जन की बात

जन गण मन की बात, ​एपिसोड 42: कांग्रेस का नाकारापन और प्रधानमंत्री का बड़बोलापन

जन गण मन की बात की 42वीं कड़ी में विनोद दुआ कांग्रेस के नाकारापन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़बोलेपन पर चर्चा कर रहे हैं.

  • Kaushal Kumar

    एक होता है इतिहास बोध। एक होती है इतिहास-ग्रस्तता। बाप-दादा दरवाजे पर हाथी बांधते थे। अब हाथी नहीं है, लेकिन हाथी बाँधने वाला सिक्कड़ (जंजीर) है और पुरानी रईसी की कहानियाँ हैं। उसी को दिखा-सुना कर महानता थोपने की कोशिश इतिहास-ग्रस्तता है। इतिहास-बोध का अर्थ होता है, इतिहास से सबक लेकर पुरानी गलतियों को दोहराने से बचना और अतीत के गौरव को वापस पाने के लिए सार्थक दिशा में प्रयास करना।
    130 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी आज इतिहास-ग्रस्तता का शिकार हो गयी है। वह इस मानसिकता से नहीं निकल पा रही है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका की वजह से कांग्रेस को शासन करने का नैसर्गिक अधिकार है और भारत की जनता कांग्रेस को वोट देकर उनके अतीत के नेताओं के त्याग और बलिदान का ऋण चुका रही है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और आंदोलन में शरीक नेताओं के कांग्रेस पार्टी में होने की वजह से जनता की सहानुभूति और जुड़ाव का जो लाभ आज़ादी के बाद के कुछ दशको तक था, वह अब नहीं लिया जा सकता। नई पीढ़ी के मतदाताओं से यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वह भारत की आजादी में कांग्रेस की भूमिका और आजादी के बाद नेहरू और इंदिरा के समय की उपलब्धियों को किताबों में पढ़ कर कांग्रेस को वोट देता रहे।
    1989-90 भारतीय राजनीति में बदलाव का एक निर्णायक वर्ष था जब मंडल और कमंडल के मुद्दे ने भारतीय राजनीति की तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया। खासकर, उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति को जहाँ से लोक सभा की 140 सीटें आती थी। कांग्रेस पार्टी के पास इस राजनीति से निपटने के लिए न कोई तात्कालिक योजना थी न ही कोई दीर्घकालीन रणनीति। नतीजा, 1990-91 में दोनों राज्यों में सत्ता से बाहर होने के 27 साल बाद आज भी कांग्रेस हाशिये पर है और हाल-फिलहाल वापसी की कोई सम्भवना भी नहीं दिख रही है। इसके लिए जिम्मेवार कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस ही है।
    इन 27 सालों में यूपी और बिहार में कांग्रेस विरोध की राजनीति से पनपी क्षेत्रीय पार्टियों पर जब भी संकट आया, अपना अस्तित्व बचाने के लिए उन्होंने कांग्रेस का इस्तेमाल किया और धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के नाम पर इस तरह हुए इस इस्तेमाल से कांग्रेस पार्टी की विश्वनीयता खत्म होती चली गयी। सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को चुनावी गठबंधनों में हुआ और किसी चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियों ने कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें नहीं दीं। चुनावी तालमेल के लिए दिल्ली से भेजे जाने वाले पर्यवेक्षक/प्रभारी राज्य में कांग्रेस के भविष्य से ज्यादा अपने लुटियन जोन के बंगले के लिये चिंतित रहते और कुछ बारगेन करके अपनी राज्य सभा की सीट पक्का कर लेते। नतीजा कभी कांग्रेस लोकसभा की 4 सीट लड़ती तो कभी विधान सभा की 35 सीट उसके हिस्से आती और इस तरह कांग्रेस की राजनितिक ज़मीन सिकुड़ती चली गयी।
    उत्तर-प्रदेश में 7 सीट पर सिमटने के बाद एक समाचार चैनल पर एक कांग्रेस महासचिव और कई राज्यों में प्रभारी कह रहे थे की बेशक यूपी में गठबंधन का प्रयोग नहीं चला लेकिन हमने क्षेत्रियों पार्टियों के साथ यह प्रयोग करके भाजपा को बिहार और बंगाल में रोक लिया। शायद वे इस गुमान में थे मानो उन्होंने कांग्रेस का बलिदान देकर देश बचा लिया हो ; पार्टी छोटी चीज है, बाद में देखेंगे। क्या वे यह बताएँगे, इस तरह के ‘कालिदास’ वाले प्रयोगों से कांग्रेस कैसे सत्ता में वापस आएगी। होगा यह कि 10-15 साल बाद भाजपा के रूप में एक राष्ट्रीय पार्टी होगी और हर राज्य में २-३ क्षेत्रीय पार्टियां जिसे भाजपा से लड़ने के लिए कांग्रेस सपोर्ट कर रही होगी।
    कांग्रेस को सबसे बड़ा खतरा उन नेताओं से है जो दो-दो, तीन-तीन चुनाव हार कर और अपने-अपने राज्यों में पार्टी की लुटिया डुबोने के बाद दिल्ली में महासचिव/प्रभारी बने बैठे हैं और कांग्रेस नेतृत्व को मिसलीड कर रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व को चाहिए कि 24 अकबर रोड में ब्यूरौक्रेट की तरह बैठे इन जनाधार विहीन नेताओं को जो कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनकर भाजपा से काउंटर करने की सलाह दे रहे हैं, उन्हें वापस प्रदेश संगठन में भेजे और कहे की जनता के बीच रहें और विश्वसनीयता हासिल करें।
    गाँधी परिवार का नेतृत्व आज भी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी ताकत है जो बिपरीत से बिपरीत परिस्थिति में भी पार्टी को एकजुट रखता है। जरूरत है प्रदेश स्तर पर स्थानीय क्षत्रपों /लीडर को उभारने की जिनमे ‘मास अपील’ हो। पंजाब में कैप्टेन अमरेन्दर सिंह के होने का लाभ साफ़ दिखा। साथ ही ‘पंचमढ़ी चिंतन शिविर’ में लिए गए फैसले ‘एकला चलो’ की नीति को अपनाने की और सिर्फ गठबंधन की सलाह देकर कांग्रेस को बैक सीट पर बिठाने की सलाह देने वाले नेताओं को दरकिनार करने की। कुल मिलकर एक इतिहास-बोध से लैस कांग्रेस की जरूरत है .