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क्या आधार के सुरक्षित होने की बात निराधार है?

पिछले कुछ समय में आधार से जुड़ी लाखों लोगों की निजी सूचनाएं लीक होने से आधार के सुरक्षित होने के दावे पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.

फोटो: पीटीआई

फोटो: पीटीआई

मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने कहा है कि झारखंड में सरकारी वेबसाइट से लोगों के आधार नंबर और सूचनाएं लीक हो जाना कोई तात्कालिक गड़बड़ी का मसला नहीं है. यह संबंधित प्राधिकरणों की दीर्घकालिक लापरवाही का परिणाम है. हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक, उन्होंने कहा, ‘यह घोर लापरवाही का मामला है, यह कोई अस्थायी गड़बड़ी है.’

23 अप्रैल को देश भर के मीडिया में ख़बर छपी थी कि झारखंड के 14 लाख पेंशनभोगियों के अाधार नंबर से जुड़ी सूचनाएं जैसे नाम, पता, खाता नंबर वगैरह लीक हो गए हैं. हालांकि, एक दिन बाद ही राज्य के समाज कल्याण सचिव एमएस भाटिया ने इस ख़बर का खंडन कर दिया था.

हिंदुस्तान टाइम्स की खबर में कहा गया, ‘झारखंड पहला ऐसा राज्य है जहां सरकारी वेबसाइटों पर आधार की जानकारी लीक होने के कई मामले सामने आए. झारखंड सरकार की वेबसाइटों पर 14 लाख पेंशनभोगियों के आधार से जुड़ी जानकारियां कई दिनों तक सार्वजनिक रहीं. भोजन के अधिकार मामले पर काम करने वाले ज्यां द्रेज के सहयोगी धीरज कुमार ने मार्च के आखिरी सप्ताह में देखा था कि पेंशनभोगियों के आधार से जुड़ी सूचनाएं आॅनलाइन हैं.’

धीरज कुमार ने कहा, ‘अपने काम के दौरान मैंने पेंशनभोगियों के आधार से जुड़ी जानकारी आॅनलाइन देखी, लेकिन तब मुझे यह एहसास नहीं हुआ कि यह वास्तव में क़ानून का उल्लंघन है.’

एक तरफ सरकार कह रही है कि एक जुलाई तक अपना पैन कार्ड अपने आधार नंबर से लिंक कर लें वरना आपका पैन कार्ड रद्द हो सकता है. दूसरी तरफ सरकारी वेबसाइटों पर लाखों लोगों के आधार नंबर और निजी सूचनाएं सार्वजनिक हो गई हैं. कई लोगों की सूचनाएं लीक होने की वजह से उनके बैंक अकाउंट से पैसे ट्रांसफर कर लिए जाने का मामला भी सामने आ रहा है.

पैन कार्ड रद्द होने का मतलब है कि आपको बैंकिंग समेत तमाम सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा. यानी बैंक में अकाउंट रखने, सैलरी उठाने या किसी भी तरह के लेनदेन के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया गया है.

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हाल ही में कई विभागों और राज्यों में लोगों के आधार कार्ड नंबर और सूचनाएं लीक होने की ख़बरें आईं. इंडिया संवाद वेबसाइट के अनुसार, ‘लोगों के आधार की जानकारियां लीक होने की खबरें आनी अब भी बंद नहीं हुई हैं जबकि केंद्र सरकार से भी इसको लेकर कई शिकायतें की गई हैं. ताजा मामले में झारखंड सरकार की एक वेबसाइट पर लाखों पेंशनधारकों के आधार नंबर सार्वजनिक हो गए. यानी वेबसाइट पर लाखों लोगों के नाम, उनका पता, उनके बैंक अकाउंट की जानकारी सब सार्वजनिक हो गई.’

अंग्रेज़ी वेबसाइट स्क्रॉल डॉट इन ने भी आधार डाटा लीक मामले में एक ख़बर प्रकाशित की है, जिसका शीर्षक है— ‘आधार नंबर लीक कर रही हैं सरकारी वेबसाइट. सरकार के ख़िलाफ़ कार्रवाई कौन करेगा?’ इस ख़बर में लिखा गया है कि ‘मोदी सरकार ज़िद करके कह रही है कि 110 करोड़ लोगों के आधार नंबर सुरक्षित हैं. फिर भी, सरकार क़ानून के मुताबिक इन पहचान नंबरों को गोपनीय रख पाने के लिए संघर्ष कर रही है.’

हाल ही में क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के आधार में दर्ज सूचनाओं को सार्वजनिक कर दिया गया था. इस पर धोनी की पत्नी साक्षी ने ट्विटर पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से शिकायत की तो उन्हें ट्रोल किया गया. हालांकि बाद में बाद में संबंधित कंपनी को दस सालों के लिए ब्लैक लिस्ट कर दिया गया.

