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छत्तीसगढ़ में बायोमेट्रिक पहचान न होने के कारण कई वृद्ध पेंशन से ​वंचित

राज्य के करदाना गांव में सरकार ने उन लोगों की पेंशन रोक दी है, जिन्होंने अब तक बैंक में आधार कार्ड नहीं जमा किया है. यह न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिलने वाले जीने के अधिकार की अवहेलना भी है.

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छत्तीसगढ़ का करदाना गांव. (फोटो: विपुल पैकरा)

करदाना छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में बतौली विकासखंड में आने वाला एक गांव है. विकासखंड मुख्यालय से इसकी दूरी 12 किलोमीटर तथा जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर है.

यह गांव चारों ओर से पहाड़ी से घिरा है तथा मुख्यतः आदिवासी ही इस गांव में रहते हैं, इस गांव में कुछ परिवार पिछड़ी जाति के हैं. गांव की जनसंख्या 946 है तथा विधवा, दिव्यांग और वृद्ध पेंशन धारियों की संख्या 195 है.

करदाना गांव में किसी भी बैंक की शाखा नहीं है और न ही यहां मोबाइल सेवा उपलब्ध है. सबसे नज़दीकी मोबाइल नेटवर्क के लिए लोगों को गांव से नौ किलोमीटर दूर एक पहाड़ पार कर के चिरंगा गांव जाना पड़ता है.

पहले पेंशनधारियों को पेंशन नकद में दिया जाता था, जिसे बाद में इसे पोस्ट ऑफिस के खाते के ज़रिये दिया जाने लगा. फ़िलहाल अब यह ज़िम्मेदारी अब पोस्ट ऑफिस से लेकर बैंकों को दे दी गई है.

इसके लिए पेंशनधारियों को यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया में खाता खुलवाने के लिए कहा गया, जिसकी सरगुजा ज़िले में में सिर्फ एक ही शाखा है जो काफ़ी दूर अंबिकापुर शहर में है.

पिछले कुछ सालों में पेंशन के भुगतान में कई तकनीकी बदलाव किए गए. नवीनतम बदलावों में बायोमेट्रिक पॉइंट-ऑफ़-सेल(पीओएस) मशीन को लाया गया, जो बैंक मित्र द्वारा संचालितकी जाती है.

इन मशीनों को उन जगहों पर इस्तेमाल करने के लिए लाया गया था, जहां बैंक की शाखाएं नहीं थी. पीओएस मशीन के संचालन के लिए नेटवर्क का होना जरुरी है और करदाना गांव में नेटवर्क न होने की वजह से यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ने चिरंगा गांव में अपना बैंक मित्र नियुक्त किया है.

बैंक मित्र पेंशनधारियों से अंगूठे का निशान लेता है, जिन पेंशनधारियों का अंगूठे का निशान उनके आधार वाले अंगूठे के निशान से मिलान हो जाता है, वह उन्हें बदले में एक रसीद देता है.

इसके बाद वह बैंक जाकर मिलान किए हुए पेंशनधारियों की राशि विदड्राल करके लाता है और उसे पेंशनधारियों में बांट देता है. पर उस स्थिति का क्या जब गांव में नेटवर्क का अभाव हो? या मशीन किसी व्यक्ति को आधार की जानकारी के अनुसार पहचानने से मना कर दे?

इन दो समस्याओं ने छत्तीसगढ़ के कई गांवों में पेंशन भुगतान को प्रभावित किया है. करदाना गांव में कई ऐसे पेंशनधारी हैं जो ठीक से चल पाने में अक्षम हैं, पर फिर भी उन्हें पहाड़ पारकर के नौ किलोमीटर दूर चिरंगा गांव में जाना पड़ता है.

जैसे-तैसे वे अगर वहां पहुंच भी जाते हैं तो कई बार मशीन उनका अंगूठे के निशान का मिलान नहीं कर पाती, मजबूरन उन्हें बिना किसी फायदे के फिर नौ किलोमीटर दूर उस पहाड़ को पार करके लौटना पड़ता है.

