भारत

देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने संबंधी टिप्पणी पर मेघालय हाईकोर्ट को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

मेघालय हाईकोर्ट के जस्टिस एसआर सेन ने दिसंबर 2018 के एक फ़ैसले में कहा था कि बंटवारे के बाद भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था. इस टिप्पणी को हटाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई रंजन गोगोई की बेंच ने हाईकोर्ट से जवाब मांगा है.

New Delhi: A view of the Supreme Court of India in New Delhi, Monday, Nov 12, 2018. (PTI Photo/ Manvender Vashist) (PTI11_12_2018_000066B)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के जस्टिस सुदीप रंजन सेन की एक विवादित टिप्पणी हटाने के लिए दायर याचिका पर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया है.

लाइव लॉ के मुताबिक, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ ने सोमवार को मेघालय हाईकोर्ट के रजिस्ट्री को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया. दिसंबर 2018 में एक फैसले में जस्टिस सेन ने कहा था कि 1947 में देश के विभाजन के साथ ही भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने सोना खान व अन्य की याचिका पर मेघालय हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. याचिका में दलील दी गई है कि हाईकोर्ट जस्टिस सेन के फैसले में कानूनी कमियां हैं और यह ऐतिहासिक रूप से भ्रामक है.

यह मामला मेघालय हाईकोर्ट के जस्टिस सेन के उस फैसले से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक देश घोषित कर दिया था लेकिन भारत तभी से धर्म के आधार पर बंटा है और उसे भी खुद को हिंदू देश के रूप में मान्यता देनी चाहिए थी लेकिन  भारत धर्मनिरपेक्ष देश बना रहा.

याचिका में कहा गया है कि जज के इस कथन से नागरिकता कानून का उल्लंघन होता है और यह भारत को हिंदुओं का और हिंदूओं के लिए देश समझने का मामला बनाता है.

याचिका में जस्टिस सेन को न्यायिक कार्यों से हटाने की मांग की गई थी लेकिन पिछले सप्ताह चीफ जस्टिस के नेतृत्व में पीठ ने इस अनुरोध पर विचार करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता से कहा था कि वह याचिका में संशोधन कर जस्टिस सेन की इस  विवादित टिप्पणी को हटाने का अनुरोध करें.

जस्टिस सेन का यह बयान 12 दिसंबर को सेना में भर्तियों के लिए डोमिसाइल सर्टिफिकेट से इनकार करने से संबद्ध फैसले में आया था. जस्टिस सेन ने अपने फैसले में कहा था, ‘भारत ने रक्तपात से स्वतंत्रता हासिल की है और इससे सर्वाधिक पीड़ित हिंदू और सिख रहे, जिन्हें अपने पूवर्जों की संपत्ति, अपनी जन्मस्थली छोड़कर भागना पड़ा और हम इसे कभी नहीं भूलेंगे.’

उन्होंने कहा, ‘हालांकि मैं गलत नहीं होऊंगा, अगर मैं कहूं कि जब सिख आए तो उन्हें पुनर्वास के लिए सरकार से मदद मिली लेकिन हिंदुओं के साथ ऐसा नहीं हुआ. इसलिए यह कहना सही नहीं है कि भारत को अहिंसा से आजादी मिली. हमें आजादी हिंसा के जरिए ही मिली, जहां लाखों की संख्या में हिंदू और सिखों को अपनी जिंदगी, अपनी संपत्ति, अपनी जमीन और आजीविका गवानी पड़ी.’

जज ने भारत को इस्लामिक देश बनने से बचाने के लिए मोदी सरकार में विश्वास जताते हुए कहा, ‘मैं यह स्पष्ट कर दूं कि किसी  को भी भारत को एक इस्लामिक देश बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, अन्यथा यह भारत और विश्व के लिए कयामत का दिन होगा. मुझे यकीन है कि नरेंद्र मोदी के तहत केवल यही सरकार इसकी गंभीरता को समझ सकती है.’

अदालत ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, कानून मंत्री और सांसदों से एक कानून कारित करने की अपील की, जिसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदुओं, सिखों, जैनियों, बौद्धों, पारसियों, ईसाइयों, खासी और गारो को बिना किसी दस्तावेज के उन्हें देश का नागरिक बनाए जाने की अनुमति दी जाए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)