स्क्रॉल के मुताबिक, ‘झारखंड गवर्नमेंट सोशल सीक्योरिटी की वेबसाइट पर 15 लाख पेंशनभोगियों का ब्यौरा सार्वजनिक हो गया. आधार नंबर, फोन नंबर, बैंक अकाउंट का डिटेल सार्वजनिक होना क़ानून का उल्लंघन है. इसके सार्वजनिक होने से लाभार्थी को उसकी प्रोफाइलिंग करने से लेकर आर्थिक धोखाधड़ी जैसे अपराध का सामना करना पड़ सकता है.’

आधार नंबर को अनिवार्य बनाए जाने को लेकर तमाम विशेषज्ञ और जाने माने लोग इसका विरोध कर रहे हैं. विरोधियों का कहना है कि सबकुछ आधार से जोड़ देने पर आधार कार्ड धारकों की संवेदनशील जानकारियां चुराने, आर्थिक फ्रॉड करने, पहचान का दुरुपयोग करने और तमाम सूचनाओं का ग़लत इस्तेमाल करने का ख़तरा बढ़ जाएगा.

हाल ही में चंडीगढ़ ज़िला प्रशासन की वेबसाइट से भी आधार कार्ड से जुड़ा डेटा लीक हो गया था. बीबीसी हिंदी की ख़बर में लिखा गया है, ‘चंडीगढ़ ज़िला प्रशासन की वेबसाइट पर राशन कार्ड की जानकारी के साथ यूआईडी यानी आधार नंबर भी दर्ज नज़र आ रहा है. हालांकि, इस ख़बर के सार्वजनिक होने के बाद संबंधित वेब पेज को बंद कर दिया गया है.’

साभार: बीबीसी

साभार: बीबीसी

स्क्रॉल ने लिखा, ‘चंडीगढ़ के खाद्य आपूर्ति विभाग की वेबसाइट पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभार्थियों के आधार की जानकारी सार्वजनिक की गई. इस केंद्र शासित प्रदेश में इस तरह के क़रीब 4.9 लाख लाभार्थी हैं. गोपनीयता के उल्लंघन की ऐसी घटनाएं बार बार हो रही हैं. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना स्वच्छ भारत अभियान की वेबसाइट पर भी इसके लाभार्थियों के आधार का ब्यौरा लीक किया गया.’

सरकार भले ही डेटा लीक होने की बात से इनकार करे, लेकिन झारखंड में आधार नंबर लीक होने के मामले का भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने संज्ञान लिया और झारखंड सरकार से कहा कि आधार लीक मामले में शामिल लोगों की पहचान की जाए. प्राधिकरण का कहना है कि सूचना लीक करने का दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारी या व्यक्ति को क़ानून का उल्लंघन करने के लिए तीन साल के कारावास की सज़ा हो सकती है.

इसके अलावा केंद्र सरकार भी इस फ़ज़ीहत से बचने के लिए कुछ एहतियाती क़दम उठा रही है. दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक ख़बर के मुताबिक, ‘केंद्र ने राज्यों को निर्देश दिया कि ऑफिशयल पोर्टल पर आधार और पर्सनल डिटेल जाहिर नहीं होनी चाहिए. ऐसा होने पर तीन साल तक की जेल हो सकती है. केंद्र ने कहा कि राज्य अपने डिपार्टमेंट्स की वेबसाइट की समीक्षा करें ताकि लोगों की पर्सनल डिटेल, आधार नंबर, बैंक अकाउंट डिटेल पोर्टल पर न जाहिर हो. आईटी सेक्रेटरी अरुणा सुंदरराजन ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रमुख सचियों को पत्र लिखकर ज़रूरी क़दम उठाने और आईटी एक्ट एवं आधार एक्ट का कड़ाई से पालन करने को कहा है.’

बीबीसी के मुताबिक, ‘जब आधार नंबर की परिकल्पना सामने आई थी तो कहा गया था कि इसे अनिवार्य नहीं बनाया जाएगा. लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार में आधार नंबर को कई सरकारी सेवाओं के लिए अनिवार्य बनाने की कथित कोशिश की जा रही है. इसे लेकर पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि आधार को अनिवार्य कैसे बनाया जा सकता है. आधार नंबर को अनिवार्य बनाए जाने के विरोधियों की राय है कि इससे आधार कार्ड धारकों की जानकारी चुराए जाने और उसका ग़लत इस्तेमाल होने का ख़तरा बढ़ जाएगा. हालांकि सरकार ऐसे आरोपों को निराधार बताती रही है. लेकिन पिछले दिनों सरकार की वेबसाइट से आधार नंबर के आंकड़े लीक होने की घटनाओं ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है.’