वे, सचमुच में मशीन की आस लेकर ही जी रहे हैं. सिर्फ करदाना गांव में ही ऐसे सात लोग हैं जिन्हें मशीन के आने के बाद उनकी पेंशन मिलना बंद हो गई.

बायोमेट्रिक मशीन के आने से पहले ग्राम पंचायत द्वारा पेंशन के नकद भुगतान में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के आधार पर इसे डाकघर खतों द्वारा दिया जाने लगा था.

पर डाकघर में पर्याप्त कर्मचारी न होने की वजह से यह ज़िम्मेदारी बैंकों को दे दी गई. वैसे तो यह बैंक मित्र प्रणाली भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है. बहुत सारे पेंशनधारियों को यह मालूम नहीं होता रहता कि वो कितने भुगतान के हक़दार हैं.

कई बार जब उनका भुगतान दो-तीन महीनों के लिए रुक जाता है तो उनको यह याद रखना मुश्किल हो जाता है कि उन्हें कितनी राशि मिलनी चाहिए थी, जो रसीद उन्हें अंगूठा लगाने के समय दी जाती है, वह इस तरह की होती है, जिससे स्याही हफ्ते दो हफ्ते में मिट जाती है और वह रसीद किसी काम की नहीं रह जाती.

आसपास कोई बैंक शाखा न होने के कारण वे पासबुक भी प्रिंट नहीं करा पाते. इस भ्रम की स्थिति में कई बार गांव वालों की शिकायत रहती है कि बैंक मित्र ने उन्हें पूरी राशि नहीं दी.

बैंक के लिए अंबिकापुर जाना बूढ़े लोगों के लिए बहुत आसान नहीं है. सबसे नज़दीकी बस स्टैंड बतौली 12 किलोमीटर दूर है.

अंबिकापुर जाने में ही महीने की पेंशन की आधी राशि ख़र्च हो जाती है और कई बार बैंक कर्मचारी भी उन्हें यह बोलकर वापस कर देते हैं कि प्रिंटिंग मशीन ख़राब है. यानी यहां भी वे तकनीक की ख़राबी का शिकार होते हैं.

पिछले कुछ दिनों से सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में आधार कार्ड की अनिवार्यता विवाद का विषय बनी हुई है. आधार को विभिन्न योजनाओं में जोड़ने के सरकार के अथक प्रयासों के कारण कई लोगों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

अगर किसी व्यक्ति का आधार कार्ड बन भी जाता है, उसकी विभिन्न जानकारियां डेटाबेस में दर्ज भी हो जाती हैं, फिर भी कई बार उसकी पहचान बायोमेट्रिक के कारण अवरुद्ध हो जाती है. यह जनता के लिए फायदेमंद होने की बजाय उन्ही परेशानियां बढ़ाने का ही सबब बन रहा है. जहां किसी लोकतंत्र में किसी  का केंद्र लोगों के मध्य होना चाहिए, यहां ऐसा प्रतीत होता है मानो यह धीरे धीरे किसी निर्जीव मशीन में खिसकता चला जा रहा है.

हाल ही में कुछ सरकारी कर्मचारियों के साथ एक चर्चा के दौरान यह सामने आया कि उन लोगों की पेंशन रोक दी गई है, जिन्होंने अब तक बैंक में आधार कार्ड नहीं जमा कराया है. यह न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिलने वाले जीने के अधिकार की अवहेलना भी है.
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जैसा की पूर्व उल्लेखित है, करदाना के सात लोगों को बायोमेट्रिक पहचान न होने के कारण पेंशन मिलना बंद हो गया है. उनमे से एक(देवनाथ) का पेंशन के इंतज़ार में निधन हो गया है.

बायोमेट्रिक पहचान न होने के, बूढ़ी उम्र में हाथ की रेखाओं का साफ़ न होने से लेकर पीओएस मशीन में तकनीकी खराबी जैसे कई संभावित कारण हो सकते हैं, इस आधार विवाद के कोलाहल में, इन गरीब और जरुरतमंद लोगों पर अन्याय की आवाज़ कहीं खो सी गयी है.