भारत

राजस्थान: सरकार ने घुमंतुओं को ज़मीन तो दी नहीं, उल्टा उनकी बस्ती उजाड़ दी

जयपुर विकास प्राधिकरण ने बीते 16 फरवरी को जयपुर के रावण गेट के पास रह रहे घुमंतू समुदाय के 200 से ज़्यादा परिवारों की झोपड़ियां अतिक्रमण के नाम पर उजाड़ दीं. अब ये परिवार ठंड के दिनों में खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं.

जयपुर विकास प्राधिकरण की कार्रवाई से प्रभावित घुमंतू समुदाय के लोग. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

जयपुर विकास प्राधिकरण की कार्रवाई से प्रभावित घुमंतू समुदाय के लोग. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

जयपुर: तारीख़: 16 फरवरी. वक़्त: सुबह 8 बजे. जगह: रावण गेट कच्ची बस्ती, कालवाड़ रोड, जयपुर.

घुमंतुओं में सपेरा जाति की पेपा सपेरा अपनी झोपड़ी के बगल में चूल्हे पर खाना बना रही थीं. तभी बच्चों के रोने और महिलाओं के चीखने की आवाज़ें सुनीं. जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के बुलडोज़र गोकुलपुरा की ख़ाली सरकारी ज़मीन पर रह रहे इन घुमंतुओं की झोंपड़ियों को रोंदते हुए आगे बढ़ रहे थे.

पेपा कुछ समझ पातीं इससे पहले ही बुलडोज़र उनकी झोपड़ी तक आ गया और सब तहस-नहस कर दिया. बकौल पेपा सपेरा, ‘मैंने अपना सामान समेटने की लाख मिन्नतें की लेकिन जेडीए के साथ आई पुलिस ने मेरी डंडों से पिटाई की. झोंपड़ी उजाड़ दी और उसमें आग लगा दी. आग से मेरी बचत के 10 हज़ार रुपये भी राख़ हो गए.’

पुलिस के डंडे से नीली हुई जांघ दिखाते हुए पेपा रोने लगीं. मैं पेपा को सुन ही रहा था कि उनके पति देवीनाथ सपेरा नीम के पेड़ पर टंगे एक बैग से विधानसभा चुनाव में मिली रिटर्निंग अधिकारी की मुहर लगी वोटर आईडी ले आते हैं.

वोटरआईडी दिखाते हुए वे कहते हैं, ‘क्या हम राजस्थान या इस देश के नागरिक नहीं हैं? हमें इस तरह से रौंदा गया जैसे हम कोई उग्रवादी हों. हमारे देवी के मंदिर को भी उठा कर ले गए और भैरो बाबा का पत्थर को भी उखाड़ दिया. 19 फरवरी की रात आई बारिश में हमने तीन बच्चों के साथ नीम के पेड़ के नीचे ही रात गुज़ारी है.’

पेपा सपेरा एक कालबेलिया डांसर हैं और देश के कई शहरों में परफॉर्मेंस दे चुकी हैं. कहती हैं, ‘मैंने इतने साल में बच्चों को पढ़ाने के लिए 10-12 हज़ार रुपये जमा किए थे जो आग से जल गए. तीन दिन से कुछ खाया नहीं है तो 5 महीने के बच्चे के लिए दूध भी नहीं उतर रहा. बच्चे भीख मांगकर लाए तब दूध खरीदकर लाई हूं. पीने का पानी भी हमें नसीब नहीं हो रहा.’

पेपा सपेरा. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

पेपा सपेरा. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

जयपुर के कालवाड़ रोड स्थित रावण गेट के पास कच्ची बस्ती में रह रहे 200 से ज़्यादा घुमंतू परिवार जयपुर विकास प्राधिकरण के अतिक्रमण हटाने के नाम पर हुए इस अमानवीय व्यवहार के शिकार हुए हैं.

इनमें से ज़्यादातर परिवार इधर-उधर चले गए हैं, जबकि कुछ ने थोड़ी दूर जाकर अपना सामान डाल दिया है. ज़्यादातर परिवारों के पास खाने के लिए रोटी तक नहीं है और वे भीख मांगकर बीते 5-6 दिन से अपना पेट भर रहे हैं. इन परिवारों में 70 से ज़्यादा बच्चे भी हैं.

