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उत्तर प्रदेश: सवर्णों ने नहीं निकलने दी दलित की बारात

मथुरा के नौहझील थाना क्षेत्र का मामला. दुल्हन के परिजनों का आरोप है कि रविवार को वाल्मीकि समुदाय की एक लड़की की शादी थी, जहां गांव के दबंग ब्राह्मणों ने बारात को आने से रोका. पुलिस का कहना है कि ब्राह्मणों के माफ़ी मांगने के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है.

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उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के नौहझील थाना क्षेत्र के एक गांव में कुछ दबंगों ने अनुसूचित जाति समुदाय की युवती की शादी में बाधा डालने की कोशिश की. उन्होंने दूल्हे की बारात नहीं चढ़ने दी, जिसके बाद बिना बारात चढ़ाए ही शादी हुई.

टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर के मुताबिक, पीरगढ़ी टप्पा गांव के जाटव महेश कुमार की शादी मुसमुना गांव में वाल्मीकि समाज की एक लड़की के साथ रविवार को होनी थी. पुलिस ने बताया कि इसी दौरान कुछ ब्राह्मणों ने दूल्हे की बारात निकलने नहीं दी.

बारात के साथ रहे दुल्हन के परिजनों ने बताया कि उन्होंने विवाह स्थल से कुछ 500 मीटर पहले एक ट्रैक्टर ट्रॉली  देखा, जिससे रास्ता रोका गया था.

दुल्हन के चाचा विजयेंद्र सिंह ने कहा, ‘हमने ब्राह्मणों से निवेदन किया कि वे ट्रैक्टर ट्रॉली हटा लें और बारात को निकलने दें लेकिन उन्होंने हमारी जाति को लेकर गाली दी और परिवार के लोगों के साथ बदतमीजी की.’

उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्होंने 100 नंबर पर फोन किया. इस पर ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने ट्रैक्टर ट्रॉली हटा ली लेकिन उनमें से कुछ युवकों ने डीजे को बंद करा दिया और बारात के साथ आए बैंड वालों का सामान को छीन लिया.

सिंह ने कहा, ‘उनके इस उकसावे का हम जवाब दे सकते थे लेकिन शादी की वजह से हमने कुछ नहीं किया और बिना बारात और डीजे के ही लड़के वाले लड़की के घर पहुंचे.

उन्होंने यह भी बताया कि गांव में अधिकतर आबादी जाटव समुदाय की है और कुछ ही घर ब्राह्मणों के हैं.

सिंह ने आगे बताया, ‘सोमवार को हम थाने में शिकायत दर्ज कराने पहुंचे लेकिन सभी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वृंदावन में होने वाली रैली में व्यस्त थे इसलिए हम वापस लौट गए. हालांकि जब हम दोबारा पहुंचे तो पुलिस ने मध्यस्थता की. ब्राह्मण परिवार के माफी मांगने पर समझौता हो गया.’

नौहझील थाना प्रभारी श्याम सिंह ने कहा कि मामला खत्म हो गया है. उन्होंने दावा किया है कि ब्राह्मणों ने बारात को रोका नहीं था बल्कि तेज आवाज में संगीत बजाने पर आपत्ति जताई थी क्योंकि उनके बच्चों की परीक्षा थी.

इससे पहले दलित समुदाय की बारात रोके जाने का एक अन्य मामला बीते साल कासगंज में सामने आया था. अप्रैल महीने के शुरुआत में दलित जोड़े की शादी में घोड़े पर चढ़ने को लेकर विवाद हुआ था. 20 अप्रैल को होने वाली निज़ामपुर गांव में शादी में दूल्हे के घोड़ी से बारात लाने को लेकर गांव के उच्च जाति समुदाय के लोगों ने आपत्ति जताई थी.

निज़ामपुर की सरपंच शांति देवी ने कहा था कि निज़ामपुर में ठाकुर समुदाय के घरों के सामने से कभी भी दलित और जाटवों की बारात नहीं गई. फिर कैसे उच्च जातियों के घरों के सामने से दलितों की बारात जा सकती है?

पुलिस और प्रशासन द्वारा बारात की अनुमति न मिलने से दूल्हे ने इस विवाद के चलते इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटाया था, जिसके बाद शर्तों के साथ अनुमति दे दी गई थी.

मार्च 2018 में गुजरात के भावनगर में एक 21 वर्षीय युवक प्रदीप राठौड़ को घोड़े की सवारी करने के चलते कथित रूप से पीट-पीटकर मार डाला गया था.

जबकि अप्रैल महीने में भीलवाड़ा के गोवर्धनपुर गांव में दलित दूल्हे को घोड़ी चढ़ने पर पीटा गया था और उसी गांव के कुछ लोगों ने उसे घोड़ी से उतरने के लिए मज़बूर भी किया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)