हाल ही में कई सरकारी योजनाओं और सुविधाओं के लिए केंद्र सरकार ने आधार को अनिवार्य कर दिया है. जबकि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि जब तक अदालत कोई आख़िरी फ़ैसला नहीं देती, तब तक आधार कार्ड योजना पूरी तरह से स्वैच्छिक है और आधार को अनिवार्य नहीं किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट बार बार सरकार से कहती रही है कि आधार को अनिवार्य नहीं किया जा सकता. 24 मार्च, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार से कहा था, ‘आधार नंबर न होने की सूरत में किसी व्यक्ति को ऐसी किसी सुविधा से वंचित नहीं रखा जाएगा जिसका वह अन्य स्थिति में हकदार होता. आधार अनिवार्य नहीं है- ये बताने के लिए सरकारी विभाग अपने फ़ॉर्म्स/सर्कुलर्स में संशोधन करें.’

इसी साल 27 मार्च को भी सुप्रीम कोर्ट ने आधार पर सुनवाई करते हुए कहा था कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य नहीं किया जा सकता.

साप्ताहिक अख़बार चौथी दुनिया ने आधार को लेकर कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं और आधार को राष्ट्रीय सुरक्षा पर संकट बताया है. अख़बार में छपे लेख में डॉ. मनीष कुमार लिखते हैं, ‘पिछले संसद सत्र में मोदी सरकार ने कंपनी एक्ट और आधार एक्ट में बदलाव किए हैं. इन दोनों एक्ट में जो बदलाव हुए हैं, वो वैचारिक दृष्टि से प्रजातंत्र के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं. कंपनी एक्ट में बदलाव कर सरकार ने कंपनियों की पहचान को छिपाने का फैसला लिया है. लेकिन सरकार आधार के जरिए आम जनता की पहचान को सार्वजनिक करने के समर्थन में बदलाव कर रही है. आधार का सबसे बड़ा फ़ायदा विदेशी कंपनियों को होने वाला है, जिन्हें आधार के जरिए भारत के ग्रामीण बाज़ार में घुसने की खुली छूट मिल जाएगी.’

मनीष कुमार आगे लिखते हैं, ‘ पहले यूपीए और अब मोदी सरकार भी वही गलतियां कर रही है, जिसके बारे में दुनिया की तमाम एजेंसियां चेतावनी दे रही हैं. क्या सुरक्षा एजेंसियों को अब तक ये मालूम नहीं है कि इस योजना के तहत ऐसे लोग भी पहचान पत्र हासिल कर सकते हैं, जिनका इतिहास दाग़दार रहा है. एक अंग्रेजी अख़बार ने विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं. कुछ कश्मीरी आंतकियों के पास से यूआईडी बरामद भी किए गए हैं. अजीब स्थिति है. अब पता नहीं नंदन निलेकणी ने पहले मनमोहन सिंह और अब नरेंद्र मोदी को कौन पट्टी पढ़ाई है कि दोनों ही प्रधानमंत्री यूआईडी के दीवाने बन गए.’

नरेंद्र मोदी का 2014 का ट्वीट जब वे आधार कार्ड की सुरक्षा को लेकर सवाल उठा रहे थे.

नरेंद्र मोदी का 2014 का ट्वीट जब वे आधार कार्ड की सुरक्षा को लेकर सवाल उठा रहे थे.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, ‘…चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी पानी पी-पी कर इस योजना को कोसते थे और अपने चुनावी भाषणों में आधार का उदाहरण देखकर मनमोहन सिंह सरकार को घेरते थे. लेकिन जब वे खुद प्रधानमंत्री हैं, तो उन सारी समस्याओं को भूल चुके हैं. दरअसल, ये पूरा प्रोजेक्ट ही एक सैन्य रणनीति का हिस्सा है. इसका रिश्ता अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुए हमले से है. उस हमले के बाद से अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस ने लोगों पर नज़र रखने के लिए एक सुरक्षा प्रोजेक्ट बनाया, जिसके तहत अलग-अलग देशों में इसे लागू किया गया. हैरानी की बात ये है कि इंग्लैंड में इसे लागू करने के बाद बीच में ही इस प्रोजेक्ट को ख़त्म करना पड़ा. वहां इसे लोगों की निजता और सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया. ऐसा प्रोजेक्ट, जो इंग्लैंड के लोगों की निजता और सुरक्षा के लिए ख़तरा है, वो भारत के लोंगों के लिए लाभकारी कैसे हो सकता है?

आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा कहती हैं, ‘जब नंदन नीलकेणी ने आधार परियोजना का प्रस्ताव मनमोहन सरकार को दिया था तब इसे इस तरह से बेचा गया कि इससे कल्याणकारी परियोजनाओं को लागू करने में मदद मिलेगी. बाद में एक संसदीय समिति ने भी इसे नकार दिया था. उसने कहा कि आपने बताया ही नहीं है कि इस प्रोजेक्ट का मक़सद क्या है…दरअसल, इसे लागू करके सरकार ने राशन कार्ड आदि में जो समस्याएं थीं, उन्हें और बढ़ा दिया है. बड़ी चतुराई से लोगों के दिमाग़ में एक बात डाल दी गई है कि अगर आधार नहीं होगा तो पैसे का लेनदेन ही नहीं हो पाएगा.’

निजता के सवाल पर रीतिका खेड़ा कहती हैं, ‘सरकार लोगों की बांह मरोड़कर उन्हें आधार बनवाने पर मजबूर कर रही है. छात्रवृत्ति रोक दी तो छात्रों ने भागकर बनवा लिया. राशन रोक लिया तो ग़रीबों ने जाकर बनवा लिया. निजता का सवाल बहुत गंभीर सवाल है. आम लोगों के लिए निजता का मतलब है कि हम अपनी निजी ज़िंदगी में कितना किसको शामिल होने देना है. यह मैं तय करूंगी कि आप मेरी ज़िंदगी में कितना शामिल हों. इसमें किसी को ताकझांक नहीं करना चाहिए. जब हम पर हर तरफ से निगरानी होगी तो हम खुलकर अपनी ज़िंदगी नहीं जी सकते. आधार निजता पर प्रहार करता है.’

रीतिका का कहना है, ‘आधार के तहत एक नंबर मेरे हर एक डेटाबेस में डालना चाहते हैं. अभी मेरी जानकारियां अलग अलग डेटाबेस में है. कुछ फोन में, कुछ मेल में, कुछ पहचान पत्र में. एक नंबर से पहचान होने पर मुझे हर जगह ट्रैक करना आसान हो जाएगा. मैं कहीं भी रहूं, मुझे दिल्ली में बैठकर कोई भी ट्रैक कर सकता है. इससे एक तरह से सेल्फ सेंसरशिप लागू हो जाएगी. अब सवाल है कि क्यों सरकार नागरिकों पर ऐसी निगरानी करना चाहती है?’

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल दे का कहना है, ‘आधार कार्ड मामले में सरकार लगातार झूठ बोल रही है. वे संसद में ढिंढोरा पीट रही है कि आधार से हमने 50 हज़ार करोड़ बचाए. भ्रष्टाचार से बचाए हैं तो हम पूछते हैं कि 50 हजार करोड़ के भ्रष्टाचार में आपने कितने एफआईआर दर्ज किए? इसे दिखाना चाहिए. लेकिन आपने दिखाया नहीं. आधार की वजह से पूरा विकास का ढांचा हिल गया है. राजस्थान में रोज़ शिकायत आ रही है कि लोग अंगूठा लगा रहे हैं और लोगों को राशन नहीं मिल रहे. अंगूठा लगवा कर पेंशन नहीं दे रहे जबकि पैसा खाते से निकल जा रहा है. राजस्थान में सितंबर से अनिवार्य कर दिया था, अकेले राजस्थान में 28 लाख परिवार राशन नहीं पा रहे हैं. सरकार कौन सी पारदर्शिता लाई है?’

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर कहती हैं, ‘आप ताज्जुब करेंगे कि मेरी उंगलियों में निशान नहीं है. मैं कितनी भी बार अंगूठा लगा दूं, रीड नहीं करता. इसी तरह मजदूरों के हाथ में उंगलियों के निशान घिसे हुए होते हैं. उनके हाथ के कैसे निशान लेंगे? आप तो बिना अंगूठे के उनको राशन, पेंशन कुछ नहीं देंगे. इस अंगूठे के चक्कर में तीन लाख लोगों को पेंशन की लिस्ट से हटा दिया गया. ये कहकर कि ये मर चुके हैं, क्योंकि अंगूठे के निशान मैच नहीं करते. जबकि वे लोग ज़िंदा हैं. आप सही लोगों को लाभ से वंचित करके लिस्ट बना लेते हैं और कहते हैं कि बचत हो गई. ये ऐसी पद्धति है जिसे मजदूर, ग़रीब तो जान ही नहीं सकता कि उसके साथ धोखाधड़ी हो गई.’

सवाल यह है कि मनमोहन सिंह की इस योजना को लागू करने के लिए मोदी सरकार इतनी ज़िद पर क्यों अड़ी है? अगर आधार परियोजना नागरिकों के लिए सबसे उपयोगी और सुरक्षित योजना है तो सरकार नागरिकों को भरोसे में क्यों नहीं लेती? इतना तो तय है कि आधार पर उठ रही आशंकाएं निराधार नहीं हैं.