलीलों की ओर लेकर जाता है जो हिंसा के प्रयोग को जायज ठहराती है.

इससे विचारों का एक चक्र शुरू होता है, जिसकी शुरुआत इस सोच से होती है कि ‘हर असंतुष्ट व्यक्ति हिंसा का रास्ता अख्तियार नहीं करता.’ और यह लोगों को रक्षात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करता है.

इस चक्र को बनाए रखने और बढ़ाने की जगह आतंकवाद विरोधी अध्ययनों को हिंसा की प्रकृति पर ही अपना ध्यान लगाना चाहिए. अगर राजनीतिक हिंसा की कोई कार्रवाई जनता के बीच डर पैदा कर सकती है, तो यह आतंकवाद है, इस बात की परवाह किये बगैर कि इसके पीछे कौन और क्यों है?

(अर्श दानिश नई दिल्ली स्थित सुरक्षा एवं रणनीतिक थिंक टैंक सेंटर फॉर एयर पॉवर स्टडीज में रिसर्चर हैं.)

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