राजसमंद ज़िले के लालमांड़णी गांव के रहने वाले बंसीनाथ और मंजू देवी के साथ भी ऐसा ही हुआ. बंसीनाथ ने गुरुवार को ही नई झुग्गी बनाई है. मंजू का भतीजा करण जयपुर के झोटवाड़ा स्थित एक सरकारी स्कूल में पढ़ता है लेकिन झुग्गी उजड़ जाने से उसकी किताबें गुम हो गईं और वो छह दिन से स्कूल नहीं जा पा रहा है.

हालांकि यहां रह रहे घुमंतुओं के ज़्यादातर बच्चे कचरा बीनने का काम करते हैं और जेडीए की कार्रवाई से इनका ये काम भी प्रभावित हुआ है.

कांग्रेस ने पट्टे देने का वादा किया लेकिन आशियाना ही उजाड़ दिया

विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में घुमंतू समुदाय के लोगों के लिए यह वादा किया था कि घुमंतुओं को पात्रता के आधार पर बीपीएल में जोड़ा जाएगा और सभी को नि:शुल्क पट्टा दिया जाएगा.

देवीनाथ कहते हैं, ‘चुनाव के वक्त तो सब नेता लोग हमारी कच्ची बस्ती में भी वोट मांगने आए थे, लेकिन सत्ता में आने के दो महीने बाद ही 200 से ज़्यादा घुमंतू परिवारों की कच्ची बस्ती ही उजड़वा दी गई. हम 16 फरवरी के बाद से कई मंत्रियों से मिलने गए लेकिन हमें मंत्रियों के बंगलों के गेट से भगा दिया गया. मेरे पास आधार, वोटर कार्ड सब है फिर भी हमारी एक नहीं सुनी गई.’

राजस्थान कच्ची बस्ती महासंघ के सचिव हरिकेश बुगालिया कहते हैं, ‘एक तरफ सरकार कच्ची बस्तियों को पक्के मकान और ज़मीन के पट्टे देने का वादा करती है और दूसरी ओर सरकार के ही विभाग इन बस्तियों को उजाड़ रहे हैं. आखिर ये लोग जाएं कहां? जहां भी जाते हैं, कुछ दिन बाद इन्हें वहां से भगा दिया जाता है.’

अपना वोटर आईडी दिखाते देवीनाथ. फोटो: माधव शर्मा/द वायर

अपना वोटर आईडी दिखाते देवीनाथ. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

वे कहते हैं, ‘चूंकि घुमंतू समुदाय के लोगों के पारंपरिक व्यवसाय अब ख़त्म हो गए हैं तो इन लोगों के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो गईं और लाखों की संख्या में घुमंतू लोग शहरों-कस्बों में कच्ची बस्तियों में रहने लग गए.’

उधर, जेडीए के प्रवर्तन अधिकारी बाबूलाल विश्नोई के मुताबिक पिछले दो साल से रावण गेट के पास जेडीए की ज़मीन पर 200 झोपड़ियों का अतिक्रमण था, जिन्हें हटाया गया. हमने कुछ दिन पहले मौखिक रूप से उन्हें बताया था, नोटिस नहीं दिया था. झोंपड़ियों में आग उन्होंने ही लगाई. किसी के साथ मारपीट नहीं की गई है.

बाबूलाल के नेतृत्व में ही यह कार्रवाई की गई थी.

घुमंतू समुदाय के लोगों ने बुगालिया के नेतृत्व में जेडीए की इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ जेडीए कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया और इस कार्रवाई का विरोध किया है.

हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी घुमंतुओं का पुनर्वास क्यों नहीं?

साल 2015 में राजस्थान हाईकोर्ट ने भैरूराम बंज़ारा बनाम राजस्थान सरकार के फैसले में कहा था कि सरकार जल्द घुमंतू लोगों का सर्वे कराकर घोषित 50 यार्ड ज़मीन दे और इनका पुनर्वास किया जाए.

मालूम हो कि फरवरी 2015 में राजस्थान सरकार ने घुमंतू समुदाय के लोगों का सर्वे कराकर पुनर्वास कर इन्हें पट्टा देने की घोषणा की थी.

