भारत

राष्ट्रवाद की आड़ लेकर सवालों को दबाया जा रहा है

मीडिया का एक बड़ा तबका, जिसका धर्म सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना होना चाहिए, घुटने टेक चुका है और देश के कुछ सबसे शक्तिशाली लोगों ने चुप्पी ओढ़ ली है, लेकिन आम लोग ऐसा नहीं करने वाले हैं. उनकी आवाज़ ऊंचे तख़्तों पर बैठे लोगों को सुनाई नहीं देती, लेकिन जब वक़्त आता है वे अपना फ़ैसला सुनाते हैं.

India's Prime Minister Narendra Modi visits the National Cemetery in Seoul, South Korea, February 22, 2019. REUTERS/Kim Hong-Ji

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: रॉयटर्स)

वाकई में देशभक्ति देश की फ़िजाओं में तैर रही है.

सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया को हर फ्लाइट के दौरान हर उद्घोषणा के बाद ‘जय हिंद’ कहने का निर्देश दिया गया है. स्वाभाविक तौर पर इस फैसले ने इंटरनेट पर हजारों की संख्या में चुटकुलों को जन्म दिया है.

क्या चालक दल के सदस्य अब कहेंगे, ‘हम भोजन बांटने जा रहे हैं, जय हिंद. पनीर या इडली? जय हिंद.’ क्या यात्रियों को अब उड़ान भरने से पहले राष्ट्रगान गाना होगा? इस काल्पनिक सूची को जितना चाहे बढ़ाया जा सकता है.

चुटकुले, चीजों को मजाक में उड़ा देने का एक अच्छा तरीका हैं, लेकिन इससे सच्चाई नहीं बदलती. जनमत को, ख़ासतौर पर पसंद न आने वाले जनमत को परेशानी का सबब या अशुभ चीज मानने वाली सरकार जनता की राय को ज्यादा तवज्जो दे, इसकी संभावना काफी कम है- सिवाय उस स्थिति के जब वह उसके अपने दृष्टिकोण से मेल खाने वाली हो.

इस तरह कोई भी जायज़ असहमति ‘लिबरल्स, ‘सिकुलरों’ या ऐसे ही कइयों का किया-धरा है, जबकि सबसे हिंसक सांप्रदायिकता या उन्मादी राष्ट्रवाद ‘जनता की आवाज- या ‘असली भारतीयों की सच्ची अभिव्यक्ति है.’

इसलिए कोई चाहे कुछ भी कहे, सरकार इस फैसले को बदलने नहीं जा रही है. लोगों के बीच राष्ट्रवादी भावना को भरना मौजूदा सरकार के केंद्रीय एजेंडे का हमेशा से हिस्सा रहा है. और मौजूदा फरमान भी इसी दिशा में उठाया गया एक कदम है.

भारत माता का निरंतर आह्वान, देश के विभिन्न हिस्सों में लगाए गए झंडे, सेना के पराक्रम का बखान और सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के लिए खड़ा होने का आदेश- इस बात का सबूत है कि इस सरकार ने अपने एजेंडे को पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ाया है.

एयर इंडिया वाला आदेश चुनाव से ठीक पहले- आचार संहिता के प्रभावी होने से पहले- आया, लेकिन वास्तव में यह इसके पीछे की वजह नहीं है, क्योंकि ऐसा तो किसी भी सूरत में होता. बहरहाल, बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद, राष्ट्रवादी प्रोजेक्ट महत्वपूर्ण हो उठा है.

इसके साथ ही न सिर्फ पार्टी या विस्तृत संघ परिवार के भीतर से बल्कि सरकार (और इसके ‘बुद्धिजीवी’ तबके) के प्रभावशाली लोग लक्ष्मण रेखा खींच रहे हैं- सेना पर सवाल उठाने को देश के खिलाफ करार दिया जा रहा है.

सिर्फ सेना ही नहीं, सरकार और प्रधानमंत्री से सवाल पूछने को भी इसी श्रेणी में रखा जा रहा है. ‘राष्ट्र’ की अवधारणा में, जनता द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री और सरकार- के साथ ही सेना को, जिसे राजनीतिक नियंत्रण में होना चाहिए, शामिल करने की कोशिश की जा रही है.

इस तरह से सत्ता के संतुलन को नागरिकों की जगह राजसत्ता की तरफ खिसकाने करने की कोशिश की जा रही है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को इस तरह से पलटने की कोशिशों पर सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति को ‘राष्ट्र’ के दुश्मन के तौर पर पेश किया जा रहा है.

यह सबसे भ्रष्ट किस्म की हाथ की सफाई है और यह इतिहास में सबसे खराब अत्याचारों का कारण बना है. पिछले कुछ दिनों के उदाहरणों पर विचार कीजिए.

