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मणिकर्णिका में आज के उग्र-राष्ट्रवाद का अक्स है

बॉलीवुड भले ही अवसरवादी और रीढ़विहीन नज़र आता हो लेकिन अलग-अलग नज़रिया रखने वाले इसके सदस्य अपने देश की मार्केटिंग और उससे पैसे बनाने के मामले में एक-दूसरे से कोई मतभेद रखते नहीं दिखते.

Manikarnika Film FB

फिल्म के एक दृश्य में कंगना रनौत (फोटो साभार: फेसबुक/ManikarnikaTheFilm)

कंगना रनौत के सह-निर्देशन में बनी फिल्म मणिकर्णिका की शुरुआत 1842 की झांसी से होती है. एक शुरुआती दृश्य में फिल्म के ही नाम वाली नायिका (रनौत) एक बाघ का शिकार कर रही है. जंगली जानवर दहाड़ता है और छलांग लगाता है; नायिका अपने तीर का निशाना साधती है और तीर चलाती है. बाघ उसके पांवों में गिर जाता है, मगर वह मरा नहीं है.

मणिकर्णिका ने उसे सिर्फ जख्मी किया था. गांव वालों को बचा लिया जाता है, जानवर भी जिंदा रहता है और नायिका अपनी बात को साबित करती हैः संक्षेप में कहें, तो यह स्टारडम की भाषा है- जो कि अब तक पुरुष सितारों का इलाका रहा है. (टाइगर जिंदा है फिल्म में भी ऐसा ही दृश्य था.)

मणिकर्णिका यथास्थिति की भाषा को बदलने की कोशिश नहीं कर रही है- यह सिर्फ इसे दोहरा रही – और सही तौर पर कहें तो उसका उत्सव मना रही है. बस उनका चश्मा नया है.

रनौत आज्ञाकारी भाव से बॉलीवुड सितारों के पदचिह्नों पर चलती हैं. कई दृश्य, जिनका एक तरह से वजूद फिल्म से बाहर है- मणिकर्णिका के साहस और संकल्प को स्थापित करते हैं. कई बार ऐसा लगता है कि रनौत एक किरदार को निभाने की जगह कैमरे के लिए प्रस्तुति दे रही हैं- मानो एक बड़ा विस्तृत ऑडिशन दे रही हों.

एक क्षण वे अनुभवी लड़ाकों के साथ तलवार लड़ा रही होती हैं; दूसरे ही क्षण वे उनके पास से छलांग लगा रही होती हैं और एक हाथी पर सवार हो रही होती हैं. वे घूरती हैं, चेतावनी देती हैं और विरोध करती हैं. वे घोड़ों को काबू में करती हैं, एक बछड़े को बचाती हैं, एक रानी होने के बावजूद गांववालों के साथ नाचती हैं. वे कुछ भी गलत नहीं कर सकती हैं.

जैसा कि सुपरस्टार वाली ज्यादातर फिल्मों के साथ होता है, यहां शख्सियत, शख्स की तरफ से बोलती है. एक दृश्य में एक ब्रिटिश अधिकारी अंग्रेजी नहीं जानने के कारण मणिकर्णिका का मजाक उड़ाता है. इस पर उनका एक छोटा-सा एकालाप शुरू होता हैः मैं अंग्रेजी पढ़ सकती हूं. यह सिर्फ महज एक भाषा है. सिर्फ शब्द.’

जब उनका एकालाप समाप्त होता है, एक दूसरा अधिकारी कहता है, ‘वे रानी हैं.’ बहुत खूब.

लेकिन यह देखते हुए कि मणिकर्णिका 1857 की एक अहम किरदार रानी लक्ष्मीबाई के इर्द-गिर्द घूमती है, इस पीरियड ड्रामा के पास अपने आप से बड़ा होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था.

इसे हमारा ध्यान राष्ट्र की ओर आकर्षित करना था. इसे दोहराव के सहारे किया गया है, जो कि इस फिल्म का बार-बार इस्तेमाल किया जानेवाला हथियार है. मणिकर्णिका में मातृभूमि’ के प्रति एक किस्म की दीवानगी है. अलग-अलग स्वर, और अलग-अलग संदर्भों में इसका जिक्र आया है, जो एक संदेश को दोहराता है, जो बहुत ही साफ है.

एक आदर्श किस्म का अतीत सामान्य तौर पर वर्तमान पर बहस करने का एक बहाना होता है. मणिकर्णिका का राष्ट्रवाद, जो इसके वर्तमान संस्करण से अलग नहीं है, पर एक संकीर्ण चश्मा चढ़ा हैः यह उच्च जातीय, (अधिकांशतः) हिंदू और भगवा रंग में रंगा हुआ है.