हरिकेश बुगालिया कहते हैं, ‘हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी इनका पुनर्वास नहीं किया जा रहा बल्कि संस्थाएं अतिक्रमण हटाने के नाम पर इन लोगों को इधर-उधर ही करती रहती हैं. हमारी मांग यही है कि इन लोगों को एक रहने का स्थाई ठिकाना दिया जाए ताकि ये बार-बार न उजाड़े जा सकें.’

बुगालिया आगे कहते हैं, ‘जेडीए की ज़मीनों पर करोड़पतियों ने अवैध इमारतें खड़ी कर दीं लेकिन जेडीए उन्हें कुछ नहीं कर पाता. ये गरीब लोग इस ज़मीन पर सिर्फ झुग्गी डाल लेते हैं तो जेडीए और सरकारी मुलाज़िमों को तुरंत अतिक्रमण दिख जाता है.’

उजड़ने और बस कर फिर उजड़ने के अभ्यस्त हो चुके ये घुमंतू अब अपनी गरीबी का हवाला देकर ही ख़ुद के लिए एक छत मांग रहे हैं. हालांकि इस उजड़ने और बसने की लंबी प्रक्रिया के बीच इनके बच्चों का भविष्य सिलबट्टे बनाने वाले राकेश के वर्तमान की तरह खुरदरा हो चुका है.

राकेश की झुग्गी भी 16 फरवरी की कार्रवाई में हटा दी गई. पेड़ के नीचे अब राकेश की गृहस्थी जमी हुई है और वहीं नया चूल्हा भी रख लिया गया है. सिलबट्टे और चाकी बनाकर जीवन गुज़ारने वाले राकेश के पास सिवाय दो चाकी के कुछ नहीं बचा है.

बस्ती उजड़ने के बाद खुले आसमान के नीचे खाना बनाने का मजबूर घुमंतू समुदाय के लोग. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

बस्ती उजड़ने के बाद खुले आसमान के नीचे खाना बनाने का मजबूर घुमंतू समुदाय के लोग. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

वे कहते हैं, ‘जेडीए के लोग सुबह 8 बजे ही आ गए, उस वक़्त हम लोग खाना बनाते हैं और फिर काम पर निकल जाते हैं. इस आपाधापी में हम अपना सामान ही नहीं समेट पाए. मैं पिछले 6 दिनों से काम पर नहीं जा सका हूं. बच्चे भीख मांगकर आटा और सामान ला रहे हैं.’

उदयपुर ज़िले के झाड़ोल के रहने वाले 30 साल के भेरूलाल नई झुग्गी बनाने की कोशिश कर रहे हैं. बात की तो पता चला कि बचपन से जयपुर में कचरा बीन रहे हैं और अब तक 10 से ज़्यादा बार इसी तरह झुग्गी तोड़ कर भगाए जा चुके हैं.

वे बोले, ‘जब हम वहां से भाग कर थोड़ी दूर इधर आ गए तो पुलिस वाले यहां भी आ गए और यहां से भी भाग जाने के लिए कहने लगे. हमें और हमारी महिलाओं को बुरी तरह गालियां देते हुए धमकाते हैं.’

भेरूलाल कहते हैं, ‘स्थानीय लोग भी पुलिस को हमारे ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए उकसाते हैं क्योंकि उन्हें हम अपने स्तर के नहीं लगते. लेकिन, सभी भूल जाते हैं कि हम उनका फैलाया हुआ कचरा ही शहरभर से साफ कर लाते हैं.’

इतना कहकर भेरू आस्तीन से अपनी आंखें पोंछने लगते हैं.

बता दें कि घुमंतुओं के इन 200 परिवारों मे से 25-30 परिवार ही अब रावण गेट से थोड़ा आगे आकर सड़क किनारे पड़े हैं बाकी परिवार जयपुर के दूसरे इलाकों में चले गए और कुछ अपने गांव लौट गए हैं.

राजस्थान में घुमंतू समुदाय की जनसंख्या 55 लाख से ज़्यादा है लेकिन न तो इनके पास आवास की व्यवस्था है और न ही रोज़गार का कोई साधन. ऐसे में लाखों की आबादी बेहद गरीबी और तंगहाली में जीने को मजबूर है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)