सरकार के संकटमोचक और चहेते मंत्री पीयूष गोयल इंडिया टुडे समूह के एक पत्रकार पर नाराजगी जाहिर करते हुए भड़क उठे, जिसने मंच पर चल रही एक लाइव बातचीत के दौरान मंत्री महोदय से कुछ ऐसे सवाल पूछने की गुस्ताखी कर दी थी, जो उन्हें शायद पसंद नहीं आए.

उस पत्रकार को खासतौर पर इससे पहले कभी सरकार के प्रति कोई विरोध भाव रखने के लिए नहीं जाना गया है; लेकिन यहां वह बस अपना काम कर रहा था- जवाब मांग रहा था.

गोयल ने अपनी नाराजगी को किसी से छिपाए बिना उस पत्रकार से पूछा, ‘क्या आप भी उस नैरेटिव का हिस्सा हैं, जो सेना को नीचा दिखाना चाहता है?’ उसके बाद उन्होंने कहा कि ‘इस तरह की सोच’ भारत में पाकिस्तान के पक्ष का प्रचार करेगी’, जिसका मतलब शायद यह निकलता है कि ऐसे विचार रखने वाले भारतीय पाकिस्तान की तरफ से बोल रहे हैं.

यह संदेश इससे स्पष्ट नहीं हो सकता था- सवाल पूछना दुश्मन के हाथों में खेलने के बराबर माना जाएगा, इसलिए बेहतर यह है कि सवाल न पूछे जाएं.

निस्संदेह उस पत्रकार ने मंत्री महोदय को यह याद दिलाया कि उन्हें किसी से राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ने की जरूरत नहीं है (कि उसके पिता सेना में थे, हालांकि ऐसा बताने की ज़रूरत नहीं थी), लेकिन यह इस बात का अच्छा उदाहरण है कि इस सरकार के जिम्मेदार सदस्य किस तरह से सोचते हैं.

उसके बाद सेना प्रमुख से मंत्री बने जनरल वीके सिंह, जिन्होंने अतीत में पत्रकारों के लिए ‘ प्रेस्टीट्यूट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, ने छात्र नेताओं को ‘जोंक’ कहकर पुकारा. उन्होंने भारत के भीतर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की मांग की.

उनका इशारा शायद अलग-अलग विचारधाराओं वाले विरोधियों की तरफ था. उन्होंने अफसोस प्रकट किया कि भारत इजराइल जैसा नहीं है जहां कोई सेना पर सवाल नहीं खड़े करता.

शायद जनरल महोदय को लगता है कि वे अब भी आर्मी मेस में हैं जहां अदद सैनिक हैं और जहां आम नागरिकों के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली जा सकती है और जूनियर अधिकारी खड़े होकर तालियां बजाते रहते हैं.

हम उन्हें लगभग यह कहते हुए सुन सकते हैं, ‘इन सारे नामुरादों को बम से उड़ा दो.’ सच में लोकतंत्र कभी-कभी पीड़ादायक हो सकता है.

और खूब बोलने के लिए मशहूर रविशंकर प्रसाद ने भी पीछे न रहने की होड़ में इससे ज्यादा खुलकर कहा, ‘कांग्रेस हवाई हमले का सबूत मांग कर सैन्यबलों का मनोबल गिरा रही है, इसलिए कांग्रेस ‘पाकिस्तान की भाषा बोल रही है.’

दूसरे शब्दों में उनका कहना था कि मुंह बंद रखिए और हम जो कह रहे हैं, उसे स्वीकार कर लीजिए, क्योंकि आपके ऐसा करने का मतलब होगा कि आप देशद्रोही हैं.

सरकारें और नेता परेशान करने वाले सवाल पसंद नहीं करते हैं, यह तो एक जानी-मानी सच्चाई है, लेकिन इस सरकार में यह सारी हदों को पार कर गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूरे कार्यकाल में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं किया और न किसी ऐसे पत्रकार को इंटरव्यू दिया, जो उनसे कठिन सवाल पूछ सकता था.

साधारण सवालों को भी, यहां तक कि सूचना का अधिकार के रास्ते से भी पूछे गए सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया जाता है.

यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय को भी इस सरकार से कोई सूचना हासिल करने में कठिनाई महसूस होती है. सवाल पैदा होता है कि आखिर प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को किस बात का इतना डर है?

लेकिन, सवाल हैं कि बंद नहीं होते. भारतीय लोग स्वभाव से शक्की, यहां तक कि कमियां ढूंढने वाले होते हैं. मीडिया का एक बड़ा तबका, जिसका धर्म सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना होना चाहिए, घुटने टेक चुका है और देश के कुछ सबसे शक्तिशाली लोगों ने चुप्पी ओढ़ ली है, लेकिन आम लोग ऐसा नहीं करनेवाले हैं.

उनकी आवाज ऊंचे तख्तों पर बैठे लोगों को सुनाई नहीं देती, लेकिन जब वक्त आता है वे अपना फैसला सुनाते हैं. उन्हें जल्दी ही इसका मौका मिलने वाला है. राष्ट्रवाद के नाम पर उन्हें चुप नहीं कराया जा सकता है.

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