फिल्म के शुरुआती हिस्से में, हमें मणिकर्णिका के बारे में बताया जाता है कि ‘वह एक ब्राह्मण है, लेकिन उसमें क्षत्रिय होने के सारे गुण हैं.’ वह युद्ध का शंखनाद संस्कृत में करती है. उसके राज्य- जो मराठा साम्राज्य का हिस्सा है- के झंडे पर हनुमान सुशोभित हैं.

यह बात अलग है कि मराठों के असली झंडे या तो सादे थे, उन पर सिंह का चित्र हुआ करता था. दोतरफा गोलाबारी के बीच में, मणिकर्णिका अपने सिपाहियों की जान को जोखिम में डालकर एक मंदिर की रक्षा करती है.

जब उनका सहयोगी (अनिल जॉर्ज) एक भेदिया निकल जाता है, तब लक्ष्मीबाई का सेनापति गुलाम गौस खान (डैनी डैंग्जोपा) उसे कहता है, ‘तुमने सिर्फ अपने देश के साथ ही गद्दारी नहीं की है, बल्कि हमारे धर्म के साथ भी गद्दारी की है’- यहां बिना किसी प्रयोजन के राष्ट्रवाद को आस्था से जोड़ दिया गया है. (एक दूसरे जासूस, जो हिंदू है, की कारस्तानी को इस तरह से नहीं आंका गया है.)

लेकिन अगर आप बॉलीवुड के नए राष्ट्रवाद से वाक़िफ़ हैं, तो इतिहास से जुड़ी होने के कारण मणिकर्णिका सौम्य होने का एहसास देती है. फिल्म के निर्देशकों के पास पैमाने की एक पैनी नजर है- कई दृश्य, खासतौर पर महलों या युद्धभूमि वाले, नीचे से, तिरछे कोण से फिल्माए गए हैं, जो भव्यता बढ़ाने का काम करते हैं.

कुछ संवाद सुरुचिपूर्ण ढंग से अतिनाटकीय हैं: लय में बंधी पंक्तियां, से गर्व टपकता है. सेट काफी भव्य हैं और लाइटिंग नियंत्रित है, जो सामान्य को नाटकीय बना देते हैं.

हालांकि पंचम स्वर में की जानेवाली घोषणाओं और आह्वानों के बीच कुछ दृश्यों का चुप-सा आत्मविश्वास आपको चौंकाता है, खासकर उस दृश्य में, जहां लक्ष्मीबाई के पति महाराजा गंगाधर राव (जिस्सू सेनगुप्ता) लाइब्रेरी में हैं और एक यांत्रिक (मेकैनिकल) लिफ्ट का इस्तेमाल करते हुए एक ऊंची शेल्फ पर रखी उनकी (रानी की) पसंदीदा किताब तक उन्हें ले जाते हैं.

लेकिन ऐसे क्षण छोटे भटकाव हैं. इस फिल्म की जान अतिनाटकीयता यानी मेलोड्रामा, खासकर युद्ध के दृश्यों, में बसती है, जो इसे उठाती भी है, मगर साथ ही साथ उसे गर्त में भी ले जाती है.

इसमें कई ठूंसे हुए दृश्य और गैर-जरूरी गीत हैं, जो मणिकर्णिका की लय को भंग करते हैं. एक जानी हुई कहानी और लोकप्रियतावादी थीम पर बनी फिल्म को इससे ज्यादा की दरकार थी.

लेकिन वैसे मौकों पर भी जब यह फिल्म बिखराव का शिकार होती नजर आती है, रनौत दृढ़ निश्चय से भरी हुईं और बंधनमुक्त नजर आती हैं, जिनका दृश्यों पर एक आत्मविश्वास भरा नियंत्रण दिखता है और जो एक मजबूत प्रस्तुति देने में कामयाब रही हैं. यह सब समझ में आनेवाला है.

रनौत, जो बॉलीवुड में मुखर और मुसीबत खड़ी करने वाली के रूप में जानी जाती हैं, को इंडस्ट्री ने खुले दिल से स्वीकार नहीं किया है. वो कहती हैं कि उन्हें किसी खान की जरूरत नहीं है, इंडस्ट्री में पर बोलती हैं और टीवी शो में झगड़ लेने से गुरेज नहीं करतीं.

अपने साथियों के उलट रनौत इंडस्ट्री के लिए बाहरी हैं, जो कई किरदारों के लिए स्वाभाविक पसंद नहीं हैं.

दूसरी तरफ, देशभक्ति हर किसी को बराबर मौके देती है. बॉलीवुड भले ही अवसरवादी और रीढ़विहीन हो, लेकिन इसके सदस्यों में, भले ही वे कितने बंटे हुए क्यों न हो, अपने देश की मार्केटिंग करने और उससे पैसा बनाने के मामले में एक-दूसरे से कोई मतभेद नहीं है.

यह निश्चित तौर पर उनके बारे में काफी कुछ बताता है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण तरीके से यह उजागर करता है कि वे अपने दर्शकों के बारे में क्या सोचते हैं.

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